02 Oct, 2026
Surah Araf Hindi | सूरह अल आराफ़ हिंदी
Surah Araf in Hindi meanning and ucharan | सूरह अल आराफ़ हिंदी में
सूरह अल-आराफ़ हिंदी में | Surah Al-A'raf Hindi
सूरह अल-आराफ़ (Surah Al-A'raf) कुरआन शरीफ़ की 7वीं सूरह है। यह मक्की सूरह है और इसमें कुल 206 आयतें हैं। इस पेज पर सूरह अल-आराफ़ की हिंदी लिपि में उच्चारण सहित आयतें पढ़ सकते हैं। जो लोग हिंदी में सूरह अल-आराफ़ पढ़ना और उसका उच्चारण सीखना चाहते हैं, उनके लिए यह पेज उपयोगी है।
7 · Al-Aʿrāf
Al-Aʿrāf · अल-आराफ़
Makkī · 206 āyāt
Surah Araf in Hindi ucharan
बिस्मिल्लाहिर्-रहमानिर्-रहीम्
1
अलिफ़ लाम् मीम् साद्
2
किताबुन् उन्ज़िला इलैक फ़ला यकुन् फ़ी सद्रिक हरजुम्-मिन्हु लितुन्ज़िर बिही व ज़िक्रा लिल्मु'मिनीन्
3
इत्तबि'ऊ मा उन्ज़िल इलैकुम्-मिर्-रब्बिकुम् व ला तत्तबि'ऊ मिन् दूनिही औलिया'अ क़लीलम्-मा तज़क्करून्
4
व कम्-मिन् क़र्यतिन् अह्लक्नाहा फ़जा'अहा बा'सुना बयातन् औ हुम् क़ा'इलून्
5
फ़मा कान दा'वाहुम् इज़् जा'अहुम् बा'सुना इल्ला अन् क़ालू इन्ना कुन्ना ज़ालिमीन्
6
फ़लनस्'अलन्नल्लज़ीन उर्सिला इलैहिम् व लनस्'अलन्नल्-मुर्सलीन्
7
फ़लनक़ुस्सन्न अलैहिम् बि'इल्मिव्-व मा कुन्ना ग़ा'इबीन्
8
वल्-वज़्नु यौम'इज़िनिल्-हक़्क़ु फ़मन् सक़ुलत् मवाज़ीनुहू फ़उला'इक हुमुल्-मुफ़्लिहून्
9
व मन् ख़फ़्फ़त् मवाज़ीनुहू फ़उला'इकल्लज़ीन ख़सिरू अन्फ़ुसहुम् बिमा कानू बिआयातिना यज़्लिमून्
10
व लक़द् मक्कन्नाकुम् फ़िल्-अर्दि व ज'अल्ना लकुम् फ़ीहा म'आयिश क़लीलम्-मा तश्कुरून्
11
व लक़द् ख़लक़्नाकुम् सुम्म सव्वर्नाकुम् सुम्म क़ुल्ना लिल्मला'इकतिस्-जुदू लिआदम फ़सजदू इल्ला इब्लीस लम् यकुम्-मिनस्-साजिदीन्
12
क़ाल मा मन'अक अल्ला तस्जुद इज़् अमर्तुक क़ाल अना ख़ैरुम्-मिन्हु ख़लक़्तनी मिन्-नारिव्-व ख़लक़्तहू मिन् तीन्
13
क़ाल फ़ह्बित् मिन्हा फ़मा यकूनु लक अन् ततकब्बर फ़ीहा फ़ख़्रुज् इन्नक मिनस्-साग़िरीन्
14
क़ाल अन्ज़िर्नी इला यौमि युब्'असून्
15
क़ाल इन्नक मिनल्-मुन्ज़रीन्
16
क़ाल फ़बिमा अग़्वैतनी लअक़्'उदन्न लहुम् सिरातकल्-मुस्तक़ीम्
17
सुम्म लआतियन्नहुम्-मिम्-बैनि ऐदीहिम् व मिन् ख़ल्फ़िहिम् व अन् ऐमानिहिम् व अन् शमा'इलिहिम् व ला तजिदु अक्सरहुम् शाकिरीन्
18
क़ालख़्-रुज् मिन्हा मज़्'ऊमम्-मद्हूरल्-लमन् तबि'अक मिन्हुम् लअम्ल'अन्न जहन्नम मिन्कुम् अज्म'ईन्
19
व या आदमुस्-कुन् अन्त व ज़ौजुकल्-जन्नत फ़कुला मिन् हैसु शि'तुमा व ला तक़्रबा हाज़िहिश्-शजरत फ़तकूना मिनज़्-ज़ालिमीन्
20
फ़वस्वस लहुमश्-शैतानु लियुब्दिय लहुमा मा वूरिय अन्हुमा मिन् सौआतिहिमा व क़ाल मा नहाकुमा रब्बुकुमा अन् हाज़िहिश्-शजरति इल्ला अन् तकूना मलकैनि औ तकूना मिनल्-ख़ालिदीन्
21
व क़ासमहुमा इन्नी लकुमा लमिनन्-नासिहीन्
22
फ़दल्लाहुमा बिग़ुरूरिन् फ़लम्मा ज़ाक़श्-शजरत बदत् लहुमा सौआतुहुमा व तफ़िक़ा यख़्सिफ़ानि अलैहिमा मिव्-वरक़िल्-जन्नति व नादाहुमा रब्बुहुमा अलम् अन्हकुमा अन् तिल्कुमश्-शजरति व अक़ुल्-लकुमा इन्नश्-शैतान लकुमा अदुव्वुम्-मुबीन्
23
क़ाला रब्बना ज़लम्ना अन्फ़ुसना व इल्-लम् तग़्फ़िर् लना व तर्हम्ना लनकूनन्न मिनल्-ख़ासिरीन्
24
क़ाल अह्बितू बा'दुकुम् लिबा'दिन् अदुव्वुव्-व लकुम् फ़िल्-अर्दि मुस्तक़र्रुव्-व मता'उन् इला हीन्
25
क़ाल फ़ीहा तह्यौन व फ़ीहा तमूतून व मिन्हा तुख़्रजून्
26
या बनी आदम क़द् अन्ज़ल्ना अलैकुम् लिबासय्-युवारी सौआतिकुम् व रीशव्-व लिबासुत्-तक़्वा ज़ालिक ख़ैरुन् ज़ालिक मिन् आयातिल्लाहि ल'अल्लहुम् यज़्ज़क्करून्
27
या बनी आदम ला यफ़्तिनन्नकुमुश्-शैतानु कमा अख़्रज अबवैकुम्-मिनल्-जन्नति यन्ज़ि'उ अन्हुमा लिबासहुमा लियुरियहुमा सौआतिहिमा इन्नहू यराकुम् हुव व क़बीलुहू मिन् हैसु ला तरौनहुम् इन्ना ज'अल्नश्-शयातीन औलिया'अ लिल्लज़ीन ला यु'मिनून्
28
व इज़ा फ़'अलू फ़ाहिशतन् क़ालू वजद्ना अलैहा आबा'अना वल्लाहु अमरना बिहा क़ुल् इन्नल्लाह ला या'मुरु बिल्-फ़ह्शा'इ अतक़ूलून अलल्लाहि मा ला ता'लमून्
29
क़ुल् अमर रब्बी बिल्-क़िस्ति व अक़ीमू वुजूहकुम् इन्द कुल्लि मस्जिदिव्-वद्'ऊहु मुख़्लिसीन लहुद्-दीन कमा बद'अकुम् त'ऊदून्
30
फ़रीक़न् हदा व फ़रीक़न् हक़्क़ अलैहिमुद्-दलालतु इन्नहुमुत्-तख़ज़ुश्-शयातीन औलिया'अ मिन् दूनिल्लाहि व यह्सबून अन्नहुम्-मुह्तदून्
31
या बनी आदम ख़ुज़ू ज़ीनतकुम् इन्द कुल्लि मस्जिदिव्-व कुलू वश्रबू व ला तुस्रिफ़ू इन्नहू ला युहिब्बुल्-मुस्रिफ़ीन्
32
क़ुल् मन् हर्रम ज़ीनतल्लाहिल्लती अख़्रज लि'इबादिही वत्-तय्यिबाति मिनर्-रिज़्क़ि क़ुल् हिय लिल्लज़ीन आमनू फ़िल्-हयातिद्-दुन्या ख़ालिसतय्-यौमल्-क़ियामति कज़ालिक नुफ़स्सिलुल्-आयाति लिक़ौमिय्-या'लमून्
33
क़ुल् इन्नमा हर्रम रब्बियल्-फ़वाहिश मा ज़हर मिन्हा व मा बतन वल्-इस्म वल्-बग़्य बिग़ैरिल्-हक़्क़ि व अन् तुश्रिकू बिल्लाहि मा लम् युनज़्ज़िल् बिही सुल्तानव्-व अन् तक़ूलू अलल्लाहि मा ला ता'लमून्
34
व लिकुल्लि उम्मतिन् अजलुन् फ़इज़ा जा'अ अजलुहुम् ला यस्ता'ख़िरून सा'अतव्-व ला यस्तक़्दिमून्
35
या बनी आदम इम्मा या'तियन्नकुम् रुसुलुम्-मिन्कुम् यक़ुस्सून अलैकुम् आयाती फ़मनित्-तक़ा व अस्लह फ़ला ख़ौफ़ुन् अलैहिम् व ला हुम् यह्ज़नून्
36
वल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना वस्तक्बरू अन्हा उला'इक अस्हाबुन्-नारि हुम् फ़ीहा ख़ालिदून्
37
फ़मन् अज़्लमु मिम्मनिफ़्-तरा अलल्लाहि कज़िबन् औ कज़्ज़ब बिआयातिही उला'इक यनालुहुम् नसीबुहुम्-मिनल्-किताबि हत्ता इज़ा जा'अत्हुम् रुसुलुना यतवफ़्फ़ौनहुम् क़ालू ऐन मा कुन्तुम् तद्'ऊन मिन् दूनिल्लाहि क़ालू दल्लू अन्ना व शहिदू अला अन्फ़ुसिहिम् अन्नहुम् कानू काफ़िरीन्
38
क़ालद्-ख़ुलू फ़ी उममिन् क़द् ख़लत् मिन् क़ब्लिकुम्-मिनल्-जिन्नि वल्-इन्सि फ़िन्-नारि कुल्लमा दख़लत् उम्मतुल्-ल'अनत् उख़्तहा हत्ता इज़द्-दारकू फ़ीहा जमी'अन् क़ालत् उख़्राहुम् लिऊलाहुम् रब्बना हा'उला'इ अदल्लूना फ़आतिहिम् अज़ाबन् दि'फ़म्-मिनन्-नारि क़ाल लिकुल्लिन् दि'फ़ुव्-व लाकिल्-ला ता'लमून्
39
व क़ालत् ऊलाहुम् लिउख़्राहुम् फ़मा कान लकुम् अलैना मिन् फ़द्लिन् फ़ज़ूक़ुल्-अज़ाब बिमा कुन्तुम् तक्सिबून्
40
इन्नल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना वस्तक्बरू अन्हा ला तुफ़त्तहु लहुम् अब्वाबुस्-समा'इ व ला यद्ख़ुलूनल्-जन्नत हत्ता यलिजल्-जमलु फ़ी सम्मिल्-ख़ियाति व कज़ालिक नज्ज़िल्-मुज्रिमीन्
41
लहुम्-मिन् जहन्नम मिहादुव्-व मिन् फ़ौक़िहिम् ग़वाशिव्-व कज़ालिक नज्ज़िज़्-ज़ालिमीन्
42
वल्लज़ीन आमनू व अमिलुस्-सालिहाति ला नुकल्लिफ़ु नफ़्सन् इल्ला वुस्'अहा उला'इक अस्हाबुल्-जन्नति हुम् फ़ीहा ख़ालिदून्
43
व नज़ा'ना मा फ़ी सुदूरिहिम्-मिन् ग़िल्लिन् तज्री मिन् तह्तिहिमुल्-अन्हारु व क़ालुल्-हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी हदाना लिहाज़ा व मा कुन्ना लिनह्तदिय लौला अन् हदानल्लाहु लक़द् जा'अत् रुसुलु रब्बिना बिल्-हक़्क़ि व नूदू अन् तिल्कुमुल्-जन्नतु ऊरिस्तुमूहा बिमा कुन्तुम् ता'मलून्
44
व नादा अस्हाबुल्-जन्नति अस्हाबन्-नारि अन् क़द् वजद्ना मा व'अदना रब्बुना हक़्क़न् फ़हल् वजत्तुम्-मा व'अद रब्बुकुम् हक़्क़न् क़ालू न'अम् फ़अज़्ज़न मु'अज़्ज़िनुम्-बैनहुम् अल्-ला'नतुल्लाहि अलज़्-ज़ालिमीन्
45
अल्लज़ीन यसुद्दून अन् सबीलिल्लाहि व यब्ग़ूनहा इवजव्-व हुम् बिल्-आख़िरति काफ़िरून्
46
व बैनहुमा हिजाबुव्-व अलल्-आ'राफ़ि रिजालुय्-या'रिफ़ून कुल्लम्-बिसीमाहुम् व नादौ अस्हाबल्-जन्नति अन् सलामुन् अलैकुम् लम् यद्ख़ुलूहा व हुम् यत्म'ऊन्
47
व इज़ा सुरिफ़त् अब्सारुहुम् तिल्क़ा'अ अस्हाबिन्-नारि क़ालू रब्बना ला तज्'अल्ना म'अल्-क़ौमिज़्-ज़ालिमीन्
48
व नादा अस्हाबुल्-आ'राफ़ि रिजालय्-या'रिफ़ूनहुम् बिसीमाहुम् क़ालू मा अग़्ना अन्कुम् जम्'उकुम् व मा कुन्तुम् तस्तक्बिरून्
49
अहा'उला'इल्लज़ीन अक़्सम्तुम् ला यनालुहुमुल्लाहु बिरह्मतिनिद्-ख़ुलुल्-जन्नत ला ख़ौफ़ुन् अलैकुम् व ला अन्तुम् तह्ज़नून्
50
व नादा अस्हाबुन्-नारि अस्हाबल्-जन्नति अन् अफ़ीदू अलैना मिनल्-मा'इ औ मिम्मा रज़क़कुमुल्लाहु क़ालू इन्नल्लाह हर्रमहुमा अलल्-काफ़िरीन्
51
