सूरह अल-अनफ़ाल हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ | Surah Al-Anfal

11 Oct, 2026

सूरह अल-अनफ़ाल हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ | Surah Al-Anfal

सूरह अल-अनफ़ाल (Surah Al-Anfal) – हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ

सूरह अल-अनफ़ाल पवित्र कुरआन की आठवीं सूरह है। इसमें कुल 75 आयतें हैं। यह सूरह इस्लाम में ईमान, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन, सब्र, एकता, युद्ध में प्राप्त माल के नियम और अल्लाह पर भरोसा करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन देती है।

इस लेख में आपको सूरह अल-अनफ़ाल का हिंदी उच्चारण और प्रत्येक आयत का हिंदी अर्थ पढ़ने को मिलेगा। इसका उद्देश्य उन हिंदी भाषी पाठकों की सहायता करना है, जो अरबी पढ़ने में कठिनाई महसूस करते हैं और सूरह अल-अनफ़ाल को हिंदी उच्चारण के माध्यम से पढ़ना तथा उसका अर्थ समझना चाहते हैं।

आप यहाँ सूरह अल-अनफ़ाल की आयत 1 से 75 तक का हिंदी उच्चारण और हिंदी अनुवाद क्रम से पढ़ सकते हैं। इससे आपको आयतों के अर्थ को समझने और कुरआन के संदेश पर विचार करने में मदद मिलेगी।

महत्वपूर्ण नोट: हिंदी अक्षरों में लिखा गया उच्चारण अरबी के सही मख़ारिज़ और तजवीद का पूरी तरह विकल्प नहीं है। इसलिए कुरआन की सही तिलावत सीखने के लिए अरबी पाठ के साथ किसी विश्वसनीय क़ारी की तिलावत भी सुनें।

आइए, अब सूरह अल-अनफ़ाल का हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ पढ़ना शुरू करते हैं।


Al-Anfal · अल-अनफ़ाल
Madani · 75 ayat ·

हिंदी उच्चारण 
1

बिस्मिल्लाहिर्-रहमानिर्-रहीम।

यस्'अलूनक अनिल्-अन्फ़ालि क़ुलिल्-अन्फ़ालु लिल्लाहि वर्-रसूलि फ़त्तक़ुल्-लाह व अस्लिहू ज़ात बैनिकुम् व अती'उल्-लाह व रसूलहू इन् कुन्तुम्-मु'मिनीन्

2

इन्नमल्-मु'मिनूनल्-लज़ीन इज़ा ज़ुकिरल्लाहु वजिलत् क़ुलूबुहुम् व इज़ा तुलियत् अलैहिम् आयातुहू ज़ादत्हुम् ईमानव्-व अला रब्बिहिम् यतवक्कलून्

3

अल्लज़ीन युक़ीमूनस्-सलात व मिम्मा रज़क़्नाहुम् युन्फ़िक़ून्

4

उलाइक हुमुल्-मु'मिनून हक़्क़ल्-लहुम् दरजातुन् इन्द रब्बिहिम् व मग़्फ़िरतुव्-व रिज़्क़ुन् करीम्

5

कमा अख़्रजक रब्बुक मिम्-बैतिक बिल्-हक़्क़ि व इन्न फ़रीक़म्-मिनल्-मु'मिनीन लकारिहून्

6

युजादिलूनक फ़िल्-हक़्क़ि बा'द मा तबय्यन कअन्नमा युसाक़ून इलल्-मौति व हुम् यन्ज़ुरून्

7

व इज़ य'इदुकुमुल्लाहु इह्दत्-ता'इफ़तैनि अन्नहा लकुम् व तवद्दून अन्न ग़ैर ज़ातिश्-शौकति तकूनु लकुम् व युरीदुल्लाहु अय्-युहिक़्क़ल्-हक़्क़ बिकलिमातिही व यक़्त'अ दाबिरल्-काफ़िरीन्

8

लियुहिक़्क़ल्-हक़्क़ व युब्तिलल्-बातिल व लौ करिहल्-मुज्रिमून्

9

इज़ तस्तग़ीसून रब्बकुम् फ़स्तजाब लकुम् अन्नी मुमिद्दुकुम् बिअल्फ़िम्-मिनल्-मलाइकति मुर्दिफ़ीन्

10

व मा ज'अलहुल्लाहु इल्ला बुश्रा व लितत्म'इन्न बिही क़ुलूबुकुम् व मन्-नस्रु इल्ला मिन् इन्दिल्लाहि इन्नल्लाह अज़ीज़ुन् हकीम्

11

इज़ युग़श्शीकुमुन्-नु'आस अमनतम्-मिन्हु व युनज़्ज़िलु अलैकुम्-मिनस्-समाइ माअल्-लियुतह्हिरकुम् बिही व युज़्हिब अन्कुम् रिज्ज़श्-शैतानि व लियर्बित अला क़ुलूबिकुम् व युसब्बित बिहिल्-अक़्दाम

12

इज़ यूही रब्बुक इलल्-मलाइकति अन्नी म'अकुम् फ़सब्बितुल्-लज़ीन आमनू स'उल्क़ी फ़ी क़ुलूबिल्-लज़ीन कफ़रुर्-रु'ब फ़द्रिबू फ़ौक़ल्-आ'नाक़ि वद्रिबू मिन्हुम् कुल्ल बनान्

13

ज़ालिक बिअन्नहुम् शाक़्क़ुल्लाह व रसूलहू व मय्-युशाक़िक़िल्लाह व रसूलहू फ़इन्नल्लाह शदीदुल्-इक़ाब्

14

ज़ालिकुम् फ़ज़ूक़ूहु व अन्न लिल्-काफ़िरीन अज़ाबन्-नार्

15

या अय्युहल्लज़ीन आमनू इज़ा लक़ीतुमुल्-लज़ीन कफ़रू ज़ह्फ़न् फ़ला तुवल्लूहुमुल्-अद्बार्

16

व मय्-युवल्लिहिम् यौम'इज़िन् दुबुरहू इल्ला मुतहर्रिफ़ल्-लिक़ितालिन् औ मुतहय्यिज़न् इला फ़िअतिन् फ़क़द् बाअ बिग़दबिम्-मिनल्लाहि व मा'वाहु जहन्नमु व बि'सल्-मसीर्

17

फ़लम् तक़्तुलूहुम् व लाकिन्नल्लाह क़तलहुम् व मा रमैत इज़ रमैत व लाकिन्नल्लाह रमा व लियुब्लियल्-मु'मिनीन मिन्हु बलाअन् हसनन् इन्नल्लाह समी'उन् अलीम्

18

ज़ालिकुम् व अन्नल्लाह मूहिनु कैदिल्-काफ़िरीन्

19

इन् तस्तफ़्तिहू फ़क़द् जाअकुमुल्-फ़त्हु व इन् तन्तहू फ़हुव ख़ैरुल्-लकुम् व इन् त'ऊदू न'उद् व लन् तुग़्निय अन्कुम् फ़िअतुकुम् शैअव्-व लौ कसुरत् व अन्नल्लाह म'अल्-मु'मिनीन्

20

या अय्युहल्लज़ीन आमनू अती'उल्लाह व रसूलहू व ला तवल्लौ अन्हु व अन्तुम् तस्म'ऊन्

21

व ला तकूनू कल्लज़ीन क़ालू समि'ना व हुम् ला यस्म'ऊन्

22

इन्न शर्रद्-दवाब्बि इन्दल्लाहिस्-सुम्मुल्-बुक्मुल्-लज़ीन ला या'क़िलून्

23

व लौ अलिमल्लाहु फ़ीहिम् ख़ैरल्-लअस्म'अहुम् व लौ अस्म'अहुम् लतवल्लौ व हुम्-मु'रिदून्

24

या अय्युहल्लज़ीन आमनुस्-तजीबू लिल्लाहि व लिर्-रसूलि इज़ा द'आकुम् लिमा युह्यीकुम् व'अलमू अन्नल्लाह यहूलु बैनल्-मर्'इ व क़ल्बिही व अन्नहू इलैहि तुह्शरून्

25

वत्तक़ू फ़ित्नतल्-ला तुसीबन्नल्-लज़ीन ज़लमू मिन्कुम् ख़ास्सतन् व'अलमू अन्नल्लाह शदीदुल्-इक़ाब्

26

वज़्कुरू इज़ अन्तुम् क़लीलुम्-मुस्तद्'अफ़ून फ़िल्-अर्दि तख़ाफ़ून अय्-यतख़त्तफ़कुमुन्-नासु फ़आवाकुम् व अय्यदकुम् बिनस्रिही व रज़क़कुम्-मिनत्-तय्यिबाति ल'अल्लकुम् तश्कुरून्

27

या अय्युहल्लज़ीन आमनू ला तख़ूनुल्लाह वर्-रसूल व तख़ूनू अमानातिकुम् व अन्तुम् त'अलमून्

28

व'अलमू अन्नमा अम्वालुकुम् व औलादुकुम् फ़ित्नतुव्-व अन्नल्लाह इन्दहू अज्रुन् अज़ीम्

29

या अय्युहल्लज़ीन आमनू इन् तत्तक़ुल्लाह यज्'अल्-लकुम् फ़ुर्क़ानव्-व युकफ़्फ़िर् अन्कुम् सय्यि'आतिकुम् व यग़्फ़िर् लकुम् वल्लाहु ज़ुल्-फ़द्लिल्-अज़ीम्

30

व इज़ यम्कुरु बिकल्लज़ीन कफ़रू लियुस्बितूक औ यक़्तुलूक औ युख़्रिजूक व यम्कुरून व यम्कुरुल्लाहु वल्लाहु ख़ैरुल्-माकिरीन्

31

व इज़ा तुत्ला अलैहिम् आयातुना क़ालू क़द् समि'ना लौ नशाउ लक़ुल्ना मिस्ल हाज़ा इन् हाज़ा इल्ला असातीरुल्-अव्वलीन्

32

व इज़ क़ालुल्-लाहुम्म इन् कान हाज़ा हुवल्-हक़्क़ मिन् इन्दिक फ़अम्तिर् अलैना हिजारतम्-मिनस्-समाइ अवि'तिना बि'अज़ाबिन् अलीम्

33

व मा कानल्लाहु लियु'अज़्ज़िबहुम् व अन्त फ़ीहिम् व मा कानल्लाहु मु'अज़्ज़िबहुम् व हुम् यस्तग़्फ़िरून्

34

व मा लहुम् अल्ला यु'अज़्ज़िबहुमुल्लाहु व हुम् यसुद्दून अनिल्-मस्जिदिल्-हरामि व मा कानू औलिया'अहू इन् औलिया'उहू इल्लल्-मुत्तक़ून व लाकिन्न अक्सरहुम् ला य'अलमून्

35

व मा कान सलातुहुम् इन्दल्-बैति इल्ला मुकाअव्-व तस्दियतन् फ़ज़ूक़ुल्-अज़ाब बिमा कुन्तुम् तक्फ़ुरून्

36

इन्नल्-लज़ीन कफ़रू युन्फ़िक़ून अम्वालहुम् लियसुद्दू अन् सबीलिल्लाहि फ़सयुन्फ़िक़ूनहा सुम्म तकूनु अलैहिम् हस्रतन् सुम्म युग़्लबून वल्लज़ीन कफ़रू इला जहन्नम युह्शरून्

37

लियमीज़ल्लाहुल्-ख़बीस मिनत्-तय्यिबि व यज्'अलल्-ख़बीस बा'दहू अला बा'दिन् फ़यर्कुमहू जमी'अन् फ़यज्'अलहू फ़ी जहन्नम उलाइक हुमुल्-ख़ासिरून्

38

क़ुल्-लिल्लज़ीन कफ़रू इय्-यन्तहू युग़्फ़र् लहुम्-मा क़द् सलफ़ व इय्-य'ऊदू फ़क़द् मदत् सुन्नतुल्-अव्वलीन्

39

व क़ातिलूहुम् हत्ता ला तकून फ़ित्नतुव्-व यकूनद्-दीनु कुल्लुहू लिल्लाहि फ़इनिन्-तहौ फ़इन्नल्लाह बिमा य'अमलून बसीर्

40

व इन् तवल्लौ फ़'अलमू अन्नल्लाह मौलाकुम् नि'मल्-मौला व नि'मन्-नसीर्

41

व'अलमू अन्नमा ग़निम्तुम्-मिन् शैइन् फ़अन्न लिल्लाहि ख़ुमुसहू व लिर्-रसूलि व लिज़िल्-क़ुर्बा वल्-यतामा वल्-मसाकीनि वब्निस्-सबीलि इन् कुन्तुम् आमन्तुम् बिल्लाहि व मा अन्ज़ल्ना अला अब्दिना यौमल्-फ़ुर्क़ानि यौमत्-तक़ल्-जम्'आनि वल्लाहु अला कुल्लि शैइन् क़दीर्

42

इज़ अन्तुम् बिल्-उद्वतिद्-दुन्या व हुम् बिल्-उद्वतिल्-क़ुस्वा वर्-रक्बु अस्फ़ल मिन्कुम् व लौ तवा'अद्त्तुम् लख़्तलफ़्तुम् फ़िल्-मी'आदि व लाकिल्-लियक़्दियल्लाहु अम्रन् कान मफ़्'ऊलल्-लियह्लिक मन् हलक अम्-बय्यिनतिन् व यह्या मन् हय्य अम्-बय्यिनतिन् व इन्नल्लाह लसमी'उन् अलीम्

43

इज़ युरीकहुमुल्लाहु फ़ी मनामिक क़लीलव्-व लौ अराकहुम् कसीरल्-लफ़शिल्तुम् व लतनाज़'अतुम् फ़िल्-अम्रि व लाकिन्नल्लाह सल्लम इन्नहू अलीमुम्-बिज़ातिस्-सुदूर्

44

व इज़ युरीकुमूहुम् इज़ित्-तक़ैतुम् फ़ी आ'युनिकुम् क़लीलव्-व युक़ल्लिलुकुम् फ़ी आ'युनिहिम् लियक़्दियल्लाहु अम्रन् कान मफ़्'ऊलन् व इलल्लाहि तुर्ज'उल्-उमूर्

45

या अय्युहल्लज़ीन आमनू इज़ा लक़ीतुम् फ़िअतन् फ़स्बुतू वज़्कुरुल्लाह कसीरल्-ल'अल्लकुम् तुफ़्लिहून्

46

व अती'उल्लाह व रसूलहू व ला तनाज़'ऊ फ़तफ़्शलू व तज़्हब रीहुकुम् वस्बिरू इन्नल्लाह म'अस्-साबिरीन्

47

व ला तकूनू कल्लज़ीन ख़रजू मिन् दियारिहिम् बतरव्-व रि'आअन्-नासि व यसुद्दून अन् सबीलिल्लाहि वल्लाहु बिमा य'अमलून मुहीत्

48

व इज़ ज़य्यन लहुमुश्-शैतानु आ'मालहुम् व क़ाल ला ग़ालिब लकुमुल्-यौम मिनन्-नासि व इन्नी जारुल्-लकुम् फ़लम्मा तरा'अतिल्-फ़िअतानि नकस अला अक़िबैहि व क़ाल इन्नी बरी'उम्-मिन्कुम् इन्नी अरा मा ला तरौन इन्नी अख़ाफ़ुल्लाह वल्लाहु शदीदुल्-इक़ाब्

49

इज़ यक़ूलुल्-मुनाफ़िक़ून वल्लज़ीन फ़ी क़ुलूबिहिम्-मरदुन् ग़र्र हाउला'इ दीनुहुम् व मय्-यतवक्कल् अलल्लाहि फ़इन्नल्लाह अज़ीज़ुन् हकीम्

50

व लौ तरा इज़ यतवफ़्फ़ल्-लज़ीन कफ़रुल्-मलाइकतु यद्रिबून वुजूहहुम् व अद्बारहुम् व ज़ूक़ू अज़ाबल्-हरीक़्

51

ज़ालिक बिमा क़द्दमत् ऐदीकुम् व अन्नल्लाह लैस बिज़ल्लामिल्-लिल्'अबीद्

52

कदा'बि आलि फ़िर्'औन वल्लज़ीन मिन् क़ब्लिहिम् कफ़रू बिआयातिल्लाहि फ़अख़ज़हुमुल्लाहु बिज़ुनूबिहिम् इन्नल्लाह क़विय्युन् शदीदुल्-इक़ाब्