अल्लज़ीनत्-तख़ज़ू दीनहुम् लह्वव्-व ल'इबव्-व ग़र्रत्हुमुल्-हयातुद्-दुन्या फ़ल्यौम नन्साहुम् कमा नसू लिक़ा'अ यौमिहिम् हाज़ा व मा कानू बिआयातिना यज्हदून्
52
व लक़द् जि'नाहुम् बिकिताबिन् फ़स्सल्नाहु अला इल्मिन् हुदव्-व रह्मतल्-लिक़ौमिय्-यु'मिनून्
53
हल् यन्ज़ुरून इल्ला ता'वीलहू यौम या'ती ता'वीलुहू यक़ूलुल्लज़ीन नसूहु मिन् क़ब्लु क़द् जा'अत् रुसुलु रब्बिना बिल्-हक़्क़ि फ़हल्-लना मिन् शुफ़'आ'अ फ़यश्फ़'ऊ लना औ नुरद्दु फ़ना'मल ग़ैरल्लज़ी कुन्ना ना'मलु क़द् ख़सिरू अन्फ़ुसहुम् व दल्ल अन्हुम्-मा कानू यफ़्तरून्
54
इन्न रब्बकुमुल्लाहुल्लज़ी ख़लक़स्-समावाति वल्-अर्द फ़ी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्-तवा अलल्-अर्शि युग़्शिल्-लैलन्-नहार यत्लुबुहू हसीसव्-वश्-शम्स वल्-क़मर वन्-नुजूम मुसख़्ख़रातिम्-बिअम्रिही अला लहुल्-ख़ल्क़ु वल्-अम्रु तबारकल्लाहु रब्बुल्-आलमीन्
55
उद्'ऊ रब्बकुम् तदर्रु'अव्-व ख़ुफ़्यतन् इन्नहू ला युहिब्बुल्-मु'तदीन्
56
व ला तुफ़्सिदू फ़िल्-अर्दि बा'द इस्लाहिहा वद्'ऊहु ख़ौफ़व्-व तम'अन् इन्न रह्मतल्लाहि क़रीबुम्-मिनल्-मुह्सिनीन्
57
व हुवल्लज़ी युर्सिलुर्-रियाह बुश्रम्-बैन यदय् रह्मतिही हत्ता इज़ा अक़ल्लत् सहाबन् सिक़ालन् सुक़्नाहु लिबलदिम्-मय्यितिन् फ़अन्ज़ल्ना बिहिल्-मा'अ फ़अख़्रज्ना बिही मिन् कुल्लिस्-समराति कज़ालिक नुख़्रिजुल्-मौता ल'अल्लकुम् तज़क्करून्
58
वल्-बलदुत्-तय्यिबु यख़्रुजु नबातुहू बिइज़्नि रब्बिही वल्लज़ी ख़बुस ला यख़्रुजु इल्ला नकिदन् कज़ालिक नुसर्रिफ़ुल्-आयाति लिक़ौमिय्-यश्कुरून्
59
लक़द् अर्सल्ना नूहन् इला क़ौमिही फ़क़ाल या क़ौमि'बुदुल्लाह मा लकुम्-मिन् इलाहिन् ग़ैरुहू इन्नी अख़ाफ़ु अलैकुम् अज़ाब यौमिन् अज़ीम्
60
क़ालल्-मल'उ मिन् क़ौमिही इन्ना लनराक फ़ी दलालिम्-मुबीन्
61
क़ाल या क़ौमि लैस बी दलालतुव्-व लाकिन्नी रसूलुम्-मिर्-रब्बिल्-आलमीन्
62
उबल्लिग़ुकुम् रिसालाति रब्बी व अन्सहु लकुम् व आ'लमु मिनल्लाहि मा ला ता'लमून्
63
अव अजिब्तुम् अन् जा'अकुम् ज़िक्रुम्-मिर्-रब्बिकुम् अला रजुलिम्-मिन्कुम् लियुन्ज़िरकुम् व लितत्तक़ू व ल'अल्लकुम् तुर्हमून्
64
फ़कज़्ज़बूहु फ़अन्जैनाहु वल्लज़ीन म'अहू फ़िल्-फ़ुल्कि व अग़्रक़्नल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना इन्नहुम् कानू क़ौमन् अमीन्
65
व इला आदिन् अख़ाहुम् हूदन् क़ाल या क़ौमि'बुदुल्लाह मा लकुम्-मिन् इलाहिन् ग़ैरुहू अफ़ला तत्तक़ून्
66
क़ालल्-मल'उल्लज़ीन कफ़रू मिन् क़ौमिही इन्ना लनराक फ़ी सफ़ाहतिव्-व इन्ना लनज़ुन्नुक मिनल्-काज़िबीन्
67
क़ाल या क़ौमि लैस बी सफ़ाहतुव्-व लाकिन्नी रसूलुम्-मिर्-रब्बिल्-आलमीन्
68
उबल्लिग़ुकुम् रिसालाति रब्बी व अन लकुम् नासिहुन् अमीन्
69
अव अजिब्तुम् अन् जा'अकुम् ज़िक्रुम्-मिर्-रब्बिकुम् अला रजुलिम्-मिन्कुम् लियुन्ज़िरकुम् वज़्कुरू इज़् ज'अलकुम् ख़ुलफ़ा'अ मिम्-बा'दि क़ौमि नूहिव्-व ज़ादकुम् फ़िल्-ख़ल्क़ि बस्ततन् फ़ज़्कुरू आला'अल्लाहि ल'अल्लकुम् तुफ़्लिहून्
70
क़ालू अजि'तना लिना'बुदल्लाह वह्दहू व नज़र मा कान या'बुदु आबा'उना फ़ा'तिना बिमा त'िदुना इन् कुन्त मिनस्-सादिक़ीन्
71
क़ाल क़द् वक़'अ अलैकुम्-मिर्-रब्बिकुम् रिज्सुव्-व ग़दबुन् अतुजादिलूननी फ़ी अस्मा'इन् सम्मैतुमूहा अन्तुम् व आबा'उकुम्-मा नज़्ज़लल्लाहु बिहा मिन् सुल्तानिन् फ़न्तज़िरू इन्नी म'अकुम्-मिनल्-मुन्तज़िरीन्
72
फ़अन्जैनाहु वल्लज़ीन म'अहू बिरह्मतिम्-मिन्ना व क़ता'ना दाबिरल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना व मा कानू मु'मिनीन्
73
व इला समूद अख़ाहुम् सालिहन् क़ाल या क़ौमि'बुदुल्लाह मा लकुम्-मिन् इलाहिन् ग़ैरुहू क़द् जा'अत्कुम् बय्यिनतुम्-मिर्-रब्बिकुम् हाज़िही नाक़तुल्लाहि लकुम् आयतन् फ़ज़रूहा ता'कुल् फ़ी अर्दिल्लाहि व ला तमस्सूहा बिसू'इन् फ़या'ख़ुज़कुम् अज़ाबुन् अलीम्
74
वज़्कुरू इज़् ज'अलकुम् ख़ुलफ़ा'अ मिम्-बा'दि आदिव्-व बव्व'अकुम् फ़िल्-अर्दि तत्तख़िज़ून मिन् सुहूलिहा क़ुसूरव्-व तन्हितूनल्-जिबाल बुयूतन् फ़ज़्कुरू आला'अल्लाहि व ला ता'सौ फ़िल्-अर्दि मुफ़्सिदीन्
75
क़ालल्-मल'उल्लज़ीनस्-तक्बरू मिन् क़ौमिही लिल्लज़ीनस्-तुद्'इफ़ू लिमन् आमन मिन्हुम् अता'लमून अन्न सालिहम्-मुर्सलुम्-मिर्-रब्बिही क़ालू इन्ना बिमा उर्सिल बिही मु'मिनून्
76
क़ालल्लज़ीनस्-तक्बरू इन्ना बिल्लज़ी आमन्तुम् बिही काफ़िरून्
77
फ़अक़रुन्-नाक़त व अतौ अन् अम्रि रब्बिहिम् व क़ालू या सालिहुअ्-तिना बिमा त'िदुना इन् कुन्त मिनल्-मुर्सलीन्
78
फ़अख़ज़त्हुमुर्-रज्फ़तु फ़अस्बहू फ़ी दारिहिम् जासिमीन्
79
फ़तवल्ला अन्हुम् व क़ाल या क़ौमि लक़द् अब्लग़्तुकुम् रिसालत रब्बी व नसह्तु लकुम् व लाकिल्-ला तुहिब्बूनन्-नासिहीन्
80
व लूतन् इज़् क़ाल लिक़ौमिही अता'तूनल्-फ़ाहिशत मा सबक़कुम् बिहा मिन् अहदिम्-मिनल्-आलमीन्
81
इन्नकुम् लता'तूनर्-रिजाल शह्वतम्-मिन् दूनिन्-निसा'इ बल् अन्तुम् क़ौमुम्-मुस्रिफ़ून्
82
व मा कान जवाब क़ौमिही इल्ला अन् क़ालू अख़्रिजूहुम्-मिन् क़र्यतिकुम् इन्नहुम् उनासुय्-यततह्हरून्
83
फ़अन्जैनाहु व अह्लहू इल्लम्-र'अतहू कानत् मिनल्-ग़ाबिरीन्
84
व अम्तर्ना अलैहिम्-मतरन् फ़न्ज़ुर् कैफ़ कान आक़िबतुल्-मुज्रिमीन्
85
व इला मद्यन अख़ाहुम् शु'ऐबन् क़ाल या क़ौमि'बुदुल्लाह मा लकुम्-मिन् इलाहिन् ग़ैरुहू क़द् जा'अत्कुम् बय्यिनतुम्-मिर्-रब्बिकुम् फ़औफ़ुल्-कैल वल्-मीज़ान व ला तब्ख़सुन्-नास अश्या'अहुम् व ला तुफ़्सिदू फ़िल्-अर्दि बा'द इस्लाहिहा ज़ालिकुम् ख़ैरुल्-लकुम् इन् कुन्तुम्-मु'मिनीन्
86
व ला तक़्'उदू बिकुल्लि सिरातिन् तू'इदून व तसुद्दून अन् सबीलिल्लाहि मन् आमन बिही व तब्ग़ूनहा इवजव्-वज़्कुरू इज़् कुन्तुम् क़लीलन् फ़कस्सरकुम् वन्ज़ुरू कैफ़ कान आक़िबतुल्-मुफ़्सिदीन्
87
व इन् कान ता'इफ़तुम्-मिन्कुम् आमनू बिल्लज़ी उर्सिल्तु बिही व ता'इफ़तुल्-लम् यु'मिनू फ़स्बिरू हत्ता यह्कुमल्लाहु बैनना व हुव ख़ैरुल्-हाकिमीन्
End of Juz 8 · Juz 9 begins
88
क़ालल्-मल'उल्लज़ीनस्-तक्बरू मिन् क़ौमिही लनुख़्रिजन्नक या शु'ऐबु वल्लज़ीन आमनू म'अक मिन् क़र्यतिना औ लत'ऊदुन्न फ़ी मिल्लतिना क़ाल अवलौ कुन्ना कारिहीन्
89
क़दिफ़्-तरैना अलल्लाहि कज़िबन् इन् उद्ना फ़ी मिल्लतिकुम् बा'द इज़् नज्जानल्लाहु मिन्हा व मा यकूनु लना अन्-न'ऊद फ़ीहा इल्ला अय्-यशा'अल्लाहु रब्बुना वसि'अ रब्बुना कुल्ल शै'इन् इल्मन् अलल्लाहि तवक्कल्ना रब्बनफ़्-तह् बैनना व बैन क़ौमिना बिल्-हक़्क़ि व अन्त ख़ैरुल्-फ़ातिहीन्
90
व क़ालल्-मल'उल्लज़ीन कफ़रू मिन् क़ौमिही लइनित्-तबा'तुम् शु'ऐबन् इन्नकुम् इज़ल्-लख़ासिरून्
91
फ़अख़ज़त्हुमुर्-रज्फ़तु फ़अस्बहू फ़ी दारिहिम् जासिमीन्
92
अल्लज़ीन कज़्ज़बू शु'ऐबन् कअल्-लम् यग़्नौ फ़ीहल्-लज़ीन कज़्ज़बू शु'ऐबन् कानू हुमुल्-ख़ासिरीन्
93
फ़तवल्ला अन्हुम् व क़ाल या क़ौमि लक़द् अब्लग़्तुकुम् रिसालाति रब्बी व नसह्तु लकुम् फ़कैफ़ आसा अला क़ौमिन् काफ़िरीन्
94
व मा अर्सल्ना फ़ी क़र्यतिम्-मिन्-नबिय्यिन् इल्ला अख़ज़्ना अह्लहा बिल्-बा'सा'इ वद्-दर्रा'इ ल'अल्लहुम् यद्दर्र'ऊन्
95
सुम्म बद्दल्ना मकानस्-सय्यि'अतिल्-हसनत हत्ता अफ़व्-व क़ालू क़द् मस्स आबा'अना अद्-दर्रा'उ वस्-सर्रा'उ फ़अख़ज़्नाहुम् बग़्ततव्-व हुम् ला यश्'उरून्
96
व लौ अन्न अह्लल्-क़ुरा आमनू वत्तक़ौ लफ़तह्ना अलैहिम् बरकातिम्-मिनस्-समा'इ वल्-अर्दि व लाकिन् कज़्ज़बू फ़अख़ज़्नाहुम् बिमा कानू यक्सिबून्
97
अफ़अमिन अह्लुल्-क़ुरा अय्-या'तियहुम् बा'सुना बयातव्-व हुम् ना'इमून्
98
अवअमिन अह्लुल्-क़ुरा अय्-या'तियहुम् बा'सुना दुहव्-व हुम् यल्'अबून्
99
अफ़अमिनू मक्रल्लाहि फ़ला या'मनु मक्रल्लाहि इल्लल्-क़ौमुल्-ख़ासिरून्
100
अवलम् यह्दि लिल्लज़ीन यरिसूनल्-अर्द मिम्-बा'दि अह्लिहा अल्-लौ नशा'उ असब्नाहुम् बिज़ुनूबिहिम् व नत्ब'उ अला क़ुलूबिहिम् फ़हुम् ला यस्म'ऊन्
101
तिल्कल्-क़ुरा नक़ुस्सु अलैक मिन् अम्बा'इहा व लक़द् जा'अत्हुम् रुसुलुहुम् बिल्-बय्यिनाति फ़मा कानू लियु'मिनू बिमा कज़्ज़बू मिन् क़ब्लु कज़ालिक यत्ब'उल्लाहु अला क़ुलूबिल्-काफ़िरीन्
102
व मा वजद्ना लिअक्सरिहिम्-मिन् अह्दिव्-व इव्-वजद्ना अक्सरहुम् लफ़ासिक़ीन्
103