53

ज़ालिक बिअन्नल्लाह लम् यकु मुग़य्यिरन्-नि'मतन् अन्'अमहा अला क़ौमिन् हत्ता युग़य्यिरू मा बिअन्फ़ुसिहिम् व अन्नल्लाह समी'उन् अलीम्

54

कदा'बि आलि फ़िर्'औन वल्लज़ीन मिन् क़ब्लिहिम् कज़्ज़बू बिआयाति रब्बिहिम् फ़अह्लक्नाहुम् बिज़ुनूबिहिम् व अग़्रक़्ना आल फ़िर्'औन व कुल्लुन् कानू ज़ालिमीन्

55

इन्न शर्रद्-दवाब्बि इन्दल्लाहिल्-लज़ीन कफ़रू फ़हुम् ला यु'मिनून्

56

अल्लज़ीन आहद्त्त मिन्हुम् सुम्म यन्क़ुदून अह्दहुम् फ़ी कुल्लि मर्रतिव्-व हुम् ला यत्तक़ून्

57

फ़इम्मा तस्क़फ़न्नहुम् फ़िल्-हर्बि फ़शर्रिद् बिहिम्-मन् ख़ल्फ़हुम् ल'अल्लहुम् यज़्ज़क्करून्

58

व इम्मा तख़ाफ़न्न मिन् क़ौमिन् ख़ियानतन् फ़म्बिज़् इलैहिम् अला सवाइन् इन्नल्लाह ला युहिब्बुल्-ख़ाइनीन्

59

व ला यह्सबन्नल्-लज़ीन कफ़रू सबक़ू इन्नहुम् ला यु'जिज़ून्

60

व अ'इद्दू लहुम्-मस्त'अतुम्-मिन् क़ुव्वतिव्-व मिर्-रिबातिल्-ख़ैलि तुर्हिबूना बिही अदुव्वल्लाहि व अदुव्वकुम् व आख़रीन मिन् दूनिहिम् ला त'अलमूनहुमुल्लाहु य'अलमुहुम् व मा तुन्फ़िक़ू मिन् शैइन् फ़ी सबीलिल्लाहि युवफ़्फ़ इलैकुम् व अन्तुम् ला तुज़्लमून्

61

व इन् जनहू लिस्-सल्मि फ़ज्नह् लहा व तवक्कल् अलल्लाहि इन्नहू हुवस्-समी'उल्-अलीम्

62

व इय्-युरीदू अय्-यख़्द'ऊक फ़इन्न हस्बकल्लाहु हुवल्लज़ी अय्यदक बिनस्रिही व बिल्-मु'मिनीन्

63

व अल्लफ़ बैन क़ुलूबिहिम् लौ अन्फ़क़्त मा फ़िल्-अर्दि जमी'अम्-मा अल्लफ़्त बैन क़ुलूबिहिम् व लाकिन्नल्लाह अल्लफ़ बैनहुम् इन्नहू अज़ीज़ुन् हकीम्

64

या अय्युहन्-नबिय्यु हस्बुकल्लाहु व मनित्-तब'अक मिनल्-मु'मिनीन्

65

या अय्युहन्-नबिय्यु हर्रिदिल्-मु'मिनीन अलल्-क़ितालि इय्-यकुम्-मिन्कुम् इश्रून साबिरून यग़्लिबू मि'अतैनि व इय्-यकुम्-मिन्कुम्-मि'अतुन् यग़्लिबू अल्फ़म्-मिनल्-लज़ीन कफ़रू बिअन्नहुम् क़ौमुल्-ला यफ़्क़हून्

66

अल्-आन ख़फ़्फ़फ़ल्लाहु अन्कुम् व अलिम अन्न फ़ीकुम् द'अफ़न् फ़इय्-यकुम्-मिन्कुम्-मि'अतुन् साबिरतुन् यग़्लिबू मि'अतैनि व इय्-यकुम्-मिन्कुम् अल्फ़ुय्-यग़्लिबू अल्फ़ैनि बिइज़्निल्लाहि वल्लाहु म'अस्-साबिरीन्

67

मा कान लिनबिय्यिन् अय्-यकून लहू अस्रा हत्ता युस्ख़िन फ़िल्-अर्दि तुरीदून अरदद्-दुन्या वल्लाहु युरीदुल्-आख़िरत वल्लाहु अज़ीज़ुन् हकीम्

68

लौ-ला किताबुम्-मिनल्लाहि सबक़ लमस्सकुम् फ़ीमा अख़ज़्तुम् अज़ाबुन् अज़ीम्

69

फ़कुलू मिम्मा ग़निम्तुम् हलालन् तय्यिबव्-वत्तक़ुल्लाह इन्नल्लाह ग़फ़ूरुर्-रहीम्

70

या अय्युहन्-नबिय्यु क़ुल्-लिमन् फ़ी ऐदीकुम्-मिनल्-अस्रा इय्-य'अलमिल्लाहु फ़ी क़ुलूबिकुम् ख़ैरय्-यु'तिकुम् ख़ैरम्-मिम्मा उख़िज़ मिन्कुम् व यग़्फ़िर् लकुम् वल्लाहु ग़फ़ूरुर्-रहीम्

71

व इय्-युरीदू ख़ियानतक फ़क़द् ख़ानुल्लाह मिन् क़ब्लु फ़अम्कन मिन्हुम् वल्लाहु अलीमुन् हकीम्

72

इन्नल्लज़ीन आमनू व हाजरू व जाहदू बिअम्वालिहिम् व अन्फ़ुसिहिम् फ़ी सबीलिल्लाहि वल्लज़ीन आवौ व नसरू उलाइक बा'दुहुम् औलिया'उ बा'दिन् वल्लज़ीन आमनू व लम् युहाजिरू मा लकुम्-मिन् वलायतिहिम्-मिन् शैइन् हत्ता युहाजिरू व इनिस्-तन्सरूकुम् फ़िद्-दीनि फ़'अलैकुमुन्-नस्रु इल्ला अला क़ौमिम्-बैनकुम् व बैनहुम्-मीसाक़ुन् वल्लाहु बिमा त'अमलून बसीर्

73

वल्लज़ीन कफ़रू बा'दुहुम् औलिया'उ बा'दिन् इल्ला तफ़्'अलूहु तकुन् फ़ित्नतुन् फ़िल्-अर्दि व फ़सादुन् कबीर्

74

वल्लज़ीन आमनू व हाजरू व जाहदू फ़ी सबीलिल्लाहि वल्लज़ीन आवौ व नसरू उलाइक हुमुल्-मु'मिनून हक़्क़ल्-लहुम्-मग़्फ़िरतुव्-व रिज़्क़ुन् करीम्

75

वल्लज़ीन आमनू मिम्-बा'दु व हाजरू व जाहदू म'अकुम् फ़उलाइक मिन्कुम् व उलुल्-अर्हामि बा'दुहुम् औला बिबा'दिन् फ़ी किताबिल्लाहि इन्नल्लाह बिकुल्लि शैइन् अलीम्



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हिंदी अर्थ 


1
 
वे तुमसे ग़नीमतों के विषय में पूछते है। कहो, "ग़नीमतें अल्लाह और रसूल की है। अतः अल्लाह का डर रखों और आपस के सम्बन्धों को ठीक रखो। और, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, यदि तुम ईमानवाले हो

2
 
ईमानवाले तो वही लोग है जिनके दिल उस समय काँप उठे जबकि अल्लाह को याद किया जाए। और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाएँ तो वे उनके ईमान को और अधिक बढ़ा दें और वे अपने रब पर भरोसा रखते हों

3
 
ये वे लोग हैं जो नमाज़ क़ायम करते है और जो कुछ हमने दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं

4
 
वही लोग वास्तव में ईमानवाले है। उनके लिेए रब के पास बड़े दर्जे है और क्षमा और सम्मानित उत्तम आजीविका भी

5
 
(यह बिल्कुल वैसी ही परिस्थित है) जैसे तुम्हारे ने तुम्हें तुम्हारे घर से एक उद्देश्य के साथ निकाला, किन्तु ईमानवालों में से एक गिरोह को यह अप्रिय लगा था

6
 
वे सत्य के विषय में उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात तुमसे झगड़ रहे थे। मानो वे आँखों देखी मृत्यु की ओर हाँके जा रहे हों

7
 
और याद करो जब अल्लाह तुमसे वादा कर रहा था कि दो गिरोहों में से एक तुम्हारे हाथ आएगा और तुम चाहते थे कि तुम्हें वह हाथ आए, जो निःशस्त्र था, हालाँकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करनेवालों की जड़ काट दे

8
 
ताकि सत्य को सत्य कर दिखाए और असत्य को असत्य, चाहे अपराधियों को कितना ही अप्रिय लगे

9
 
याद करो जब तुम अपने रब से फ़रियाद कर रहे थे, तो उसने तुम्हारी पुकार सुन ली। (उसने कहा,) "मैं एक हजार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करूँगा जो तुम्हारे साथी होंगे।"

10
 
अल्लाह ने यह केवल इसलिए किया कि यह एक शुभ-सूचना हो और ताकि इससे तुम्हारे हृदय संतुष्ट हो जाएँ। सहायता अल्लाह ही के यहाँ से होती है। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है

11
 
यह करो जबकि वह अपनी ओर से चैन प्रदान कर तुम्हें ऊँघ से ढँक रहा था और वह आकाश से तुमपर पानी बरसा रहा था, ताकि उसके द्वारा तुम्हें अच्छी तरह पाक करे और शैतान की गन्दगी तुमसे दूर करे और तुम्हारे दिलों को मज़बूत करे और उसके द्वारा तुम्हारे क़दमों को जमा दे

12
 
याद करो जब तुम्हारा रब फ़रिश्तों की ओर प्रकाशना (वह्य्) कर रहा था कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ। अतः तुम ईमानवालों को जमाए रखो। मैं इनकार करनेवालों के दिलों में रोब डाले देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ!"

13
 
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे (उसे कठोर यातना मिलकर रहेगी) क्योंकि अल्लाह कड़ी यातना देनेवाला है

14
 
यह तो तुम चखो! और यह कि इनकार करनेवालों के लिए आग की यातना है

15
 
ऐ ईमान लानेवालो! जब एक सेना के रूप में तुम्हारा इनकार करनेवालों से मुक़ाबला हो तो पीठ न फेरो

16
 
जिस किसी ने भी उस दिन उनसे अपनी पीठ फेरी - यह और बात है कि युद्ध-चाल के रूप में या दूसरी टुकड़ी से मिलने के लिए ऐसा करे - तो वह अल्लाह के प्रकोप का भागी हुआ और उसका ठिकाना जहन्नम है, और क्या ही बुरा जगह है वह पहुँचने की!

17
 
तुमने उसे क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें क़त्ल किया और जब तुमने (उनकी ओर मिट्टी और कंकड़) फेंक, तो तुमने नहीं फेंका बल्कि अल्लाह ने फेंका (कि अल्लाह अपनी गुण-गरिमा दिखाए) और ताकि अपनी ओर से ईमानवालों के गुण प्रकट करे। निस्संदेह अल्लाह सुनता, जानता है

18
 
यह तो हुआ, और यह (जान लो) कि अल्लाह इनकार करनेवालों की चाल को कमज़ोर कर देनेवाला है

19
 
यदि तुम फ़ैसला चाहते हो तो फ़ैसला तुम्हारे सामने आ चुका और यदि बाज़ आ जाओ तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है। लेकिन यदि तुमने पलटकर फिर वही हरकत की तो हम भी पलटेंगे और तुम्हारा जत्था, चाहे वह कितना ही अधिक हो, तुम्हारे कुछ काम न आ सकेगा। और यह कि अल्लाह मोमिनों के साथ होता है

20
 
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करो और उससे मुँह न फेरो जबकि तुम सुन रहे हो

21
 
और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने कहा था, "हमने सुना" हालाँकि वे सुनते नहीं

22
 
अल्लाह की स्पष्ट में तो निकृष्ट पशु वे बहरे-गूँगे लोग है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते

23
 
यदि अल्लाह जानता कि उनमें कुछ भी भलाई है, तो वह उन्हें अवश्य सुनने का सौभाग्य प्रदान करता। और यदि वह उन्हें सुना देता तो भी वे कतराते हुए मुँह फेर लेते

24
 
ऐ ईमान लानेवाले! अल्लाह और रसूल की बात मानो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाए जो तुम्हें जीवन प्रदान करनेवाली है, और जान रखो कि अल्लाह आदमी और उसके दिल के बीच आड़े आ जाता है और यह कि वही है जिसकी ओर (पलटकर) तुम एकत्र होगे

25
 
बचो उस फ़ितने से जो अपनी लपेट में विशेष रूप से केवल अत्याचारियों को ही नहीं लेगा, जान लो अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है

26
 
और याद करो जब तुम थोड़े थे, धरती में निर्बल थे, डरे-सहमे रहते कि लोग कहीं तु्म्हें उचक न ले जाएँ, फिर उसने तुम्हें ठिकाना दिया और अपनी सहायता से तुम्हें शक्ति प्रदान की और अच्छी-स्वच्छ चीज़ों की तुम्हें रोजी दी, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ

27
 
ऐ ईमान लानेवालो! जानते-बुझते तुम अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वासघात न करना और न अपनी अमानतों में ख़ियानत करना

28
 
और जान रखो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी संतान परीक्षा-सामग्री हैं और यह कि अल्लाह के पास बड़ा प्रतिदान है

29
 
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम अल्लाह का डर रखोगे तो वह तुम्हें एक विशिष्टता प्रदान करेगा और तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर करेगा और तुम्हे क्षमा करेगा। अल्लाह बड़ा अनुग्राहक है

30
 
और याद करो जब इनकार करनेवाले तुम्हारे साथ चालें चल रहे थे कि तम्हें क़ैद रखें या तुम्हे क़त्ल कर दें या तुम्हे निकाल बाहर करे। वे अपनी चालें चल रहे थे और अल्लाह भी अपनी चाल चल रहा था। अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलता है

31
 
जब उनके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती है, तो वे कहते है, "हम सुन चुके। यदि हम चाहें तो ऐसी बातें हम भी बना लें; ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ हैं।"

32
 
और याद करो जब उन्होंने कहा, "ऐ अल्लाह! यदि यही तेरे यहाँ से सत्य हो तो हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, या हम पर कोई दुखद यातना ही ले आ

33
 
और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम उनके बीच उपस्थित हो और वह उन्हें यातना देने लग जाए, और न अल्लाह ऐसा है कि वे क्षमा-याचना कर रहे हो और वह उन्हें यातना से ग्रस्त कर दे

34
 
किन्तु अब क्या है उनके पास कि अल्लाह उन्हें यातना न दे, जबकि वे 'मस्जिदे हराम' (काबा) से रोकते है, हालाँकि वे उसके कोई व्यवस्थापक नहीं? उसके व्यवस्थापक तो केवल डर रखनेवाले ही है, परन्तु उनके अधिकतर लोग जानते नहीं

35
 
उनकी नमाज़़ इस घर (काबा) के पास सीटियाँ बजाने और तालियाँ पीटने के अलावा कुछ भी नहीं होती। तो अब यातना का मज़ा चखो, उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो

36
 
निश्चय ही इनकार करनेवाले अपने माल अल्लाह के मार्ग से रोकने के लिए ख़र्च करते रहेंगे, फिर यही उनके लिए पश्चाताप बनेगा। फिर वे पराभूत होंगे और इनकार करनेवाले जहन्नम की ओर समेट लाए जाएँगे

37
 
ताकि अल्लाह नापाक को पाक से छाँटकर अलग करे और नापाकों को आपस में एक-दूसरे पर रखकर ढेर बनाए, फिर उसे जहन्नम में डाल दे। यही लोग घाटे में पड़नेवाले है

38
 
उन इनकार करनेवालो से कह दो कि वे यदि बाज़ आ जाएँ तो जो कुछ हो चुका, उसे क्षमा कर दिया जाएगा, किन्तु यदि वे फिर भी वहीं करेंगे तो पूर्ववर्ती लोगों के सिलसिले में जो रीति अपनाई गई वह सामने से गुज़र चुकी है

39
 
उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाक़ी न रहे और दीन (धर्म) पूरा का पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए। फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह उनके कर्म को देख रहा है

40
 
किन्तु यदि वे मुँह मोड़े तो जान रखो कि अल्लाह संरक्षक है। क्या ही अच्छा संरक्षक है वह, और क्या ही अच्छा सहायक!