सुम्म ब'अस्ना मिम्-बा'दिहिम्-मूसा बिआयातिना इला फ़िर्'औन व मल'इही फ़ज़लमू बिहा फ़न्ज़ुर् कैफ़ कान आक़िबतुल्-मुफ़्सिदीन्
104
व क़ाल मूसा या फ़िर्'औनु इन्नी रसूलुम्-मिर्-रब्बिल्-आलमीन्
105
हक़ीक़ुन् अला अल्-ला अक़ूल अलल्लाहि इल्लल्-हक़्क़ क़द् जि'तुकुम् बिबय्यिनतिम्-मिर्-रब्बिकुम् फ़अर्सिल् म'इय बनी इस्रा'ईल्
106
क़ाल इन् कुन्त जि'त बिआयतिन् फ़ा'ति बिहा इन् कुन्त मिनस्-सादिक़ीन्
107
फ़अल्क़ा असाहु फ़इज़ा हिय सु'बानुम्-मुबीन्
108
व नज़'अ यदहू फ़इज़ा हिय बैदा'उ लिन्-नाज़िरीन्
109
क़ालल्-मल'उ मिन् क़ौमि फ़िर्'औन इन्न हाज़ा लसाहिरुन् अलीम्
110
युरीदु अय्-युख़्रिजकुम्-मिन् अर्दिकुम् फ़माज़ा ता'मुरून्
111
क़ालू अर्जिह् व अख़ाहु व अर्सिल् फ़िल्-मदा'इनि हाशिरीन्
112
या'तूक बिकुल्लि साहिरिन् अलीम्
113
व जा'अस्-सहरतु फ़िर्'औन क़ालू इन्न लना लअज्रन् इन् कुन्ना नह्नुल्-ग़ालिबीन्
114
क़ाल न'अम् व इन्नकुम् लमिनल्-मुक़र्रबीन्
115
क़ालू या मूसा इम्मा अन् तुल्क़िय व इम्मा अन्-नकून नह्नुल्-मुल्क़ीन्
116
क़ाल अल्क़ू फ़लम्मा अल्क़ौ सहरू आ'युनन्-नासि वस्तर्हबूहुम् व जा'ऊ बिसिह्रिन् अज़ीम्
117
व औहैना इला मूसा अन् अल्क़ि असाक फ़इज़ा हिय तल्क़फ़ु मा या'फ़िकून्
118
फ़वक़'अल्-हक़्क़ु व बतल मा कानू या'मलून्
119
फ़ग़ुलिबू हुनालिक वन्क़लबू साग़िरीन्
120
व उल्क़ियस्-सहरतु साजिदीन्
121
क़ालू आमन्ना बिरब्बिल्-आलमीन्
122
रब्बि मूसा व हारून्
123
क़ाल फ़िर्'औनु आमन्तुम् बिही क़ब्ल अन् आज़न लकुम् इन्न हाज़ा लमक्रुम्-मकर्तुमूहु फ़िल्-मदीनति लितुख़्रिजू मिन्हा अह्लहा फ़सौफ़ ता'लमून्
124
लउक़त्ति'अन्न ऐदियकुम् व अर्जुलकुम्-मिन् ख़िलाफ़िन् सुम्म लउसल्लिबन्नकुम् अज्म'ईन्
125
क़ालू इन्ना इला रब्बिना मुन्क़लिबून्
126
व मा तन्क़िमु मिन्ना इल्ला अन् आमन्ना बिआयाति रब्बिना लम्मा जा'अत्ना रब्बना अफ़्रिग़् अलैना सब्रव्-व तवफ़्फ़ना मुस्लिमीन्
127
व क़ालल्-मल'उ मिन् क़ौमि फ़िर्'औन अतज़रु मूसा व क़ौमहू लियुफ़्सिदू फ़िल्-अर्दि व यज़रक व आलिहतक क़ाल सनुक़त्तिलु अब्ना'अहुम् व नस्तह्यी निसा'अहुम् व इन्ना फ़ौक़हुम् क़ाहिरून्
128
क़ाल मूसा लिक़ौमिहिस्-त'ईनू बिल्लाहि वस्बिरू इन्नल्-अर्द लिल्लाहि यूरिसुहा मय्-यशा'उ मिन् इबादिही वल्-आक़िबतु लिल्मुत्तक़ीन्
129
क़ालू ऊज़ीना मिन् क़ब्लि अन् ता'तियना व मिम्-बा'दि मा जि'तना क़ाल असा रब्बुकुम् अय्-युह्लिक अदुव्वकुम् व यस्तख़्लिफ़कुम् फ़िल्-अर्दि फ़यन्ज़ुर कैफ़ ता'मलून्
130
व लक़द् अख़ज़्ना आल फ़िर्'औन बिस्-सिनीन व नक़्सिम्-मिनस्-समराति ल'अल्लहुम् यज़्ज़क्करून्
131
फ़इज़ा जा'अत्हुमुल्-हसनतु क़ालू लना हाज़िही व इन् तुसिब्हुम् सय्यि'अतुय्-यत्तय्यरू बिमूसा व मम्-म'अहू अला इन्नमा ता'इरुहुम् इन्दल्लाहि व लाकिन्न अक्सरहुम् ला या'लमून्
132
व क़ालू मह्मा ता'तिना बिही मिन् आयतिल्-लितस्हरना बिहा फ़मा नह्नु लक बिमु'मिनीन्
133
फ़अर्सल्ना अलैहिमुत्-तूफ़ान वल्-जराद वल्-क़ुम्मल वद्-दफ़ादि'अ वद्-दम आयातिम्-मुफ़स्सलातिन् फ़स्तक्बरू व कानू क़ौमम्-मुज्रिमीन्
134
व लम्मा वक़'अ अलैहिमुर्-रिज्ज़ु क़ालू या मूसा उद्'उ लना रब्बक बिमा अहिद इन्दक लइन् कशफ़्त अन्नर्-रिज्ज़ लनु'मिनन्न लक व लनुर्सिलन्न म'अक बनी इस्रा'ईल्
135
फ़लम्मा कशफ़्ना अन्हुमुर्-रिज्ज़ इला अजलिन् हुम् बालिग़ूहु इज़ा हुम् यन्कुसून्
136
फ़न्तक़म्ना मिन्हुम् फ़अग़्रक़्नाहुम् फ़िल्-यम्मि बिअन्नहुम् कज़्ज़बू बिआयातिना व कानू अन्हा ग़ाफ़िलीन्
137
व औरस्नल्-क़ौमल्लज़ीन कानू युस्तद्अफ़ून मशारिक़ल्-अर्दि व मग़ारिबहल्लती बारक्ना फ़ीहा व तम्मत् कलिमतु रब्बिकल्-हुस्ना अला बनी इस्रा'ईल बिमा सबरू व दम्मर्ना मा कान यस्न'उ फ़िर्'औनु व क़ौमुहू व मा कानू या'रिशून्
138
व जावज़्ना बिबनी इस्रा'ईलल्-बह्र फ़अतौ अला क़ौमिय्-या'कुफ़ून अला अस्नामिल्-लहुम् क़ालू या मूसज्-'अल्-लना इलाहन् कमा लहुम् आलिहतुन् क़ाल इन्नकुम् क़ौमुन् तज्हलून्
139
इन्न हा'उला'इ मुतब्बरुम्-मा हुम् फ़ीहि व बातिलुम्-मा कानू या'मलून्
140
क़ाल अग़ैरल्लाहि अब्ग़ीकुम् इलाहव्-व हुव फ़द्दलकुम् अलल्-आलमीन्
141
व इज़् अन्जैनाकुम्-मिन् आलि फ़िर्'औन यसूमूनकुम् सू'अल्-अज़ाबि युक़त्तिलून अब्ना'अकुम् व यस्तह्यून निसा'अकुम् व फ़ी ज़ालिकुम् बला'उम्-मिर्-रब्बिकुम् अज़ीम्
142
व वा'अद्ना मूसा सलासीन लैलतव्-व अत्मम्नाहा बि'अश्रिन् फ़तम्म मीक़ातु रब्बिही अर्ब'ईन लैलतव्-व क़ाल मूसा लिअख़ीहि हारूनख़्-लुफ़्नी फ़ी क़ौमी व अस्लिह् व ला तत्तबि' सबीलल्-मुफ़्सिदीन्
143
व लम्मा जा'अ मूसा लिमीक़ातिना व कल्लमहू रब्बुहू क़ाल रब्बि अरिनी अन्ज़ुर् इलैक क़ाल लन् तरानी व लाकिनिन्-ज़ुर् इलल्-जबलि फ़इनिस्-तक़र्र मकानहू फ़सौफ़ तरानी फ़लम्मा तजल्ला रब्बुहू लिल्जबलि ज'अलहू दक्कव्-व ख़र्र मूसा सा'इक़न् फ़लम्मा अफ़ाक़ क़ाल सुब्हानक तुब्तु इलैक व अन अव्वलुल्-मु'मिनीन्
144
क़ाल या मूसा इन्निस्-तफ़ैतुक अलन्-नासि बिरिसालाती व बिकलामी फ़ख़ुज़् मा आतैतुक व कुम्-मिनश्-शाकिरीन्
145
व कतब्ना लहू फ़िल्-अल्वाहि मिन् कुल्लि शै'इम्-मौ'इज़तव्-व तफ़्सीलल्-लिकुल्लि शै'इन् फ़ख़ुज़्हा बिक़ुव्वतिव्-वा'मुर् क़ौमक या'ख़ुज़ू बिअह्सनिहा सउरीकुम् दारल्-फ़ासिक़ीन्
146
सअस्रिफ़ु अन् आयातियल्लज़ीन यतकब्बरून फ़िल्-अर्दि बिग़ैरिल्-हक़्क़ि व इय्-यरौ कुल्ल आयतिल्-ला यु'मिनू बिहा व इय्-यरौ सबीलर्-रुश्दि ला यत्तख़िज़ूहु सबीलव्-व इय्-यरौ सबीलल्-ग़य्यि यत्तख़िज़ूहु सबीलन् ज़ालिक बिअन्नहुम् कज़्ज़बू बिआयातिना व कानू अन्हा ग़ाफ़िलीन्
147
वल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना व लिक़ा'इल्-आख़िरति हबितत् आ'मालुहुम् हल् युज्ज़ौन इल्ला मा कानू या'मलून्
148
वत्तख़ज़ क़ौमु मूसा मिम्-बा'दिही मिन् हुलिय्यिहिम् इज्लन् जसदन् लहू ख़ुवारुन् अलम् यरौ अन्नहू ला युकल्लिमुहुम् व ला यह्दीहिम् सबीलन् इत्तख़ज़ूहु व कानू ज़ालिमीन्
149
व लम्मा सुक़ित फ़ी ऐदीहिम् व र'औ अन्नहुम् क़द् दल्लू क़ालू लइल्-लम् यर्हम्ना रब्बुना व यग़्फ़िर् लना लनकूनन्न मिनल्-ख़ासिरीन्
150
व लम्मा रज'अ मूसा इला क़ौमिही ग़द्बान असिफ़न् क़ाल बि'समा ख़लफ़्तुमूनी मिम्-बा'दी अ'अजिल्तुम् अम्र रब्बिकुम् व अल्क़ल्-अल्वाह व अख़ज़ बिरा'सि अख़ीहि यजुर्रुहू इलैहि क़ालब्-न उम्म इन्नल्-क़ौमस्-तद्अफ़ूनी व कादू यक़्तुलूननी फ़ला तुश्मित् बियल्-आ'दा'अ व ला तज्'अल्नी म'अल्-क़ौमिज़्-ज़ालिमीन्
151
क़ाल रब्बिग़्-फ़िर् ली व लिअख़ी व अद्ख़िल्ना फ़ी रह्मतिक व अन्त अर्हमुर्-राहिमीन्
152
इन्नल्लज़ीनत्-तख़ज़ुल्-इज्ल सयनालुहुम् ग़दबुम्-मिर्-रब्बिहिम् व ज़िल्लतुन् फ़िल्-हयातिद्-दुन्या व कज़ालिक नज्ज़िल्-मुफ़्तरीन्
153
वल्लज़ीन अमिलुस्-सय्यि'आति सुम्म ताबू मिम्-बा'दिहा व आमनू इन्न रब्बक मिम्-बा'दिहा लग़फ़ूरुर्-रहीम्
154
व लम्मा सकत अम्-मूसल्-ग़दबु अख़ज़ल्-अल्वाह व फ़ी नुस्ख़तिहा हुदव्-व रह्मतुल्-लिल्लज़ीन हुम् लिरब्बिहिम् यर्हबून्
155
वख़्तार मूसा क़ौमहू सब्'ईन रजुलल्-लिमीक़ातिना फ़लम्मा अख़ज़त्हुमुर्-रज्फ़तु क़ाल रब्बि लौ शि'त अह्लक्तहुम्-मिन् क़ब्लु व इय्याय अतुह्लिकुना बिमा फ़'अलस्-सुफ़हा'उ मिन्ना इन् हिय इल्ला फ़ित्नतुक तुदिल्लु बिहा मन् तशा'उ व तह्दी मन् तशा'उ अन्त वलिय्युना फ़ग़्फ़िर् लना वर्हम्ना व अन्त ख़ैरुल्-ग़ाफ़िरीन्
156
वक्तुब् लना फ़ी हाज़िहिद्-दुन्या हसनतव्-व फ़िल्-आख़िरति इन्ना हुद्ना इलैक क़ाल अज़ाबी उसीबु बिही मन् अशा'उ व रह्मती वसि'अत् कुल्ल शै'इन् फ़सअक्तुबुहा लिल्लज़ीन यत्तक़ून व यु'तूनज़्-ज़कात वल्लज़ीन हुम् बिआयातिना यु'मिनून्
157
अल्लज़ीन यत्तबि'ऊनर्-रसूलन्-नबिय्यल्-उम्मिय्यल्लज़ी यजिदूनहू मक्तूबन् इन्दहुम् फ़ित्-तौराति वल्-इन्जीलि या'मुरुहुम् बिल्-मा'रूफ़ि व यन्हाहुम् अनिल्-मुन्करि व युहिल्लु लहुमुत्-तय्यिबाति व युहर्रिमु अलैहिमुल्-ख़बा'इस व यद'उ अन्हुम् इस्रहुम् वल्-अग़्लालल्लती कानत् अलैहिम् फ़ल्लज़ीन आमनू बिही व अज़्ज़रूहु व नसरूहु वत्तब'उन्-नूरल्लज़ी उन्ज़िल म'अहू उला'इक हुमुल्-मुफ़्लिहून्
158
क़ुल् या अय्युहन्-नासु इन्नी रसूलुल्लाहि इलैकुम् जमी'अनिल्लज़ी लहू मुल्कुस्-समावाति वल्-अर्दि ला इलाह इल्ला हुव युह्यी व युमीतु फ़आमिनू बिल्लाहि व रसूलिहिन्-नबिय्यिल्-उम्मिय्यिल्लज़ी यु'मिनु बिल्लाहि व कलिमातिही वत्तबि'ऊहु ल'अल्लकुम् तह्तदून्