End of Juz 9 · Juz 10 begins
41
 
और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ ग़नीमत के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पाँचवा भाग अल्लाग का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफ़िरों का है। यदि तुम अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान रखते हो, जो हमने अपने बन्दे पर फ़ैसले के दिन उतारी, जिस दिन दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हूई, और अल्लाह को हर चीज़ की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त है

42
 
याद करो जब तुम घाटी के निकटवर्ती छोर पर थे और वे घाटी के दूरस्थ छोर पर थे और क़ाफ़िला तुमसे नीचे की ओर था। यदि तुम परस्पर समय निश्चित किए होते तो अनिवार्यतः तुम निश्चित समय पर न पहुँचते। किन्तु जो कुछ हुआ वह इसलिए कि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे, जिसका पूरा होना निश्चित था, ताकि जिसे विनष्ट होना हो, वह स्पष्ट प्रमाण देखकर ही विनष्ट हो और जिसे जीवित रहना हो वह स्पष्ट़ प्रमाण देखकर जीवित रहे। निस्संदेह अल्लाह भली-भाँति जानता, सुनता है

43
 
और याद करो जब अल्लाह उनको तुम्हारे स्वप्न में थोड़ा करके तुम्हें दिखा रहा था और यदि वह उन्हें ज़्यादा करके तुम्हें दिखा देता तो अवश्य ही तुम हिम्मत हार बैठते और असल मामले में झगड़ने लग जाते, किन्तु अल्लाह ने इससे बचा लिया। निश्चय ही वह तो जो कुछ दिलों में होता है उसे भी जानता है

44
 
याद करो जब तुम्हारी परस्पर मुठभेड़ हुई तो वह तुम्हारी निगाहों में उन्हें कम करके और तुम्हें उनकी निगाहों में कम करके दिखा रहा था, ताकि अल्लाह उस बात का फ़ैसला कर दे जिसका होना निश्चित था। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते है

45
 
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारा किसी गिरोह से मुक़ाबला हो जाए तो जमे रहो और अल्लाह को ज़्यादा याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो

46
 
और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो और आपस में न झगड़ो, अन्यथा हिम्मत हार बैठोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। और धैर्य से काम लो। निश्चय ही, अल्लाह धैर्यवानों के साथ है

47
 
और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते और लोगों को दिखाते निकले थे और वे अल्लाह के मार्ग से रोकते है, हालाँकि जो कुछ वे करते है, अल्लाह उसे अपने घेरे में लिए हुए है

48
 
और याद करो जब शैतान ने उनके कर्म उनके लिए सुन्दर बना दिए और कहा, "आज लोगों में से कोई भी तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। मैं तुम्हारे साथ हूँ।" किन्तु जब दोनों गिरोह आमने-सामने हुए तो वह उलटे पाँव फिर गया और कहने लगा, "मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं। मैं वह कुछ देख रहा हूँ, जो तुम्हें नहीं दिखाई देता। मैं अल्लाह से डरता हूँ, और अल्लाह कठोर यातना देनेवाला है।"

49
 
याद करो जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है, कह रहे थे, "इन लोगों को तो इनके धर्म ने धोखे में डाल रखा है।" हालाँकि जो अल्लाह पर भरोसा रखता है, तो निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है

50
 
क्या ही अच्छा होता कि तुम देखते जब फ़रिश्ते इनकार करनेवालों के प्राण ग्रस्त करते हैं! वे उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते जाते हैं कि "लो अब जलने की यातना मज़ा चखो।" (तो उनकी दुर्दशा का अन्दाजा कर सकते)

51
 
यह तो उसी का बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा और यह कि अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता

52
 
इनके साथ वैसा ही मामला पेश आया जैसा फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों के साथ पेश आया। उन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया तो अल्लाह ने उनके गुनाहों के कारण उन्हें पकड़ लिया। निस्संदेह अल्लाह शक्तिशाली, कठोर यातना देनेवाला है

53
 
यह इसलिए हुआ कि अल्लाह उस उदार अनुग्रह (नेमत) को, जो उसने किसी क़ौम पर किया हो, बदलनेवाला नहीं हैं, जब तक कि लोग उस चीज़ को न बदल डालें, जिसका सम्बन्ध स्वयं उनसे है। और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है

54
 
जैसे फ़िरऔनियों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने अपने रब की आयतों को झुठलाया तो हमने उन्हें उनके गुनाहों के बदले में विनष्ट कर दिया और फ़िरऔनियों को डूबो दिया। ये सभी अत्याचारी थे

55
 
निश्चय ही, सबसे बुरे प्राणी अल्लाह की स्पष्ट में वे लोग है, जिन्होंने इनकार किया। फिर वे ईमान नहीं लाते

56
 
जिनसे तुमने वचन लिया वे फिर हर बार अपने वचन को भंग कर देते है और वे डर नहीं रखते

57
 
अतः यदि युद्ध में तुम उनपर क़ाबू पाओ, तो उनके साथ इस तरह पेश आओ कि उनके पीछेवाले भी भाग खड़े हों, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें

58
 
और यदि तुम्हें किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो, तो तुम भी उसी प्रकार ऐसे लोगों के साथ हुई संधि को खुल्लम-खुल्ला उनके आगे फेंक दो। निश्चय ही अल्लाह को विश्वासघात करनेवाले प्रिय नहीं

59
 
इनकार करनेवाले यह न समझे कि वे आगे निकल गए। वे क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते

60
 
और जो भी तुमसे हो सके, उनके लिए बल और बँधे घोड़े तैयार रखो, ताकि इसके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं और अपने शत्रुओं और इनके अतिरिक्त उन दूसरे लोगों को भी भयभीत कर दो जिन्हें तुम नहीं जानते। अल्लाह उनको जानता है और अल्लाह के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा-पूरा चुका दिया जाएगा और तुम्हारे साथ कदापि अन्याय न होगा

61
 
और यदि वे संधि और सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सब कुछ सुनता, जानता है

62
 
और यदि वे यह चाहें कि तुम्हें धोखा दें तो तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है। वही तो है जिसने तुम्हें अपनी सहायता से और मोमिनों के द्वारा शक्ति प्रदान की

63
 
और उनके दिल आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिए। यदि तुम धरती में जो कुछ है, सब खर्च कर डालते तो भी उनके दिलों को परस्पर जोड़ न सकते, किन्तु अल्लाह ने उन्हें परस्पर जोड़ दिया। निश्चय ही वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है

64
 
ऐ नबी! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमानवाले अनुयायी ही काफ़ी है

65
 
ऐ नबी! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुमसे से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करनेवालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग है

66
 
अब अल्लाह ने तुम्हारे बोझ हल्का कर दिया और उसे मालूम हुआ कि तुममें कुछ कमज़ोरी है। तो यदि तुम्हारे सौ आदमी जमे रहनेवाले होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी रहेंगे और यदि तुममें से ऐसे हजार होंगे तो अल्लाह के हुक्म से वे दो हज़ार पर प्रभावी रहेंगे। अल्लाह तो उन्ही लोगों के साथ है जो जमे रहते है

67
 
किसी नबी के लिए यह उचित नहीं कि उसके पास क़ैदी हो यहाँ तक की वह धरती में रक्तपात करे। तुम लोग संसार की सामग्री चाहते हो, जबकि अल्लाह आख़िरत चाहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है

68
 
यदि अल्लाह का लिखा पहले से मौजूद न होता, तो जो कुछ नीति तुमने अपनाई है उसपर तुम्हें कोई बड़ी यातना आ लेती

69
 
अतः जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है

70
 
ऐ नबी! जो क़ैदी तुम्हारे क़ब्जें में है, उनसे कह दो, "यदि अल्लाह ने यह जान लिया कि तुम्हारे दिलों में कुछ भलाई है तो वह तुम्हें उससे कहीं उत्तम प्रदान करेगा, जो तुम से छिन गया है और तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"

71
 
किन्तुम यदि वे तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहेंगे, तो इससे पहले वे अल्लाह के साथ विश्वासघात कर चुके है। तो उसने तुम्हें उनपर अधिकार दे दिया। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ा तत्वदर्शी है