159
व मिन् क़ौमि मूसा उम्मतुय्-यह्दून बिल्-हक़्क़ि व बिही या'दिलून्
160
व क़त्ता'नाहुमुस्-नतै अश्रत अस्बातन् उममव्-व औहैना इला मूसा इज़िस्-तस्क़ाहु क़ौमुहू अनिद्-रिब्-बि'साकल्-हजर फ़म्बजसत् मिन्हुस्-नता अश्रत ऐनन् क़द् अलिम कुल्लु उनासिम्-मश्रबहुम् व ज़ल्लल्ना अलैहिमुल्-ग़माम व अन्ज़ल्ना अलैहिमुल्-मन्न वस्-सल्वा कुलू मिन् तय्यिबाति मा रज़क़्नाकुम् व मा ज़लमूना व लाकिन् कानू अन्फ़ुसहुम् यज़्लिमून्
161
व इज़् क़ील लहुमुस्-कुनू हाज़िहिल्-क़र्यत व कुलू मिन्हा हैसु शि'तुम् व क़ूलू हित्ततुव्-वद्-ख़ुलुल्-बाब सुज्जदन्-नग़्फ़िर् लकुम् ख़ती'आतिकुम् सनज़ीदुल्-मुह्सिनीन्
162
फ़बद्दलल्लज़ीन ज़लमू मिन्हुम् क़ौलन् ग़ैरल्लज़ी क़ील लहुम् फ़अर्सल्ना अलैहिम् रिज्ज़म्-मिनस्-समा'इ बिमा कानू यज़्लिमून्
163
वस्'अल्हुम् अनिल्-क़र्यतिल्लती कानत् हादिरतल्-बह्रि इज़् या'दून फ़िस्-सब्ति इज़् ता'तीहिम् हीतानुहुम् यौम सब्तिहिम् शुर्र'अव्-व यौम ला यस्बितून ला ता'तीहिम् कज़ालिक नब्लूहुम् बिमा कानू यफ़्सुक़ून्
164
व इज़् क़ालत् उम्मतुम्-मिन्हुम् लिम त'इज़ून क़ौमनिल्लाहु मुह्लिकुहुम् औ मु'अज़्ज़िबुहुम् अज़ाबन् शदीदन् क़ालू म'अज़िरतन् इला रब्बिकुम् व ल'अल्लहुम् यत्तक़ून्
165
फ़लम्मा नसू मा ज़ुक्किरू बिही अन्जैनल्लज़ीन यन्हौन अनिस्-सू'इ व अख़ज़्नल्लज़ीन ज़लमू बि'अज़ाबिम्-ब'ईसिम्-बिमा कानू यफ़्सुक़ून्
166
फ़लम्मा अतौ अम्-मा नुहू अन्हु क़ुल्ना लहुम् कूनू क़िरदतन् ख़ासि'ईन्
167
व इज़् तअज़्ज़न रब्बुक लयब्'असन्न अलैहिम् इला यौमिल्-क़ियामति मय्-यसूमुहुम् सू'अल्-अज़ाबि इन्न रब्बक लसरी'उल्-इक़ाबि व इन्नहू लग़फ़ूरुर्-रहीम्
168
व क़त्ता'नाहुम् फ़िल्-अर्दि उममम्-मिन्हुमुस्-सालिहून व मिन्हुम् दून ज़ालिक व बलौनाहुम् बिल्-हसनाति वस्-सय्यि'आति ल'अल्लहुम् यर्जि'ऊन्
169
फ़ख़लफ़ मिम्-बा'दिहिम् ख़ल्फ़ुव्-वरिसुल्-किताब या'ख़ुज़ून अरद हाज़ल्-अद्ना व यक़ूलून सयुग़्फ़रु लना व इय्-या'तिहिम् अरदुम्-मिस्लुहू या'ख़ुज़ूहु अलम् यु'ख़ज़् अलैहिम्-मीसाक़ुल्-किताबि अल्-ला यक़ूलू अलल्लाहि इल्लल्-हक़्क़ व दरसू मा फ़ीहि वद्-दारुल्-आख़िरतु ख़ैरुल्-लिल्लज़ीन यत्तक़ून अफ़ला ता'क़िलून्
170
वल्लज़ीन युमस्सिकून बिल्-किताबि व अक़ामुस्-सलात इन्ना ला नुदी'उ अज्रल्-मुस्लिहीन्
171
व इज़् नतक़्नल्-जबल फ़ौक़हुम् कअन्नहू ज़ुल्लतुव्-व ज़न्नू अन्नहू वाक़ि'उम्-बिहिम् ख़ुज़ू मा आतैनाकुम् बिक़ुव्वतिव्-वज़्कुरू मा फ़ीहि ल'अल्लकुम् तत्तक़ून्
172
व इज़् अख़ज़ रब्बुक मिम्-बनी आदम मिन् ज़ुहूरिहिम् ज़ुर्रिय्यतहुम् व अश्हदहुम् अला अन्फ़ुसिहिम् अलस्तु बिरब्बिकुम् क़ालू बला शहिद्ना अन् तक़ूलू यौमल्-क़ियामति इन्ना कुन्ना अन् हाज़ा ग़ाफ़िलीन्
173
औ तक़ूलू इन्नमा अश्रक आबा'उना मिन् क़ब्लु व कुन्ना ज़ुर्रिय्यतम्-मिम्-बा'दिहिम् अफ़तुह्लिकुना बिमा फ़'अलल्-मुब्तिलून्
174
व कज़ालिक नुफ़स्सिलुल्-आयाति व ल'अल्लहुम् यर्जि'ऊन्
175
वत्लु अलैहिम् नब'अल्लज़ी आतैनाहु आयातिना फ़न्सलख़ मिन्हा फ़अत्ब'अहुश्-शैतानु फ़कान मिनल्-ग़ावीन्
176
व लौ शि'ना लरफ़ा'नाहु बिहा व लाकिन्नहू अख़्लद इलल्-अर्दि वत्तब'अ हवाहु फ़मसलुहू कमसलिल्-कल्बि इन् तह्मिल् अलैहि यल्हस् औ तत्रुक्हु यल्हस् ज़ालिक मसलुल्-क़ौमिल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना फ़क़्सुसिल्-क़सस ल'अल्लहुम् यतफ़क्करून्
177
सा'अ मसलनिल्-क़ौमुल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना व अन्फ़ुसहुम् कानू यज़्लिमून्
178
मय्-यह्दिल्लाहु फ़हुवल्-मुह्तदी व मय्-युद्लिल् फ़उला'इक हुमुल्-ख़ासिरून्
179
व लक़द् ज़रा'ना लिजहन्नम कसीरम्-मिनल्-जिन्नि वल्-इन्सि लहुम् क़ुलूबुल्-ला यफ़्क़हून बिहा व लहुम् आ'युनुल्-ला युब्सिरून बिहा व लहुम् आज़ानुल्-ला यस्म'ऊन बिहा उला'इक कल्-अन्'आमि बल् हुम् अदल्लु उला'इक हुमुल्-ग़ाफ़िलून्
180
व लिल्लाहिल्-अस्मा'उल्-हुस्ना फ़द्'ऊहु बिहा व ज़रुल्लज़ीन युल्हिदून फ़ी अस्मा'इही सयुज्ज़ौन मा कानू या'मलून्
181
व मिम्मन् ख़लक़्ना उम्मतुय्-यह्दून बिल्-हक़्क़ि व बिही या'दिलून्
182
वल्लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना सनस्तद्रिजुहुम्-मिन् हैसु ला या'लमून्
183
व उम्ली लहुम् इन्न कैदी मतीन्
184
अवलम् यतफ़क्करू मा बिसाहिबिहिम्-मिन् जिन्नतिन् इन् हुव इल्ला नज़ीरुम्-मुबीन्
185
अवलम् यन्ज़ुरू फ़ी मलकूतिस्-समावाति वल्-अर्दि व मा ख़लक़ल्लाहु मिन् शै'इव्-व अन् असा अय्-यकून क़दिक़्-तरब अजलुहुम् फ़बिअय्यि हदीसिम्-बा'दहू यु'मिनून्
186
मय्-युद्लिलिल्लाहु फ़ला हादिय लहू व यज़रुहुम् फ़ी तुग़्यानिहिम् या'महून्
187
यस्'अलूनक अनिस्-सा'अति अय्यान मुर्साहा क़ुल् इन्नमा इल्मुहा इन्द रब्बी ला युजल्लीहा लिवक़्तिहा इल्ला हुव सक़ुलत् फ़िस्-समावाति वल्-अर्दि ला ता'तीकुम् इल्ला बग़्ततन् यस्'अलूनक कअन्नक हफ़िय्युन् अन्हा क़ुल् इन्नमा इल्मुहा इन्दल्लाहि व लाकिन्न अक्सरन्-नासि ला या'लमून्
188
क़ुल्-ला अम्लिकु लिनफ़्सी नफ़्अव्-व ला दर्रन् इल्ला मा शा'अल्लाहु व लौ कुन्तु आ'लमुल्-ग़ैब लस्तक्सर्तु मिनल्-ख़ैरि व मा मस्सनियस्-सू'उ इन् अन इल्ला नज़ीरुव्-व बशीरुल्-लिक़ौमिय्-यु'मिनून्
189
हुवल्लज़ी ख़लक़कुम्-मिन्-नफ़्सिव्-वाहिदतिव्-व ज'अल मिन्हा ज़ौजहा लियस्कुन इलैहा फ़लम्मा तग़श्शाहा हमलत् हम्लन् ख़फ़ीफ़न् फ़मर्रत् बिही फ़लम्मा अस्क़लत् द'अवल्लाह रब्बहुमा लइन् आतैतना सालिहल्-लनकूनन्न मिनश्-शाकिरीन्
190
फ़लम्मा आताहुमा सालिहन् ज'अला लहू शुरका'अ फ़ीमा आताहुमा फ़त'आलल्लाहु अम्मा युश्रिकून्
191
अयुश्रिकून मा ला यख़्लुक़ु शै'अव्-व हुम् युख़्लक़ून्
192
व ला यस्तती'ऊन लहुम् नस्रव्-व ला अन्फ़ुसहुम् यन्सुरून्
193
व इन् तद्'ऊहुम् इलल्-हुदा ला यत्तबि'ऊकुम् सवा'उन् अलैकुम् अद'औतुमूहुम् अम् अन्तुम् सामितून्
194
इन्नल्लज़ीन तद्'ऊन मिन् दूनिल्लाहि इबादुन् अम्सालुकुम् फ़द्'ऊहुम् फ़ल्यस्तजीबू लकुम् इन् कुन्तुम् सादिक़ीन्
195
अलहुम् अर्जुलुय्-यम्शून बिहा अम् लहुम् ऐदिय्-यब्तिशून बिहा अम् लहुम् आ'युनुय्-युब्सिरून बिहा अम् लहुम् आज़ानुय्-यस्म'ऊन बिहा क़ुलिद्'ऊ शुरका'अकुम् सुम्म कीदूनि फ़ला तुन्ज़िरून्
196
इन्न वलियियल्लाहुल्लज़ी नज़्ज़लल्-किताब व हुव यतवल्लस्-सालिहीन्
197
वल्लज़ीन तद्'ऊन मिन् दूनिही ला यस्तती'ऊन नस्रकुम् व ला अन्फ़ुसहुम् यन्सुरून्
198
व इन् तद्'ऊहुम् इलल्-हुदा ला यस्म'ऊ व तराहुम् यन्ज़ुरून इलैक व हुम् ला युब्सिरून्
199
ख़ुज़िल्-अफ़्व वा'मुर् बिल्-उर्फ़ि व आ'रिद् अनिल्-जाहिलीन्
200
व इम्मा यन्ज़ग़न्नक मिनश्-शैतानि नज़्ग़ुन् फ़स्त'इज़् बिल्लाहि इन्नहू समी'उन् अलीम्
201
इन्नल्लज़ीनत्-तक़ौ इज़ा मस्सहुम् ता'इफ़ुम्-मिनश्-शैतानि तज़क्करू फ़इज़ा हुम्-मुब्सिरून्
202
व इख़्वानुहुम् यमुद्दूनहुम् फ़िल्-ग़य्यि सुम्म ला युक़्सिरून्
203
व इज़ा लम् ता'तिहिम् बिआयतिन् क़ालू लौलज्-तबैतहा क़ुल् इन्नमा अत्तबि'उ मा यूहा इलय्य मिर्-रब्बी हाज़ा बसा'इरु मिर्-रब्बिकुम् व हुदव्-व रह्मतुल्-लिक़ौमिय्-यु'मिनून्
204
व इज़ा क़ुरि'अल्-क़ुर्आनु फ़स्तमि'ऊ लहू व अन्सितू ल'अल्लकुम् तुर्हमून्
205
वज़्कुर्-रब्बक फ़ी नफ़्सिक तदर्रु'अव्-व ख़ीफ़तव्-व दूनल्-जह्रि मिनल्-क़ौलि बिल्-ग़ुदुव्वि वल्-आसालि व ला तकुम्-मिनल्-ग़ाफ़िलीन्
206
इन्नल्लज़ीन इन्द रब्बिक ला यस्तक्बिरून अन् इबादतिही व युसब्बिहूनहू व लहू यस्जुदून्
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Surah al-a'raf meaning Hindi
1
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ साद॰
2
यह एक किताब है, जो तुम्हारी ओर उतारी गई है - अतः इससे तुम्हारे सीने में कोई तंगी न हो - ताकि तुम इसके द्वारा सचेत करो और यह ईमानवालों के लिए एक प्रबोधन है;
3
जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, उस पर चलो और उसे छोड़कर दूसरे संरक्षक मित्रों का अनुसरण न करो। तुम लोग नसीहत थोड़े ही मानते हो
4
कितनी ही बस्तियाँ थीं, जिन्हें हमने विनष्टम कर दिया। उनपर हमारी यातना रात को सोते समय आ पहुँची या (दिन-दहाड़) आई, जबकि वे दोपहर में विश्राम कर रहे थे