72
 
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की, वही लोग परस्पर एक-दूसरे के संरक्षक मित्र है। रहे वे लोग जो ईमान लाए, किन्तु उन्होंने हिजरत नहीं की, उनसे तुम्हारा संरक्षण और मित्रता का कोई सम्बन्ध नहीं है, जब तक कि वे हिजरत न करें, किन्तु यदि वे धर्म के मामले में तुमसे सहायता माँगे तो तुमपर अनिवार्य है कि सहायता करो, सिवाय इसके कि सहायता किसी ऐसी क़ौम के मुक़ाबले में हो जिससे तुम्हारी कोई संधि हो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे देखता है

73
 
जो इनकार करनेवाले लोग है, वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक है। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो धरती में फ़ितना और बड़ा फ़साद फैलेगा

74
 
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और जिन लोगों ने उन्हें शरण दी और सहायता की वही सच्चे मोमिन हैं। उनके क्षमा और सम्मानित - उत्तम आजीविका है

75
 
और जो लोग बाद में ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया तो ऐसे लोग भी तुम में ही से हैं। किन्तु अल्लाह की किताब मे ख़ून के रिश्तेदार एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है

Arbi surah anfal

يَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلۡأَنفَالِۖ قُلِ ٱلۡأَنفَالُ لِلَّهِ وَٱلرَّسُولِۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَصۡلِحُواْ ذَاتَ بَيۡنِكُمۡۖ وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ﴿١﴾

إِنَّمَا ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ ٱللَّهُ وَجِلَتۡ قُلُوبُهُمۡ وَإِذَا تُلِيَتۡ عَلَيۡهِمۡ ءَايَٰتُهُۥ زَادَتۡهُمۡ إِيمَٰنࣰا وَعَلَىٰ رَبِّهِمۡ يَتَوَكَّلُونَ ﴿٢﴾

ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ يُنفِقُونَ ﴿٣﴾

أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ حَقࣰّاۚ لَّهُمۡ دَرَجَٰتٌ عِندَ رَبِّهِمۡ وَمَغۡفِرَةࣱ وَرِزۡقࣱ كَرِيمࣱ ﴿٤﴾

كَمَآ أَخۡرَجَكَ رَبُّكَ مِنۢ بَيۡتِكَ بِٱلۡحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقࣰا مِّنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ لَكَٰرِهُونَ ﴿٥﴾

يُجَٰدِلُونَكَ فِي ٱلۡحَقِّ بَعۡدَ مَا تَبَيَّنَ كَأَنَّمَا يُسَاقُونَ إِلَى ٱلۡمَوۡتِ وَهُمۡ يَنظُرُونَ ﴿٦﴾

وَإِذۡ يَعِدُكُمُ ٱللَّهُ إِحۡدَى ٱلطَّآئِفَتَيۡنِ أَنَّهَا لَكُمۡ وَتَوَدُّونَ أَنَّ غَيۡرَ ذَاتِ ٱلشَّوۡكَةِ تَكُونُ لَكُمۡ وَيُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُحِقَّ ٱلۡحَقَّ بِكَلِمَٰتِهِۦ وَيَقۡطَعَ دَابِرَ ٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿٧﴾

لِيُحِقَّ ٱلۡحَقَّ وَيُبۡطِلَ ٱلۡبَٰطِلَ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡمُجۡرِمُونَ ﴿٨﴾

إِذۡ تَسۡتَغِيثُونَ رَبَّكُمۡ فَٱسۡتَجَابَ لَكُمۡ أَنِّي مُمِدُّكُم بِأَلۡفࣲ مِّنَ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ مُرۡدِفِينَ ﴿٩﴾

وَمَا جَعَلَهُ ٱللَّهُ إِلَّا بُشۡرَىٰ وَلِتَطۡمَئِنَّ بِهِۦ قُلُوبُكُمۡۚ وَمَا ٱلنَّصۡرُ إِلَّا مِنۡ عِندِ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿١٠﴾

إِذۡ يُغَشِّيكُمُ ٱلنُّعَاسَ أَمَنَةࣰ مِّنۡهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيۡكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءࣰ لِّيُطَهِّرَكُم بِهِۦ وَيُذۡهِبَ عَنكُمۡ رِجۡزَ ٱلشَّيۡطَٰنِ وَلِيَرۡبِطَ عَلَىٰ قُلُوبِكُمۡ وَيُثَبِّتَ بِهِ ٱلۡأَقۡدَامَ ﴿١١﴾

إِذۡ يُوحِي رَبُّكَ إِلَى ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ أَنِّي مَعَكُمۡ فَثَبِّتُواْ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْۚ سَأُلۡقِي فِي قُلُوبِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلرُّعۡبَ فَٱضۡرِبُواْ فَوۡقَ ٱلۡأَعۡنَاقِ وَٱضۡرِبُواْ مِنۡهُمۡ كُلَّ بَنَانࣲ ﴿١٢﴾

ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ شَآقُّواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥۚ وَمَن يُشَاقِقِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ﴿١٣﴾

ذَٰلِكُمۡ فَذُوقُوهُ وَأَنَّ لِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابَ ٱلنَّارِ ﴿١٤﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا لَقِيتُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ زَحۡفࣰا فَلَا تُوَلُّوهُمُ ٱلۡأَدۡبَارَ ﴿١٥﴾

وَمَن يُوَلِّهِمۡ يَوۡمَئِذࣲ دُبُرَهُۥٓ إِلَّا مُتَحَرِّفࣰا لِّقِتَالٍ أَوۡ مُتَحَيِّزًا إِلَىٰ فِئَةࣲ فَقَدۡ بَآءَ بِغَضَبࣲ مِّنَ ٱللَّهِ وَمَأۡوَىٰهُ جَهَنَّمُۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ ﴿١٦﴾

فَلَمۡ تَقۡتُلُوهُمۡ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ قَتَلَهُمۡۚ وَمَا رَمَيۡتَ إِذۡ رَمَيۡتَ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ رَمَىٰ وَلِيُبۡلِيَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ مِنۡهُ بَلَآءً حَسَنًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمࣱ ﴿١٧﴾

ذَٰلِكُمۡ وَأَنَّ ٱللَّهَ مُوهِنُ كَيۡدِ ٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿١٨﴾

إِن تَسۡتَفۡتِحُواْ فَقَدۡ جَآءَكُمُ ٱلۡفَتۡحُۖ وَإِن تَنتَهُواْ فَهُوَ خَيۡرࣱ لَّكُمۡۖ وَإِن تَعُودُواْ نَعُدۡ وَلَن تُغۡنِيَ عَنكُمۡ فِئَتُكُمۡ شَيۡـࣰٔا وَلَوۡ كَثُرَتۡ وَأَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿١٩﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَا تَوَلَّوۡاْ عَنۡهُ وَأَنتُمۡ تَسۡمَعُونَ ﴿٢٠﴾

وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ قَالُواْ سَمِعۡنَا وَهُمۡ لَا يَسۡمَعُونَ ﴿٢١﴾

۞ إِنَّ شَرَّ ٱلدَّوَآبِّ عِندَ ٱللَّهِ ٱلصُّمُّ ٱلۡبُكۡمُ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡقِلُونَ ﴿٢٢﴾

وَلَوۡ عَلِمَ ٱللَّهُ فِيهِمۡ خَيۡرࣰا لَّأَسۡمَعَهُمۡۖ وَلَوۡ أَسۡمَعَهُمۡ لَتَوَلَّواْ وَّهُم مُّعۡرِضُونَ ﴿٢٣﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱسۡتَجِيبُواْ لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمۡ لِمَا يُحۡيِيكُمۡۖ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ يَحُولُ بَيۡنَ ٱلۡمَرۡءِ وَقَلۡبِهِۦ وَأَنَّهُۥٓ إِلَيۡهِ تُحۡشَرُونَ ﴿٢٤﴾

وَٱتَّقُواْ فِتۡنَةࣰ لَّا تُصِيبَنَّ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنكُمۡ خَآصَّةࣰۖ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ﴿٢٥﴾