5
जब उनपर यातना आ गई तो इसके सिवा उनके मुँह से कुछ न निकला कि वे पुकार उठे, "वास्तव में हम अत्याचारी थे।"
6
अतः हम उन लोगों से अवश्य पूछेंगे, जिनके पास रसूल भेजे गए थे, और हम रसूलों से भी अवश्य पूछेंगे
7
फिर हम पूरे ज्ञान के साथ उनके सामने सब बयान कर देंगे। हम कही ग़ायब नहीं थे
8
और बिल्कुल पक्का-सच्चा वज़न उसी दिन होगा। अतः जिनके कर्म वज़न में भारी होंगे, वही सफलता प्राप्त करेंगे
9
और वे लोग जिनके कर्म वज़न में हलके होंगे, तो वही वे लोग हैं, जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला, क्योंकि वे हमारी आयतों का इनकार औऱ अपने ऊपर अत्याचार करते रहे
10
और हमने धरती में तुम्हें अधिकार दिया और उसमें तुम्हारे लिए जीवन-सामग्री रखी। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो
11
हमने तुम्हें पैदा करने का निश्चय किया; फिर तुम्हारा रूप बनाया; फिर हमने फ़रिश्तों से कहो, "आदम को सजदा करो।" तो उन्होंने सजदा किया, सिवाय इबलीस के। वह (इबलीस) सदजा करनेवालों में से न हुआ
12
कहा, "तुझे किसने सजका करने से रोका, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?" बोला, "मैं उससे अच्छा हूँ। तूने मुझे अग्नि से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया।"
13
कहा, "उतर जा यहाँ से! तुझे कोई हक़ नहीं है कि यहाँ घमंड करे, तो अब निकल जा; निश्चय ही तू अपमानित है।"
14
बोला, "मुझे एक दिन तक मुहल्लत दे, जबकि लोग उठाए जाएँगे।"
15
कहा, "निस्संदेह तुझे मुहल्लत है।"
16
बोला, "अच्छा, इस कारण कि तूने मुझे गुमराही में डाला है, मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उनके लिए घात में अवश्य बैठूँगा
17
"फिर उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाएँ और उनके बाएँ से उनके पास आऊँगा। और तू उनमें अधिकतर को कृतज्ञ न पाएगा।"
18
कहा, "निकल जा यहाँ से! निन्दित ठुकराया हुआ। उनमें से जिस किसी ने भी तेरा अनुसरण किया, मैं अवश्य तुम सबसे जहन्नम को भर दूँगा।"
19
और "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों जन्नत में रहो-बसो, फिर जहाँ से चाहो खाओ, लेकिन इस वृक्ष के निकट न जाना, अन्यथा अत्याचारियों में से हो जाओगे।"
20
फिर शैतान ने दोनों को बहकाया, ताकि उनकी शर्मगाहों को, जो उन दोनों से छिपी थीं, उन दोनों के सामने खोल दे। और उसने (इबलीस ने) कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस वृक्ष से रोका है, तो केवल इसलिए कि ऐसा न हो कि तुम कहीं फ़रिश्ते हो जाओ या कही ऐसा न हो कि तुम्हें अमरता प्राप्त हो जाए।"
21
और उसने उन दोनों के आगे क़समें खाई कि "निश्चय ही मैं तुम दोनों का हितैषी हूँ।"
22
इस प्रकार धोखा देकर उसने उन दोनों को झुका लिया। अन्ततः जब उन्होंने उस वृक्ष का स्वाद लिया, तो उनकी शर्मगाहे एक-दूसरे के सामने खुल गए और वे अपने ऊपर बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम दोनों को इस वृक्ष से रोका नहीं था और तुमसे कहा नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है?"
23
दोनों बोले, "हमारे रब! हमने अपने आप पर अत्याचार किया। अब यदि तूने हमें क्षमा न किया और हम पर दया न दर्शाई, फिर तो हम घाटा उठानेवालों में से होंगे।"
24
कहा, "उतर जाओ! तुम परस्पर एक-दूसरे के शत्रु हो और एक अवधि कर तुम्हारे लिए धरती में ठिकाना और जीवन-सामग्री है।"
25
कहा, "वहीं तुम्हें जीना और वहीं तुम्हें मरना है और उसी में से तुमको निकाला जाएगा।"
26
ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हारे लिए वस्त्र उतारा है कि तुम्हारी शर्मगाहों को छुपाए और रक्षा और शोभा का साधन हो। और धर्मपरायणता का वस्त्र - वह तो सबसे उत्तम है, यह अल्लाह की निशानियों में से है, ताकि वे ध्यान दें
27
ऐ आदम की सन्तान! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस प्रकार उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके वस्त्र उनपर से उतरवा दिए थे, ताकि उनकी शर्मगाहें एक-दूसरे के सामने खोल दे। निस्सदेह वह और उसका गिरोह उस स्थान से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। हमने तो शैतानों को उन लोगों का मित्र बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते
28
और उनका हाल यह है कि जब वे लोग कोई अश्लील कर्म करते है तो कहते है कि "हमने अपने बाप-दादा को इसी तरीक़े पर पाया है और अल्लाह ही ने हमें इसका आदेश दिया है।" कह दो, "अल्लाह कभी अश्लील बातों का आदेश नहीं दिया करता। क्या अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहते हो, जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं?"
29
कह दो, "मेरे रब ने तो न्याय का आदेश दिया है और यह कि इबादत के प्रत्येक अवसर पर अपना रुख़ ठीक रखो और निरे उसी के भक्त एवं आज्ञाकारी बनकर उसे पुकारो। जैसे उसने तुम्हें पहली बार पैदा किया, वैसे ही तुम फिर पैदा होगे।"
30
एक गिरोह को उसने मार्ग दिखाया। परन्तु दूसरा गिरोह ऐसा है, जिसके लोगों पर गुमराही चिपककर रह गई। निश्चय ही उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपने मित्र बनाए और समझते यह है कि वे सीधे मार्ग पर हैं
31
ऐ आदम की सन्तान! इबादत के प्रत्येक अवसर पर शोभा धारण करो; खाओ और पियो, परन्तु हद से आगे न बढ़ो। निश्चय ही, वह हद से आगे बदनेवालों को पसन्द नहीं करता
32
कहो, "अल्लाह की उस शोभा को जिसे उसने अपने बन्दों के लिए उत्पन्न किया है औऱ आजीविका की पवित्र, अच्छी चीज़ो को किसने हराम कर दिया?" कह दो, "यह सांसारिक जीवन में भी ईमानवालों के लिए हैं; क़ियामत के दिन तो ये केवल उन्हीं के लिए होंगी। इसी प्रकार हम आयतों को उन लोगों के लिए सविस्तार बयान करते है, जो जानना चाहे।"
33
कह दो, "मेरे रब ने केवल अश्लील कर्मों को हराम किया है - जो उनमें से प्रकट हो उन्हें भी और जो छिपे हो उन्हें भी - और हक़ मारना, नाहक़ ज़्यादती और इस बात को कि तुम अल्लाह का साझीदार ठहराओ, जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा और इस बात को भी कि तुम अल्लाह पर थोपकर ऐसी बात कहो जिसका तुम्हें ज्ञान न हो।"
34
प्रत्येक समुदाय के लिए एक नियत अवधि है। फिर जब उसका नियत समय आ जाता है, तो एक घड़ी भर न पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है
35
ऐ आदम की सन्तान! यदि तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल आएँ; तुम्हें मेरी आयतें सुनाएँ, तो जिसने डर रखा और सुधार कर लिया तो ऐसे लोगों के लिए न कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे
36
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में अकड़ दिखाई; वही आगवाले हैं, जिसमें वे सदैव रहेंगे
37
अब उससे बढ़कर अत्याचारी कौन है, जिसने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया या उसकी आयतों को झुठलाया? ऐसे लोगों को उनके लिए लिखा हुआ हिस्सा पहुँचता रहेगा, यहाँ तक कि जब हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके प्राण ग्रस्त करने के लिए उनके पास आएँगे तो कहेंगे, "कहाँ हैं, वे जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते थे?" कहेंगे, "वे तो हमसे गुम हो गए।" और वे स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देंगे कि वास्तव में वे इनकार करनेवाले थे
38
वह कहेगा, "जिन्न और इनसान के जो गिरोह तुमसे पहले गुज़रे हैं, उन्हीं के साथ सम्मिलित होकर तुम भी आग में प्रवेश करो।" जब भी कोई जमाअत प्रवेश करेगी, तो वह अपनी बहन पर लानत करेगी, यहाँ तक कि जब सब उसमें रल-मिल जाएँगे तो उनमें से बाद में आनेवाले अपने से पहलेवाले के विषय में कहेंगे, "हमारे रब! हमें इन्हीं लोगों ने गुमराह किया था; तो तू इन्हें आग की दोहरी यातना दे।" वह कहेगा, "हरेक के लिए दोहरी ही है। किन्तु तुम नहीं जानते।"
39
और उनमें से पहले आनेवाले अपने से बाद में आनेवालों से कहेंगे, "फिर हमारे मुक़ावाले में तुम्हें कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं, तो जैसी कुछ कमाई तुम करते रहे हो, उसके बदले में तुम यातना का मज़ा चखो!"
40
जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में अकड़ दिखाई, उनके लिए आकाश के द्वार नहीं खोले जाएँगे और न वे जन्नत में प्रवेश करेंग जब तक कि ऊँट सुई के नाके में से न गुज़र जाए। हम अपराधियों को ऐसा ही बदला देते है
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उनके लिए बिछौना जहन्नम का होगा और ओढ़ना भी उसी का। अत्याचारियों को हम ऐसा ही बदला देते है
42
इसके विपरित जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए - हम किसी पर उसकी सामर्थ्य से बढ़कर बोझ नहीं डालते - वही लोग जन्नतवाले है। वे उसमें सदैव रहेंगे
43
उनके सीनों में एक-दूसरे के प्रति जो रंजिश होगी, उसे हम दूर कर देंगे; उनके नीचें नहरें बह रही होंगी और वे कहेंगे, "प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने इसकी ओर हमारा मार्गदर्शन किया। और यदि अल्लाह हमारा मार्गदर्शन न करतो तो हम कदापि मार्ग नहीं पा सकते थे। हमारे रब के रसूल निस्संदेह सत्य लेकर आए थे।" और उन्हें आवाज़ दी जाएगी, "यह जन्नत है, जिसके तुम वारिस बनाए गए। उन कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे थे।"
44
जन्नतवाले आगवालों को पुकारेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुमसे तुम्हारे रब ने जो वादा कर रखा था, तुमने भी उसे सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतने में एक पुकारनेवाला उनके बीच पुकारेगा, "अल्लाह की फिटकार है अत्याचारियों पर।"
45
जो अल्लाह के मार्ग से रोकते और उसे टेढ़ा करना चाहते है और जो आख़िरत का इनकार करते है,
46
और इन दोनों के मध्य एक ओट होगी। और ऊँचाइयों पर कुछ लोग होंगे जो प्रत्येक को उसके लक्षणों से पहचानते होंगे, और जन्नतवालों से पुकारकर कहेंगे, "तुम पर सलाम है।" वे अभी जन्नत में प्रविष्ट तो नहीं हुए होंगे, यद्यपि वे आस लगाए होंगे
47
और जब उनकी निगाहें आगवालों की ओर फिरेंगी, तो कहेंगे, "हमारे रब, हमें अत्याचारी लोगों में न सम्मिलित न करना।"
48
और ये ऊँचाइयोंवाले कुछ ऐसे लोगों से, जिन्हें ये उनके लक्षणों से पहचानते हैं, कहेंगे, "तुम्हारे जत्थे तो तुम्हारे कुछ काम न आए और न तुम्हारा अकड़ते रहना ही।
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"क्या ये वही हैं ना, जिनके विषय में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह उनपर अपनी दया-दृष्टि न करेगा।" "जन्नत में प्रवेश करो, तुम्हारे लिए न कोई भय है और न तुम्हें कोई शोक होगा।"
50
आगवाले जन्नतवालों को पुकारेंगे कि ,"थोड़ा पानी हमपर बहा दो, या उन चीज़ों में से कुछ दे दो जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं।" वे कहेंगे, "अल्लाह ने तो ये दोनों चीज़ें इनकार करनेवालों के लिए वर्जित कर दी है।"
51
उनके लिए जिन्होंने अपना धर्म खेल-तमाशा ठहराया और जिन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल दिया, तो आज हम भी उन्हें भुला देंगे, जिस प्रकार वे अपने इस दिन की मुलाक़ात को भूले रहे और हमारी आयतों का इनकार करते रहे
52
और निश्चय ही हम उनके पास एक ऐसी किताब ले आए है, जिसे हमने ज्ञान के आधार पर विस्तृत किया है, जो ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है
53
क्या वे लोग केवल इसी की प्रतीक्षा में है कि उसकी वास्तविकता और परिणाम प्रकट हो जाए? जिस दिन उसकी वास्तविकता सामने आ जाएगी, तो वे लोग इससे पहले उसे भूले हुए थे, बोल उठेंगे, "वास्तव में, हमारे रब के रसूल सत्य लेकर आए थे। तो क्या हमारे कुछ सिफ़ारिशी है, जो हमारी सिफ़ारिश कर दें या हमें वापस भेज दिया जाए कि जो कुछ हम करते थे उससे भिन्न कर्म करें?" उन्होंने अपने आपको घाटे में डाल दिया और जो कुछ वे झूठ घढ़ते थे, वे सब उनसे गुम होकर रह गए
54
निस्संदेह तुम्हारा रब वही अल्लाह है, जिसने आकाशों और धरती को छह दिनों में पैदा किया - फिर राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। वह रात को दिन पर ढाँकता है जो तेज़ी से उसका पीछा करने में सक्रिय है। और सूर्य, चन्द्रमा और तारे भी बनाए, इस प्रकार कि वे उसके आदेश से काम में लगे हुए है। सावधान रहो, उसी की सृष्टि है और उसी का आदेश है। अल्लाह सारे संसार का रब, बड़ी बरकतवाला है
55
अपने रब को गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारो। निश्चय ही वह हद से आगे बढ़नेवालों को पसन्द नहीं करता
56
और धरती में उसके सुधार के पश्चात बिगाड़ न पैदा करो। भय और आशा के साथ उसे पुकारो। निश्चय ही, अल्लाह की दयालुता सत्कर्मी लोगों के निकट है
57
और वही है जो अपनी दयालुता से पहले शुभ सूचना देने को हवाएँ भेजता है, यहाँ तक कि जब वे बोझल बादल को उठा लेती है तो हम उसे किसी निर्जीव भूमि की ओर चला देते है, फिर उससे पानी बरसाते है, फिर उससे हर तरह के फल निकालते है। इसी प्रकार हम मुर्दों को मृत अवस्था से निकालेगे - ताकि तुम्हें ध्यान हो
58
और अच्छी भूमि के पेड़-पौधे उसके रब के आदेश से निकलते है और जो भूमि ख़राब हो गई है तो उससे निकम्मी पैदावार के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। इसी प्रकार हम निशानियों को उन लोगों के लिए तरह-तरह से बयान करते है, जो कृतज्ञता दिखानेवाले है
59
हमने नूह को उसकी क़ौम के लोगों की ओर भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। मैं तुम्हारे लिए एक बड़े दिन का यातना से डरता हूँ।"
60
उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हम तो तुम्हें खुली गुमराही में पड़ा देख रहे है।"
61
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! किसी गुमराही का मुझसे सम्बन्ध नहीं, बल्कि मैं सारे संसार के रब का एक रसूल हूँ। -
62
"अपने रब के सन्देश पहुँचता हूँ और तुम्हारा हित चाहता हूँ, और मैं अल्लाह की ओर से वह कुछ जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते।"
63
क्या (तुमने मुझे झूठा समझा) और तुम्हें इस पार आश्चर्य हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक आदमी के द्वारा तुम्हारे रब की नसीहत आई? ताकि वह तुम्हें सचेत कर दे और ताकि तुम डर रखने लगो और शायद कि तुमपर दया की जाए
64
किन्तु उन्होंने झुठला दिया। अन्ततः हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ एक नौका में थे, बचा लिया और जिन लोगों ने हमारी आयतों को ग़लत समझा, उन्हें हमने डूबो दिया। निश्चय ही वे अन्धे लोग थे
65
और आद की ओर उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तो क्या (इसे सोचकर) तुम डरते नहीं?"
66
उसकी क़ौम के इनकार करनेवाले सरदारों ने कहा, "वास्तव में, हम तो देखते है कि तुम बुद्धिहीनता में ग्रस्त हो और हम तो तुम्हें झूठा समझते है।"
67
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं बुद्धिहीनता में कदापि ग्रस्त नहीं हूँ। परन्तु मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ।-
68
"तुम्हें अपने रब के संदेश पहुँचता हूँ और मैं तुम्हारा विश्वस्त हितैषी हूँ
69
"क्या (तुमने मुझे झूठा समझा) और तुम्हें इसपर आश्चर्य हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक आदमी के द्वारा तुम्हारे रब की नसीहत आई, ताकि वह तुम्हें सचेत करे? और याद करो, जब उसने नूह की क़ौम के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और शारीरिक दृष्टि से भी तुम्हें अधिक विशालता प्रदान की। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारो को याद करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो।"
70
वे बोले, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि अकेले अल्लाह की हम बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे है, उन्हें छोड़ दें? अच्छा, तो जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, उसे हमपर ले आओ, यदि तुम सच्चे हो।"
71
उसने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की ओर से नापाकी थोप दी गई है और प्रकोप टूट पड़ा है। क्या तुम मुझसे उन नामों के लिए झगड़ते हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े है, जिनके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा? अच्छा, तो तुम भी प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
72
फिर हमने अपनी दयालुता से उसको और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया और उन लोगों की जड़ काट दी, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था और ईमानवाले न थे
73
और समूद की ओर उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। अतः इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए। और तकलीफ़ पहुँचाने के लिए इसे हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें एक दुखद यातना आ लेगी।-
74
और याद करो जब अल्लाह ने आद के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और धरती में तुम्हें ठिकाना प्रदान किया। तुम उसके समतल मैदानों में महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-छाँट कर भवनों का रूप देते हो। अतः अल्लाह की सामर्थ्य के चमत्कारों को याद करो और धरती में बिगाड़ पैदा करते न फिरो।"
75
उसकी क़ौम के सरदार, जो बड़े बने हुए थे, उन कमज़ोर लोगों से, जो उनमें ईमान लाए थे, कहने लगे, "क्या तुम जानते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ (पैग़म्बर) है?" उन्होंने कहा, "निस्संदेह जिस चीज़ के साथ वह भेजा गया है, हम उसपर ईमान रखते है।"
76
उन घमंड करनेवालों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम ईमान लाए हो, हम तो उसको नहीं मानते।"
77
फिर उन्होंने उस ऊँटनी की कूचें काट दीं और अपने रब के आदेश की अवहेलना की और बोले, "ऐ सालेह! हमें तू जिस चीज़ की धमकी देता है, उसे हमपर ले आ, यदि तू वास्तव में रसूलों में से है।"
78
अन्ततः एक हिला मारनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया और वे अपने घरों में आँधे पड़े रह गए
79
फिर वह यह कहता हुआ उनके यहाँ से फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मैं तो तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा चुका और मैंने तुम्हारा हित चाहा। परन्तु तुम्हें अपने हितैषी पसन्द ही नहीं आते।"
80
और हमने लूत को भेजा। जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "क्या तुम वह प्रत्यक्ष अश्लील कर्म करते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले किसी ने नहीं किया?"
81
तुम स्त्रियों को छोड़कर मर्दों से कामेच्छा पूरी करते हो, बल्कि तुम नितान्त मर्यादाहीन लोग हो
82
उसकी क़ौम के लोगों का उत्तर इसके अतिरिक्त और कुछ न था कि वे बोले, "निकालो, उन लोगों को अपनी बस्ती से। ये ऐसे लोग है जो बड़े पाक-साफ़ है!"
83
फिर हमने उसे और उसके लोगों को छुटकारा दिया, सिवाय उसकी स्त्री के कि वह पीछे रह जानेवालों में से थी
84
और हमने उनपर एक बरसात बरसाई, तो देखो अपराधियों का कैसा परिणाम हुआ
85
और मदयनवालों की ओर हमने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है। तो तुम नाप और तौल पूरी-पूरी करो, और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो, और धरती में उसकी सुधार के पश्चात बिगाड़ पैदा न करो। यही तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम ईमानवाले हो
86
"और प्रत्येक मार्ग पर इसलिए न बैठो कि धमकियाँ दो और उस व्यक्ति को अल्लाह के मार्ग से रोकने लगो जो उसपर ईमान रखता हो और न उस मार्ग को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, वह समय जब तुम थोड़े थे, फिर उसने तुम्हें अधिक कर दिया। और देखो, बिगाड़ पैदा करनेवालो का कैसा परिणाम हुआ
87
"और यदि तुममें एक गिरोह ऐसा है, जो उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और एक गिरोह ऐसा है, जो उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और एक गिरोह ईमान नहीं लाया, तो धैर्य से काम लो, यहाँ तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला कर दे। और वह सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।"
End of Juz 8 · Juz 9 begins
88
उनकी क़ौम के सरदारों ने, जो घमंड में पड़े थे, कहा, "ऐ शुऐब! हम तुझे और तेरे साथ उन लोगों को, जो ईमान लाए है, अपनी बस्ती से निकालकर रहेंगे। या फिर तुम हमारे पन्थ में लौट आओ।" उसने कहा, "क्या (तुम यही चाहोगे) यद्यपि यह हमें अप्रिय हो जब भी?
89
"हम अल्लाह पर झूठ घड़नेवाले ठहरेंगे, यदि तुम्हारे पन्थ में लौट आएँ, इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उससे छुटकारा दे दिया है। यह हमसे तो होने का नहीं कि हम उसमें पलट कर जाएँ, बल्कि हमारे रब अल्लाह की इच्छा ही क्रियान्वित है। ज्ञान की स्पष्ट से हमारा रब हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है। हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया है। हमारे रब, हमारे और हमारी क़ौम के बीच निश्चित अटल फ़ैसला कर दे। और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।"
90
और क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, बोले, "यदि तुम शुऐब के अनुयायी बने तो तुम घाटे में पड़ जाओगे।"
91
अन्ततः एक दहला देनेवाली आपदा ने उन्हें आ लिया। फिर वे अपने घर में औंधे पड़े रह गए,
92
शुऐब को झुठलानेवाले, मानो कभी वहाँ बसे ही न थे। शुऐब को झुठलानेवाले ही घाटे में रहे
93
तब वह उनके यहाँ से यह कहता हुआ फिरा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देश तुम्हें पहुँचा दिए और मैंने तुम्हारा हित चाहा। अब मैं इनकार करनेवाले लोगो पर कैसे अफ़सोस करूँ!"
94
हमने जिस बस्ती में भी कभी कोई नबी भेजा, तो वहाँ के लोगों को तंगी और मुसीबत में डाला, ताकि वे (हमारे सामने) गिड़गि़ड़ाए
95
फिर हमने बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले और कहने लगे, "ये दुख और सुख तो हमारे बाप-दादा को भी पहुँचे हैं।" अनततः जब वे बेखबर थे, हमने अचानक उन्हें पकड़ लिया
96
यदि बस्तियों के लोग ईमान लाते और डर रखते तो अवश्य ही हम उनपर आकाश और धरती की बरकतें खोल देते, परन्तु उन्होंने तो झुठलाया। तो जो कुछ कमाई वे करते थे, उसके बदले में हमने उन्हें पकड़ लिया
97
फिर क्या बस्तियों के लोगों को इस और से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि रात में उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे सोए हुए हो?
98
और क्या बस्तियों के लोगो को इस ओर से निश्चिन्त रहने का अवसर मिल सका कि दिन चढ़े उनपर हमारी यातना आ जाए, जबकि वे खेल रहे हों?