وَٱذۡكُرُوٓاْ إِذۡ أَنتُمۡ قَلِيلࣱ مُّسۡتَضۡعَفُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ تَخَافُونَ أَن يَتَخَطَّفَكُمُ ٱلنَّاسُ فَـَٔاوَىٰكُمۡ وَأَيَّدَكُم بِنَصۡرِهِۦ وَرَزَقَكُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَٰتِ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ ﴿٢٦﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَخُونُواْ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ وَتَخُونُوٓاْ أَمَٰنَٰتِكُمۡ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ﴿٢٧﴾

وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّمَآ أَمۡوَٰلُكُمۡ وَأَوۡلَٰدُكُمۡ فِتۡنَةࣱ وَأَنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥٓ أَجۡرٌ عَظِيمࣱ ﴿٢٨﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِن تَتَّقُواْ ٱللَّهَ يَجۡعَل لَّكُمۡ فُرۡقَانࣰا وَيُكَفِّرۡ عَنكُمۡ سَيِّـَٔاتِكُمۡ وَيَغۡفِرۡ لَكُمۡۗ وَٱللَّهُ ذُو ٱلۡفَضۡلِ ٱلۡعَظِيمِ ﴿٢٩﴾

وَإِذۡ يَمۡكُرُ بِكَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لِيُثۡبِتُوكَ أَوۡ يَقۡتُلُوكَ أَوۡ يُخۡرِجُوكَۚ وَيَمۡكُرُونَ وَيَمۡكُرُ ٱللَّهُۖ وَٱللَّهُ خَيۡرُ ٱلۡمَٰكِرِينَ ﴿٣٠﴾

وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡ ءَايَٰتُنَا قَالُواْ قَدۡ سَمِعۡنَا لَوۡ نَشَآءُ لَقُلۡنَا مِثۡلَ هَٰذَآ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّآ أَسَٰطِيرُ ٱلۡأَوَّلِينَ ﴿٣١﴾

وَإِذۡ قَالُواْ ٱللَّهُمَّ إِن كَانَ هَٰذَا هُوَ ٱلۡحَقَّ مِنۡ عِندِكَ فَأَمۡطِرۡ عَلَيۡنَا حِجَارَةࣰ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ أَوِ ٱئۡتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمࣲ ﴿٣٢﴾

وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمۡ وَأَنتَ فِيهِمۡۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ مُعَذِّبَهُمۡ وَهُمۡ يَسۡتَغۡفِرُونَ ﴿٣٣﴾

وَمَا لَهُمۡ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ ٱللَّهُ وَهُمۡ يَصُدُّونَ عَنِ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ وَمَا كَانُوٓاْ أَوۡلِيَآءَهُۥٓۚ إِنۡ أَوۡلِيَآؤُهُۥٓ إِلَّا ٱلۡمُتَّقُونَ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ ﴿٣٤﴾

وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمۡ عِندَ ٱلۡبَيۡتِ إِلَّا مُكَآءࣰ وَتَصۡدِيَةࣰۚ فَذُوقُواْ ٱلۡعَذَابَ بِمَا كُنتُمۡ تَكۡفُرُونَ ﴿٣٥﴾

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ يُنفِقُونَ أَمۡوَٰلَهُمۡ لِيَصُدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِۚ فَسَيُنفِقُونَهَا ثُمَّ تَكُونُ عَلَيۡهِمۡ حَسۡرَةࣰ ثُمَّ يُغۡلَبُونَۗ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِلَىٰ جَهَنَّمَ يُحۡشَرُونَ ﴿٣٦﴾

لِيَمِيزَ ٱللَّهُ ٱلۡخَبِيثَ مِنَ ٱلطَّيِّبِ وَيَجۡعَلَ ٱلۡخَبِيثَ بَعۡضَهُۥ عَلَىٰ بَعۡضࣲ فَيَرۡكُمَهُۥ جَمِيعࣰا فَيَجۡعَلَهُۥ فِي جَهَنَّمَۚ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ﴿٣٧﴾

قُل لِّلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِن يَنتَهُواْ يُغۡفَرۡ لَهُم مَّا قَدۡ سَلَفَ وَإِن يَعُودُواْ فَقَدۡ مَضَتۡ سُنَّتُ ٱلۡأَوَّلِينَ ﴿٣٨﴾

وَقَٰتِلُوهُمۡ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتۡنَةࣱ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ كُلُّهُۥ لِلَّهِۚ فَإِنِ ٱنتَهَوۡاْ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِمَا يَعۡمَلُونَ بَصِيرࣱ ﴿٣٩﴾

وَإِن تَوَلَّوۡاْ فَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَوۡلَىٰكُمۡۚ نِعۡمَ ٱلۡمَوۡلَىٰ وَنِعۡمَ ٱلنَّصِيرُ ﴿٤٠﴾

۞ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّمَا غَنِمۡتُم مِّن شَيۡءࣲ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُۥ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِ إِن كُنتُمۡ ءَامَنتُم بِٱللَّهِ وَمَآ أَنزَلۡنَا عَلَىٰ عَبۡدِنَا يَوۡمَ ٱلۡفُرۡقَانِ يَوۡمَ ٱلۡتَقَى ٱلۡجَمۡعَانِۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءࣲ قَدِيرٌ ﴿٤١﴾

إِذۡ أَنتُم بِٱلۡعُدۡوَةِ ٱلدُّنۡيَا وَهُم بِٱلۡعُدۡوَةِ ٱلۡقُصۡوَىٰ وَٱلرَّكۡبُ أَسۡفَلَ مِنكُمۡۚ وَلَوۡ تَوَاعَدتُّمۡ لَٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِي ٱلۡمِيعَٰدِ وَلَٰكِن لِّيَقۡضِيَ ٱللَّهُ أَمۡرࣰا كَانَ مَفۡعُولࣰا لِّيَهۡلِكَ مَنۡ هَلَكَ عَنۢ بَيِّنَةࣲ وَيَحۡيَىٰ مَنۡ حَيَّ عَنۢ بَيِّنَةࣲۗ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَسَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿٤٢﴾

إِذۡ يُرِيكَهُمُ ٱللَّهُ فِي مَنَامِكَ قَلِيلࣰاۖ وَلَوۡ أَرَىٰكَهُمۡ كَثِيرࣰا لَّفَشِلۡتُمۡ وَلَتَنَٰزَعۡتُمۡ فِي ٱلۡأَمۡرِ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ سَلَّمَۚ إِنَّهُۥ عَلِيمُۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ﴿٤٣﴾

وَإِذۡ يُرِيكُمُوهُمۡ إِذِ ٱلۡتَقَيۡتُمۡ فِيٓ أَعۡيُنِكُمۡ قَلِيلࣰا وَيُقَلِّلُكُمۡ فِيٓ أَعۡيُنِهِمۡ لِيَقۡضِيَ ٱللَّهُ أَمۡرࣰا كَانَ مَفۡعُولࣰاۗ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرۡجَعُ ٱلۡأُمُورُ ﴿٤٤﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا لَقِيتُمۡ فِئَةࣰ فَٱثۡبُتُواْ وَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ كَثِيرࣰا لَّعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ ﴿٤٥﴾

وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَا تَنَٰزَعُواْ فَتَفۡشَلُواْ وَتَذۡهَبَ رِيحُكُمۡۖ وَٱصۡبِرُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ ﴿٤٦﴾

وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ خَرَجُواْ مِن دِيَٰرِهِم بَطَرࣰا وَرِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِۚ وَٱللَّهُ بِمَا يَعۡمَلُونَ مُحِيطࣱ ﴿٤٧﴾

وَإِذۡ زَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ أَعۡمَٰلَهُمۡ وَقَالَ لَا غَالِبَ لَكُمُ ٱلۡيَوۡمَ مِنَ ٱلنَّاسِ وَإِنِّي جَارࣱ لَّكُمۡۖ فَلَمَّا تَرَآءَتِ ٱلۡفِئَتَانِ نَكَصَ عَلَىٰ عَقِبَيۡهِ وَقَالَ إِنِّي بَرِيٓءࣱ مِّنكُمۡ إِنِّيٓ أَرَىٰ مَا لَا تَرَوۡنَ إِنِّيٓ أَخَافُ ٱللَّهَۚ وَٱللَّهُ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ﴿٤٨﴾

إِذۡ يَقُولُ ٱلۡمُنَٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ غَرَّ هَٰٓؤُلَآءِ دِينُهُمۡۗ وَمَن يَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمࣱ ﴿٤٩﴾

وَلَوۡ تَرَىٰٓ إِذۡ يَتَوَفَّى ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ يَضۡرِبُونَ وُجُوهَهُمۡ وَأَدۡبَٰرَهُمۡ وَذُوقُواْ عَذَابَ ٱلۡحَرِيقِ ﴿٥٠﴾

ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيكُمۡ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَيۡسَ بِظَلَّٰمࣲ لِّلۡعَبِيدِ ﴿٥١﴾

كَدَأۡبِ ءَالِ فِرۡعَوۡنَ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ كَفَرُواْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ فَأَخَذَهُمُ ٱللَّهُ بِذُنُوبِهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ قَوِيࣱّ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ﴿٥٢﴾

ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ لَمۡ يَكُ مُغَيِّرࣰا نِّعۡمَةً أَنۡعَمَهَا عَلَىٰ قَوۡمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُواْ مَا بِأَنفُسِهِمۡ وَأَنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمࣱ ﴿٥٣﴾

كَدَأۡبِ ءَالِ فِرۡعَوۡنَ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِ رَبِّهِمۡ فَأَهۡلَكۡنَٰهُم بِذُنُوبِهِمۡ وَأَغۡرَقۡنَآ ءَالَ فِرۡعَوۡنَۚ وَكُلࣱّ كَانُواْ ظَٰلِمِينَ ﴿٥٤﴾

إِنَّ شَرَّ ٱلدَّوَآبِّ عِندَ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ فَهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ ﴿٥٥﴾

ٱلَّذِينَ عَٰهَدتَّ مِنۡهُمۡ ثُمَّ يَنقُضُونَ عَهۡدَهُمۡ فِي كُلِّ مَرَّةࣲ وَهُمۡ لَا يَتَّقُونَ ﴿٥٦﴾

فَإِمَّا تَثۡقَفَنَّهُمۡ فِي ٱلۡحَرۡبِ فَشَرِّدۡ بِهِم مَّنۡ خَلۡفَهُمۡ لَعَلَّهُمۡ يَذَّكَّرُونَ ﴿٥٧﴾

وَإِمَّا تَخَافَنَّ مِن قَوۡمٍ خِيَانَةࣰ فَٱنۢبِذۡ إِلَيۡهِمۡ عَلَىٰ سَوَآءٍۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلۡخَآئِنِينَ ﴿٥٨﴾

وَلَا يَحۡسَبَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ سَبَقُوٓاْۚ إِنَّهُمۡ لَا يُعۡجِزُونَ ﴿٥٩﴾

وَأَعِدُّواْ لَهُم مَّا ٱسۡتَطَعۡتُم مِّن قُوَّةࣲ وَمِن رِّبَاطِ ٱلۡخَيۡلِ تُرۡهِبُونَ بِهِۦ عَدُوَّ ٱللَّهِ وَعَدُوَّكُمۡ وَءَاخَرِينَ مِن دُونِهِمۡ لَا تَعۡلَمُونَهُمُ ٱللَّهُ يَعۡلَمُهُمۡۚ وَمَا تُنفِقُواْ مِن شَيۡءࣲ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ يُوَفَّ إِلَيۡكُمۡ وَأَنتُمۡ لَا تُظۡلَمُونَ ﴿٦٠﴾

۞ وَإِن جَنَحُواْ لِلسَّلۡمِ فَٱجۡنَحۡ لَهَا وَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ ﴿٦١﴾

وَإِن يُرِيدُوٓاْ أَن يَخۡدَعُوكَ فَإِنَّ حَسۡبَكَ ٱللَّهُۚ هُوَ ٱلَّذِيٓ أَيَّدَكَ بِنَصۡرِهِۦ وَبِٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿٦٢﴾

وَأَلَّفَ بَيۡنَ قُلُوبِهِمۡۚ لَوۡ أَنفَقۡتَ مَا فِي ٱلۡأَرۡضِ جَمِيعࣰا مَّآ أَلَّفۡتَ بَيۡنَ قُلُوبِهِمۡ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ أَلَّفَ بَيۡنَهُمۡۚ إِنَّهُۥ عَزِيزٌ حَكِيمࣱ ﴿٦٣﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ حَسۡبُكَ ٱللَّهُ وَمَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿٦٤﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ حَرِّضِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ عَلَى ٱلۡقِتَالِۚ إِن يَكُن مِّنكُمۡ عِشۡرُونَ صَٰبِرُونَ يَغۡلِبُواْ مِاْئَتَيۡنِۚ وَإِن يَكُن مِّنكُم مِّاْئَةࣱ يَغۡلِبُوٓاْ أَلۡفࣰا مِّنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بِأَنَّهُمۡ قَوۡمࣱ لَّا يَفۡقَهُونَ ﴿٦٥﴾

ٱلۡـَٰٔنَ خَفَّفَ ٱللَّهُ عَنكُمۡ وَعَلِمَ أَنَّ فِيكُمۡ ضَعۡفࣰاۚ فَإِن يَكُن مِّنكُم مِّاْئَةࣱ صَابِرَةࣱ يَغۡلِبُواْ مِاْئَتَيۡنِۚ وَإِن يَكُن مِّنكُمۡ أَلۡفࣱ يَغۡلِبُوٓاْ أَلۡفَيۡنِ بِإِذۡنِ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ ﴿٦٦﴾

مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَن يَكُونَ لَهُۥٓ أَسۡرَىٰ حَتَّىٰ يُثۡخِنَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ تُرِيدُونَ عَرَضَ ٱلدُّنۡيَا وَٱللَّهُ يُرِيدُ ٱلۡأٓخِرَةَۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمࣱ ﴿٦٧﴾

لَّوۡلَا كِتَٰبࣱ مِّنَ ٱللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمۡ فِيمَآ أَخَذۡتُمۡ عَذَابٌ عَظِيمࣱ ﴿٦٨﴾

فَكُلُواْ مِمَّا غَنِمۡتُمۡ حَلَٰلࣰا طَيِّبࣰاۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورࣱ رَّحِيمࣱ ﴿٦٩﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ قُل لِّمَن فِيٓ أَيۡدِيكُم مِّنَ ٱلۡأَسۡرَىٰٓ إِن يَعۡلَمِ ٱللَّهُ فِي قُلُوبِكُمۡ خَيۡرࣰا يُؤۡتِكُمۡ خَيۡرࣰا مِّمَّآ أُخِذَ مِنكُمۡ وَيَغۡفِرۡ لَكُمۡۚ وَٱللَّهُ غَفُورࣱ رَّحِيمࣱ ﴿٧٠﴾

وَإِن يُرِيدُواْ خِيَانَتَكَ فَقَدۡ خَانُواْ ٱللَّهَ مِن قَبۡلُ فَأَمۡكَنَ مِنۡهُمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿٧١﴾

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلَّذِينَ ءَاوَواْ وَّنَصَرُوٓاْ أُوْلَٰٓئِكَ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِيَآءُ بَعۡضࣲۚ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَلَمۡ يُهَاجِرُواْ مَا لَكُم مِّن وَلَٰيَتِهِم مِّن شَيۡءٍ حَتَّىٰ يُهَاجِرُواْۚ وَإِنِ ٱسۡتَنصَرُوكُمۡ فِي ٱلدِّينِ فَعَلَيۡكُمُ ٱلنَّصۡرُ إِلَّا عَلَىٰ قَوۡمِۭ بَيۡنَكُمۡ وَبَيۡنَهُم مِّيثَٰقࣱۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرࣱ ﴿٧٢﴾

وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِيَآءُ بَعۡضٍۚ إِلَّا تَفۡعَلُوهُ تَكُن فِتۡنَةࣱ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَفَسَادࣱ كَبِيرࣱ ﴿٧٣﴾

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلَّذِينَ ءَاوَواْ وَّنَصَرُوٓاْ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ حَقࣰّاۚ لَّهُم مَّغۡفِرَةࣱ وَرِزۡقࣱ كَرِيمࣱ ﴿٧٤﴾

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مِنۢ بَعۡدُ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ مَعَكُمۡ فَأُوْلَٰٓئِكَ مِنكُمۡۚ وَأُوْلُواْ ٱلۡأَرۡحَامِ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلَىٰ بِبَعۡضࣲ فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمُۢ ﴿٧٥﴾