99
आख़िर क्या वे अल्लाह की चाल से निश्चिन्त हो गए थे? तो (समझ लो उन्हें टोटे में पड़ना ही था, क्योंकि) अल्लाह की चाल से तो वही लोग निश्चित होते है, जो टोटे में पड़नेवाले होते है
100
क्या जो धरती के, उसके पूर्ववासियों के पश्चात उत्तराधिकारी हुए है, उनपर यह तथ्य प्रकट न हुआ कि यदि हम चाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें आ पकड़े? हम तो उनके दिलों पर मुहर लगा रहे हैं, क्योंकि वे कुछ भी नहीं सुनते
101
ये है वे बस्तियाँ जिनके कुछ वृत्तान्त हम तुमको सुना रहे है। उनके पास उनके रसूल खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए परन्तु वे ऐसे न हुए कि ईमान लाते। इसका कारण यह था कि वे पहले से झुठलाते रहे थे। इसी प्रकार अल्लाह इनकार करनेवालों के दिलों पर मुहर लगा देता है
102
हमने उनके अधिकतर लोगो में प्रतिज्ञा का निर्वाह न पाया, बल्कि उनके बहुतों को हमने उल्लंघनकारी ही पाया
103
फिर उनके पश्चात हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा, परन्तु उन्होंने इनकार और स्वयं पर अत्याचार किया। तो देखो, इन बिगाड़ पैदा करनेवालों का कैसा परिणाम हुआ!
104
मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ
105
"मैं इसका अधिकारी हूँ कि अल्लाह से सम्बद्ध करके सत्य के अतिरिक्त कोई बात न कहूँ। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण लेकर आ गया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तान को मेरे साथ जाने दो।"
106
बोला, "यदि तुम कोई निशानी लेकर आए हो तो उसे पेश करो, यदि तुम सच्चे हो।"
107
तब उसने अपनी लाठी डाल दी। क्या देखते है कि वह प्रत्यक्ष अजगर है
108
और उसने अपना हाथ निकाला, तो क्या देखते है कि वह सब देखनेवालों के सामने चमक रहा है
109
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "अरे, यह तो बडा कुशल जादूगर है!
110
"तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल देना चाहता है। तो अब क्या कहते हो?"
111
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को प्रतीक्षा में रखो और नगरों में हरकारे भेज दो,
112
"कि वे हर कुशल जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।"
113
अतएव जादूगर फ़िरऔन के पास आ गए। कहने लगे, "यदि हम विजयी हुए तो अवश्य ही हमें बड़ा बदला मिलेगा?"
114
उसने कहा, "हाँ, और बेशक तुम (मेरे) क़रीबियों में से हो जाओगे।"
115
उन्होंने कहा, "ऐ मूसा! या तुम डालो या फिर हम डालते हैं?"
116
उसने कहा, "तुम ही डालो।" फिर उन्होंने डाला तो लोगो की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें भयभीत कर दिया। उन्होंने एक बहुत बड़े जादू का प्रदर्शन किया
117
हमने मूसा की ओर प्रकाशना कि कि "अपनी लाठी डाल दे।" फिर क्या देखते है कि वह उनके रचें हुए स्वांग को निगलती जा रही है
118
इस प्रकार सत्य प्रकट हो गया और जो कुछ वे कर रहे थे, मिथ्या होकर रहा
119
अतः वे पराभूत हो गए और अपमानित होकर रहे
120
और जादूगर सहसा सजदे में गिर पड़े
121
बोले, "हम सारे संसार के रब पर ईमान ले आए;
122
"मूसा और हारून के रब पर।"
123
फ़िरऔन बोला, "इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ, तं उसपर ईमान ले आए! यह तो एक चाल है, जो तुम लोग नगर में चले हो, ताकि उसके निवासियों को उससे निकाल दो। अच्छा, तो अब तुम्हें जल्द की मालूम हुआ जाता है!
124
"मैं तुम्हारे हाथ और तुम्हारे पाँव विपरीत दिशाओं से काट दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ाकर रहूँगा।"
125
उन्होंने कहा, "हम तो अपने रब ही की और लौटेंगे
126
"और तू केबल इस क्रोध से हमें कष्ट पहुँचाने के लिए पीछे पड़ गया है कि हम अपने रब की निशानियों पर ईमान ले आए। हमारे रब! हमपर धैर्य उड़ेल दे और हमें इस दशा में उठा कि हम मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो।"
127
फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे, "क्या तुम मूसा और उसकी क़ौम को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में बिगाड़ पैदा करें और वे तुम्हें और तुम्हारे उपास्यों को छोड़ बैठे?" उसने कहा, "हम उनके बेटों को बुरी तरह क़त्ल करेंगे और उनकी स्त्रियों को जीवित रखेंगे। निश्चय ही हमें उनपर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।"
128
मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "अल्लाह से सम्बद्ध होकर सहायता प्राप्त करो और धैर्य से काम लो। धरती अल्लाह की है। वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसका वारिस बना देता है। और अंतिम परिणाम तो डर रखनेवालों ही के लिए है।"
129
उन्होंने कहा, "तुम्हारे आने से पहले भी हम सताए गए और तुम्हारे आने के बाद भी।" उसने कहा, "निकट है कि तुम्हारा रब तुम्हारे शत्रुओं को विनष्ट कर दे और तुम्हें धरती में ख़लीफ़ा बनाए, फिर यह देखे कि तुम कैसे कर्म करते हो।"
130
और हमने फ़िरऔनियों को कई वर्ष तक अकाल और पैदावार की कमी में ग्रस्त रखा कि वे चेतें
131
फिर जब उन्हें अच्छी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तो है ही हमारे लिए।" और उन्हें बुरी हालत पेश आए तो वे उसे मूसा और उसके साथियों की नहूसत (अशकुन) ठहराएँ। सुन लो, उसकी नहूसत तो अल्लाह ही के पास है, परन्तु उनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं
132
वे बोले, "तू हमपर जादू करने के लिए चाहे कोई भी निशानी हमारे पास ले आए, हम तुझपर ईमान लानेवाले नहीं।"
133
अन्ततः हमने उनपर तूफ़ान और टिड्डियों और छोटे कीड़े और मेंढक और रक्त, कितनी ही निशानियाँ अलग-अलग भेजी, किन्तु वे घमंड ही करते रहे। वे थे ही अपराधी लोग
134
जब कभी उनपर यातना आ पड़ती, कहते है, "ऐ मूसा, हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो, उस प्रतिज्ञा के आधार पर जो उसने तुमसे कर रखी है। तुमने यदि हमपर से यह यातना हटा दी, तो हम अवश्य ही तुमपर ईमान ले आएँगे और इसराईल की सन्तान को तुम्हारे साथ जाने देंगे।"
135
किन्तु जब हम उनपर से यातना को एक नियत समय के लिए जिस तक वे पहुँचनेवाले ही थे, हटा लेते तो क्या देखते कि वे वचन-भंग करने लग गए
136
फिर हमने उनसे बदला लिया और उन्हें गहरे पानी में डूबो दिया, क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को ग़लत समझा और उनसे ग़ाफिल हो गए
137
और जो लोग कमज़ोर पाए जाते थे, उन्हें हमने उस भू-भाग के पूरब के हिस्सों और पश्चिम के हिस्सों का उत्तराधिकारी बना दिया, जिसे हमने बरकत दी थी। और तुम्हारे रब का अच्छा वादा इसराईल की सन्तान के हक़ में पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धैर्य से काम लिया और फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ हमने विनष्ट कर दिया, जिसे वे बनाते और ऊँचा उठाते थे
138
और इसराईल की सन्तान को हमने सागर से पार करा दिया, फिर वे ऐसे लोगों को पास पहुँचे जो अपनी कुछ मूर्तियों से लगे बैठे थे। कहने लगे, "ऐ मूसा! हमारे लिए भी कोई ऐसा उपास्य ठहरा दे, जैसे इनके उपास्य है।" उसने कहा, "निश्चय ही तुम बड़े ही अज्ञानी लोग हो
139
“निश्चय ही वह लोग लगे हुए है, बरबाद होकर रहेगा। और जो कुछ ये कर रहे है सर्वथा व्यर्थ है।"
140
उसने कहा, "क्या मैं अल्लाह के सिवा तुम्हारे लिए कोई और उपास्य ढूढूँ, हालाँकि उसी ने सारे संसारवालों पर तुम्हें श्रेष्ठता प्रदान की?"
141
और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छुटकारा दिया जो तुम्हें बुरी यातना में ग्रस्त रखते थे। तुम्हारे बेटों को मार डालते और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते थे। और वह (छुटकारा दिलाना) तुम्हारे रब की ओर से बड़ा अनुग्रह है
142
और हमने मूसा से तीस रातों का वादा ठहराया, फिर हमने दस और बढ़ाकर उसे पूरा किया। इसी प्रकार उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई और मूसा ने अपने भाई हारून से कहा, "मेरे पीछे तुम मेरी क़ौम में मेरा प्रतिनिधित्व करना और सुधारना और बिगाड़ पैदा करनेवालों के मार्ग पर न चलना।"
143
अब मूसा हमारे निश्चित किए हुए समय पर पहुँचा और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह करने लगा, "मेरे रब! मुझे देखने की शक्ति प्रदान कर कि मैं तुझे देखूँ।" कहा, "तू मुझे कदापि न देख सकेगा। हाँ, पहाड़ की ओर देख। यदि वह अपने स्थान पर स्थिर पर स्थिर रह जाए तो फिर तू मुझे देख लेगा।" अतएव जब उसका रब पहाड़ पर प्रकट हुआ तो उसे चकनाचूर कर दिया और मूसा मूर्छित होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया तो कहा, "महिमा है तेरी! मैं तेरे समझ तौबा करता हूँ और सबसे पहला ईमान लानेवाला मैं हूँ।"
144
उसने कहा, "ऐ मूसा! मैंने दूसरे लोगों के मुक़ाबले में तुझे चुनकर अपने संदेशों और अपनी वाणी से तुझे उपकृत किया। अतः जो कुछ मैं तुझे दूँ उसे ले और कृतज्ञता दिखा।"
145
और हमने उसके लिए तख़्तियों पर उपदेश के रूप में हर चीज़ और हर चीज़ का विस्तृत वर्णन लिख दिया। अतः उनको मज़बूती से पकड़। उनमें उत्तम बातें है। अपनी क़ौम के लोगों को हुक्म दे कि वे उनको अपनाएँ। मैं शीघ्र ही तुम्हें अवज्ञाकारियों का घर दिखाऊँगा
146
जो लोग धरती में नाहक़ बड़े बनते है, मैं अपनी निशानियों की ओर से उन्हें फेर दूँगा। यदि वे प्रत्येक निशानी देख ले तब भी वे उस पर ईमान नहीं लाएँगे। यदि वे सीधा मार्ग देख लें तो भी वे उसे अपना मार्ग नहीं बनाएँगे। लेकिन यदि वे पथभ्रष्ट का मार्ग देख लें तो उसे अपना मार्ग ठहरा लेंगे। यह इसलिए की उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे
147
जिन लोगों ने हमारी आयतों को और आख़िरत के मिलन को झूठा जाना, उनका तो सारा किया-धरा उनकी जान को लागू हुआ। जो कुछ वे करते रहे क्या उसके सिवा वे किसी और चीज़ का बदला पाएँगे?
148
और मूसा के पीछे उसकी क़ौम ने अपने ज़ेवरों से अपने लिए एक बछड़ा बना दिया, जिसमें से बैल की-सी आवाज़ निकलती थी। क्या उन्होंने देखा नहीं कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई राह दिखाता है? उन्होंने उसे अपना उपास्य बना लिया, औऱ वे बड़े अत्याचारी थे
149
और जब (चेताबनी से) उन्हें पश्चाताप हुआ और उन्होंने देख लिया कि वास्तव में वे भटक गए हैं तो कहने लगे, "यदि हमारे रब ने हमपर दया न की और उसने हमें क्षमा न किया तो हम घाटे में पड़ जाएँगे!"
150
और जब मूसा क्रोध और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम की ओर लौटा तो उसने कहा, "तुम लोगों ने मेरे पीछे मेरी जगह बुरा किया। क्या तुम अपने रब के हुक्म से पहले ही जल्दी कर बैठे?" फिर उसने तख़्तियाँ डाल दी और अपने भाई का सिर पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। वह बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! लोगों ने मुझे कमज़ोर समझ लिया और निकट था कि मुझे मार डालते। अतः शत्रुओं को मुझपर हुलसने का अवसर न दे और अत्याचारी लोगों में मुझे सम्मिलित न कर।"
151
उसने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे और हमें अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। तू तो सबसे बढ़कर दयावान हैं।"
152
जिन लोगों ने बछड़े को अपना उपास्य बनाया, वे अपने रब की ओर से प्रकोप और सांसारिक जीवन में अपमान से ग्रस्त होकर रहेंगे; और झूठ घड़नेवालों को हम ऐसा ही बदला देते है
153
रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए फिर उसके पश्चात तौबा कर ली और ईमान ले आए, तो इसके बाद तो तुम्हारा रब बड़ा ही क्षमाशील, दयाशील है
154
और जब मूसा का क्रोध शान्त हुआ तो उसने तख़्तियों को उठा लिया। उनके लेख में उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता थी जो अपने रब से डरते है
155
मूसा ने अपनी क़ौम के सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय के लिए चुना। फिर जब उन लोगों को एक भूकम्प ने आ पकड़ा तो उसने कहा, "मेर रब! यदि तू चाहता तो पहले ही इनको और मुझको विनष्ट़ कर देता। जो कुछ हमारे नादानों ने किया है, क्या उसके कारण तू हमें विनष्ट करेगा? यह तो बस तेरी ओर से एक परीक्षा है। इसके द्वारा तू जिसको चाहे पथभ्रष्ट कर दे और जिसे चाहे मार्ग दिखा दे। तू ही हमारा संरक्षक है। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर, और तू ही सबसे बढ़कर क्षमा करनेवाला है
156
"और हमारे लिए इस संसार में भलाई लिख दे और आख़िरत में भी। हम तेरी ही ओर उन्मुख हुए।" उसने कहा, "अपनी यातना में मैं तो उसी को ग्रस्त करता हूँ, जिसे चाहता हूँ, किन्तु मेरी दयालुता से हर चीज़ आच्छादित है। उसे तो मैं उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो डर रखते और ज़कात देते है और जो हमारी आयतों पर ईमान लाते है
157
"(तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग है) जो उस रसूल, उम्मी नबी का अनुसरण करते है, जिसे वे अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा पाते है। और जो उन्हें भलाई का हुक्म देता और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों का हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों का हराम ठहराता है और उनपर से उनके वह बोझ उतारता है, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस प्रकाश के अनुगत हुए, जो उसके साथ अवतरित हुआ है, वही सफलता प्राप्त करनेवाले है।"
158
कहो, "ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है। अतः अल्लाह और उसके रसूल, उस उम्मी नबी, पर ईमान लाओ जो स्वयं अल्लाह पर और उसके शब्दों (वाणी) पर ईमान रखता है और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्ग पा लो।"
159
मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते
160
और हमने उन्हें बारह ख़ानदानों में विभक्त करके अलग-अलग समुदाय बना दिया। जब उसकी क़ौम के लोगों ने पानी माँगा तो हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "अपनी लाठी अमुक चट्टान पर मारो।" अतएव उससे बारह स्रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट मालूम कर लिया। और हमने उनपर बादल की छाया की और उन पर 'मन्न' और 'सलवा' उतारा, "हमनें तुम्हें जो अच्छी-स्वच्छ चीज़े प्रदान की है, उन्हें खाओ।" उन्होंने हम पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वास्तव में वे स्वयं अपने ऊपर ही ज़ुल्म करते रहे
161
याद करो जब उनसे कहा गया, "इस बस्ती में रहो-बसो और इसमें जहाँ से चाहो खाओ और कहो - हित्ततुन। और द्वार में सजदा करते हुए प्रवेश करो। हम तुम्हारी ख़ताओं को क्षमा कर देंगे और हम सुकर्मी लोगों को अधिक भी देंगे।"
162
किन्तु उनमें से जो अत्याचारी थे उन्होंने, जो कुछ उनसे कहा गया था, उसको उससे भिन्न बात से बदल दिया। अतः जो अत्याचार वे कर रहे थे, उसके कारण हमने आकाश से उनपर यातना भेजी
163
उनसे उस बस्ती के विषय में पूछो जो सागर-तट पर थी। जब वे सब्त के मामले में सीमा का उल्लंघन करते थे, जब उनके सब्त के दिन उनकी मछलियाँ खुले तौर पर पानी के ऊपर आ जाती थी और जो दिन उनके सब्त का न होता तो वे उनके पास न आती थी। इस प्रकार उनके अवज्ञाकारी होने के कारण हम उनको परीक्षा में डाल रहे थे
164
और जब उनके एक गिरोह ने कहा, "तुम ऐसे लोगों को क्यों नसीहत किए जा रहे हो, जिन्हें अल्लाह विनष्ट करनेवाला है या जिन्हें वह कठोर यातना देनेवाला है?" उन्होंने कहा, "तुम्हारे रब के समक्ष अपने को निरपराध सिद्ध करने के लिए, और कदाचित वे (अवज्ञा से) बचें।"
165
फिर जब वे उसे भूल गए जो नसीहत उन्हें दी गई थी तो हमने उन लोगों को बचा लिया, जो बुराई से रोकते थे और अत्याचारियों को उनकी अवज्ञा के कारण कठोर यातना में पकड़ लिया
166
फिर जब वे सरकशी के साथ वही कुछ करते रहे, जिससे उन्हें रोका गया था तो हमने उनसे कहा, "बन्दर हो जाओ, अपमानित और तिरस्कृत!"
167
और याद करो जब तुम्हारे रब ने ख़बर कर दी थी कि वह क़ियामत के दिन तक उनके विरुद्ध ऐसे लोगों को उठाता रहेगा, जो उन्हें बुरी यातना देंगे। निश्चय ही तुम्हारा रब जल्द सज़ा देता है और वह बड़ा क्षमाशील, दावान भी है
168
और हमने उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके धरती में अनेक गिरोहों में बिखेर दिया। कुछ उनमें से नेक है और कुछ उनमें इससे भिन्न हैं, और हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनकी परीक्षा ली, कदाचित वे पलट आएँ
169
फिर उनके पीछ ऐसे अयोग्य लोगों ने उनकी जगह ली, जो किताब के उत्ताराधिकारी होकर इसी तुच्छ संसार का सामान समेटते है और कहते है, "हमें अवश्य क्षमा कर दिया जाएगा।" और यदि इस जैसा और सामान भी उनके पास आ जाए तो वे उसे भी ले लेंगे। क्या उनसे किताब का यह वचन नहीं लिया गया था कि वे अल्लाह पर थोपकर हक़ के सिवा कोई और बात न कहें। और जो उसमें है उसे वे स्वयं पढ़ भी चुके है। और आख़िरत का घर तो उन लोगों के लिए उत्तम है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
170
और जो लोग किताब को मज़बूती से थामते है और जिन्होंने नमाज़ क़ायम कर रखी है, तो काम को ठीक रखनेवालों के प्रतिदान को हम कभी अकारथ नहीं करते
171
और याद करो जब हमने पर्वत को हिलाया, जो उनके ऊपर था। मानो वह कोई छत्र हो और वे समझे कि बस वह उनपर गिरा ही चाहता है, "थामो मज़बूती से, जो कुछ हमने दिया है। और जो कुछ उसमें है उसे याद रखो, ताकि तुम बच सको।"
172
और याद करो जब तुम्हारे रब ने आदम की सन्तान से (अर्थात उनकी पीठों से) उनकी सन्तति निकाली और उन्हें स्वयं उनके ऊपर गवाह बनाया कि "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" बोले, "क्यों नहीं, हम गवाह है।" ऐसा इसलिए किया कि तुम क़ियामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी।"
173
या कहो कि "(अल्लाह के साथ) साझी तो पहले हमारे बाप-दादा ने किया। हम तो उसके पश्चात उनकी सन्तति में हुए है। तो क्या तू हमें उसपर विनष्ट करेगा जो कुछ मिथ्याचारियों ने किया है?"
174
इस प्रकार स्थिति के अनुकूल आयतें प्रस्तुत करते है। और शायद कि वे पलट आएँ
175
और उन्हें उस व्यक्ति का हाल सुनाओ जिसे हमने अपनी आयतें प्रदान की किन्तु वह उनसे निकल भागा। फिर शैतान ने उसे अपने पीछे लगा लिया। अन्ततः वह पथभ्रष्ट और विनष्ट होकर रहा
176
यदि हम चाहते तो इन आयतों के द्वारा उसे उच्चता प्रदान करते, किन्तु वह तो धरती के साथ लग गया और अपनी इच्छा के पीछे चला। अतः उसकी मिसाल कुत्ते जैसी है कि यदि तुम उसपर आक्षेप करो तब भी वह ज़बान लटकाए रहे या यदि तुम उसे छोड़ दो तब भी वह ज़बान लटकाए ही रहे। यही मिसाल उन लोगों की है, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, तो तुम वृत्तान्त सुनाते रहो, कदाचित वे सोच-विचार कर सकें
177
बुरे है मिसाल की दृष्टि से वे लोग, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और वे स्वयं अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे
178
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए वही सीधा मार्ग पानेवाला है और जिसे वह मार्ग से वंचित रखे, तो ऐसे ही लोग घाटे में पड़नेवाले हैं
179
निश्चय ही हमने बहुत-से जिन्नों और मनुष्यों को जहन्नम ही के लिए फैला रखा है। उनके पास दिल है जिनसे वे समझते नहीं, उनके पास आँखें है जिनसे वे देखते नहीं; उनके पास कान है जिनसे वे सुनते नहीं। वे पशुओं की तरह है, बल्कि वे उनसे भी अधिक पथभ्रष्ट है। वही लोग है जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
180
अच्छे नाम अल्लाह ही के है। तो तुम उन्हीं के द्वारा उसे पुकारो और उन लोगों को छोड़ो जो उसके नामों के सम्बन्ध में कुटिलता ग्रहण करते है। जो कुछ वे करते है, उसका बदला वे पाकर रहेंगे
181
हमारे पैदा किए प्राणियों में कुछ लोग ऐसे भी है जो हक़ के अनुसार मार्ग दिखाते और उसी के अनुसार न्याय करते है
182
रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, हम उन्हें क्रमशः तबाही की ओर ले जाएँगे, ऐसे तरीक़े से जिसे वे जानते नहीं
183
मैं तो उन्हें ढील दिए जा रहा हूँ। निश्चय ही मेरी चाल अत्यन्त सुदृढ़ है
184
क्या उन लोगों ने विचार नहीं किया? उनके साथी को कोई उन्माद नहीं। वह तो बस एक साफ़-साफ़ सचेत करनेवाला है
185
या क्या उन्होंने आकाशों और धरती के राज्य पर और जो चीज़ भी अल्लाह ने पैदा की है उसपर दृष्टि नहीं डाली, और इस बात पर कि कदाचित उनकी अवधि निकट आ लगी हो? फिर आख़िर इसके बाद अब कौन-सी बात हो सकती है, जिसपर वे ईमान लाएँगे?
186
जिसे अल्लाह मार्ग से वंचित रखे उसके लिए कोई मार्गदर्शक नहीं। वह तो तो उन्हें उनकी सरकशी ही में भटकता हुआ छोड़ रहा है
187
तुमसे उस घड़ी (क़ियामत) के विषय में पूछते है कि वह कब आएगी? कह दो, "उसका ज्ञान मेरे रब ही के पास है। अतः वही उसे उसके समय पर प्रकट करेगा। वह आकाशों और धरती में बोझिल हो गई है - बस अचानक ही वह तुमपर आ जाएगी।" वे तुमसे पूछते है मानो तुम उसके विषय में भली-भाँति जानते हो। कह दो, "उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है - किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते।"
188
कहो, "मैं अपने लिए न तो लाभ का अधिकार रखता हूँ और न हानि का,बल्कि अल्लाह ही की इच्छा क्रियान्वित है। यदि मुझे परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान होता तो बहुत-सी भलाई समेट लेता और मुझे कभी कोई हानि न पहुँचती। मैं तो बस सचेत करनेवाला हूँ, उन लोगों के लिए जो ईमान लाएँ।"
189
वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे। फिर जब उसने उसको ढाँक लिया तो उसने एक हल्का-सा बोझ उठा लिया; फिर वह उसे लिए हुए चलती-फिरती रही, फिर जब वह बोझिल हो गई तो दोनों ने अल्लाह - अपने रब को पुकारा, "यदि तूने हमें भला-चंगा बच्चा दिया, तो निश्चय ही हम तेरे कृतज्ञ होंगे।"
190
किन्तु उसने जब उन्हें भला-चंगा (बच्चा) प्रदान किया तो जो उन्हें प्रदान किया उसमें वे दोनों उसका (अल्लाह का) साझी ठहराने लगे। किन्तु अल्लाह तो उच्च है उससे, जो साझी वे ठहराते है
191
क्या वे उसको साझी ठहराते है जो कोई चीज़ भी पैदा नहीं करता, बल्कि ऐसे उनके ठहराए हुए साझीदार तो स्वयं पैदा किए जाते हैं
192
और वे न तो उनकी सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है?
193
यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे तुम्हारे पीछे न आएँगे। तुम्हारे लिए बराबर है - उन्हें पुकारो या तुम चुप रहो
194
तुम अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वे तो तुम्हारे ही जैसे बन्दे है, अतः पुकार लो उनको, यदि तुम सच्चे हो, तो उन्हें चाहिए कि वे तुम्हें उत्तर दे!
195
क्या उनके पाँव हैं जिनसे वे चलते हों या उनके हाथ हैं जिनसे वे पकड़ते हों या उनके पास आँखें हीं जिनसे वे देखते हों या उनके कान हैं जिनसे वे सुनते हों? कहों, "तुम अपने ठहराए हु सहभागियों को बुला लो, फिर मेरे विरुद्ध चालें न चलो, इस प्रकार कि मुझे मुहलत न दो
196
निश्चय ही मेरा संरक्षक मित्र अल्लाह है, जिसने यह किताब उतारी और वह अच्छे लोगों का संरक्षण करता है
197
रहे वे जिन्हें तुम उसको छोड़कर पुकारते हो, वे तो तुम्हारी, सहायता करने की सामर्थ्य रखते है और न स्वयं अपनी ही सहायता कर सकते है
198
और यदि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ तो वे न सुनेंगे। वे तुम्हें ऐसे दीख पड़ते हैं जैसे वे तुम्हारी ओर ताक रहे हैं, हालाँकि वे कुछ भी नहीं देखते
199
क्षमा की नीति अपनाओ और भलाई का हुक्म देते रहो और अज्ञानियों से किनारा खींचो
200
और यदि शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की शरण माँगो। निश्चय ही, वह सब कुछ सुनता जानता है
201
जो डर रखते हैं, उन्हें जब शैतान की ओर से कोई ख़याल छू जाता है, तो वे चौंक उठते हैं। फिर वे साफ़ देखने लगते हैं
202
और उन (शैतानों) के भाई उन्हें गुमराही में खींचे लिए जाते हैं, फिर वे कोई कमी नहीं करते
203
और जब तुम उनके सामने कोई निशानी नहीं लाते तो वे कहते हैं, "तुम स्वयं कोई निशानी क्यों न छाँट लाए?" कह दो, "मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ जो मेरे रब की ओर से प्रकाशना की जाती है। यह तुम्हारे रब की ओर से अन्तर्दृष्टियों का प्रकाश-पुंज है, और ईमान लानेवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है।"
204
जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यानपूर्वक सुनो और चुप रहो, ताकि तुमपर दया की जाए
205
अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
206
निस्संदेह जो तुम्हारे रब के पास है, वे उसकी बन्दगी के मुक़ाबले में अहंकार की नीति नहीं अपनाते; वे तो उसकी तसबीह (महिमागान) करते है और उसी को सजदा करते है