# सूरह यूनुस (Yunus) — अरबी टेक्स्ट, हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ
सूरह यूनुस पवित्र कुरआन की दसवीं सूरह है। इसमें कुल 109 आयतें हैं। इस सूरह में अल्लाह की एकता, उसकी शक्ति, पैगंबरों के संदेश, इंसान के ईमान और आखिरत से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों का वर्णन मिलता है। इस सूरह का नाम पैगंबर यूनुस (अलैहिस्सलाम) के नाम पर रखा गया है।
इस लेख में आप **सूरह यूनुस (Surah Yunus · यूनुस)** की आयत 1 से 109 तक अरबी टेक्स्ट, हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ पढ़ सकते हैं। इसका उद्देश्य पाठकों को आयतों को समझने और उनका अर्थ जानने में आसानी प्रदान करना है।
यहाँ प्रत्येक आयत को अरबी मूल पाठ, हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ के साथ व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक आसानी से आयतवार पढ़ सकें और सूरह के संदेश को समझ सकें।
**ध्यान दें:** हिंदी उच्चारण अरबी के सही मखराज और तजवीद का पूरी तरह विकल्प नहीं है। सही उच्चारण सीखने के लिए अरबी पाठ के साथ किसी विश्वसनीय क़ारी की तिलावत भी सुनें।
शीर्षक: सूरह यूनुस (Surah Yunus) - हिंदी उच्चारण, अरबी टेक्स्ट और अनुवाद के साथ
क्या आप सूरह यूनुस (Surah Yunus - सूरह नम्बर 10) को हिंदी में आसानी से पढ़ना और समझना चाहते हैं? अगर आपको अरबी पढ़ने में थोड़ी कठिनाई होती है, तो यह ब्लॉग पोस्ट खास आपके लिए ही तैयार की गई है।
इस पोस्ट में हमने कुरान की 10वीं सूरह, यानी सूरह यूनुस (Surah Yunus) का अरबी टेक्स्ट (यूनुस - यूनुस), सही हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration) और इसका हिंदी अर्थ व अनुवाद (Hindi Meaning/Translation) एक ही जगह पर बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत किया है।
सूरह यूनुस मक्की सूरह है, जिसमें अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद), हिदायत, और हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) तथा अन्य नबियों के अहम वाकयात का ज़िक्र है। इस सूरह को हिंदी में पढ़ने और इसके सही अर्थ को समझकर अपनी नमाज़ व तिलावत को बेहतर बनाने के लिए इस पोस्ट को पूरा ज़रूर पढ़ें।
सूरह यूनुस उच्चारण
बिस्मिल्लाहिर्-रहमानिर्-रहीम्
1
अलिफ़ लाम् रा तिल्क आयातुल्-किताबिल्-हकीम्
2
अकान लिन्-नासि अजबन् अन् औहैना इला रजुलिम्-मिन्हुम् अन् अन्ज़िरिन्-नास व बश्शिरिल्-लज़ीन आमनू अन्न लहुम् क़दम सिद्क़िन् इन्द रब्बिहिम् क़ालल्-काफ़िरून इन्न हाज़ा लसाहिरुम्-मुबीन्
3
इन्न रब्बकुमुल्लाहुल्-लज़ी ख़लक़स्-समावाति वल्-अर्द फ़ी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्-तवा अलल्-अर्शि युदब्बिरुल्-अम्र मा मिन् शफ़ी'इन् इल्ला मिम्-बा'दि इज़्निही ज़ालिकुमुल्लाहु रब्बुकुम् फ़ा'बुदूहु अफ़ला तज़क्करून्
4
इलैहि मर्जि'उकुम् जमी'अव्-वा'दल्लाहि हक़्क़न् इन्नहू यब्दउल्-ख़ल्क़ सुम्म यु'ईदुहू लियज्ज़ियल्-लज़ीन आमनू व अमिलुस्-सालिहाति बिल्-क़िस्ति वल्लज़ीन कफ़रू लहुम् शराबुम्-मिन् हमीमिव्-व अज़ाबुन् अलीमुम्-बिमा कानू यक्फ़ुरून्
5
हुवल्लज़ी ज'अलश्-शम्स दिया'अव्-वल्-क़मर नूरव्-व क़द्दरहू मनाज़िल लित'अलमू अददस्-सिनीन वल्-हिसाब मा ख़लक़ल्लाहु ज़ालिक इल्ला बिल्-हक़्क़ि युफ़स्सिलुल्-आयाति लिक़ौमिय्-य'अलमून्
6
इन्न फ़िख़्तिलाफ़िल्-लैलि वन्-नहारि व मा ख़लक़ल्लाहु फ़िस्-समावाति वल्-अर्दि ल-आयातिल्-लिक़ौमिय्-यत्तक़ून्
7
इन्नल्-लज़ीन ला यर्जून लिक़ाअना व रदू बिल्-हयातिद्-दुन्या वत्म'अन्नू बिहा वल्लज़ीन हुम् अन् आयातिना ग़ाफ़िलून्
8
उलाइक मा'वाहुमुन्-नारु बिमा कानू यक्सिबून्
9
इन्नल्-लज़ीन आमनू व अमिलुस्-सालिहाति यह्दीहिम् रब्बुहुम्-बिईमानिहिम् तज्री मिन् तह्तिहिमुल्-अन्हारु फ़ी जन्नातिन्-न'ईम्
10
दा'वाहुम् फ़ीहा सुब्हानकल्लाहुम्म व तहिय्यतुहुम् फ़ीहा सलाम् व आख़िरु दा'वाहुम् अनिल्-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल्-आलमीन्
11
व लौ यु'अज्जिलुल्लाहु लिन्-नासिश्-शर्रस्-ति'जालहुम्-बिल्-ख़ैरि लक़ुदिय इलैहिम् अजलुहुम् फ़नज़रुल्-लज़ीन ला यर्जून लिक़ाअना फ़ी तुग़्यानिहिम् य'अमहून्
12
व इज़ा मस्सल्-इन्सानद्-दुर्रु द'आना लिजम्बिही औ का'इदन् औ का'इमन् फ़लम्मा कशफ़्ना अन्हु दुर्रहू मर्र कअल्-लम् यद्'उना इला दुर्रिम्-मस्सहू कज़ालिक ज़ुय्यिन लिल्-मुस्रिफ़ीन मा कानू य'अमलून्
13
व लक़द् अह्लक्नल्-क़ुरून मिन् क़ब्लिकुम् लम्मा ज़लमू व जाअत्हुम् रुसुलुहुम्-बिल्-बय्यिनाति व मा कानू लियु'मिनू कज़ालिक नज्ज़िल्-क़ौमल्-मुज्रिमीन्
14
सुम्म ज'अल्नाकुम् ख़लाइफ़ फ़िल्-अर्दि मिम्-बा'दिहिम् लिनन्ज़ुर कैफ़ त'अमलून्
15
व इज़ा तुत्ला अलैहिम् आयातुना बय्यिनातिन् क़ालल्-लज़ीन ला यर्जून लिक़ाअना'ति बिक़ुरआनिन् ग़ैरि हाज़ा औ बद्दिल्हु क़ुल् मा यकूनु ली अन् उबद्दिलहू मिन् तिल्क़ाइ नफ़्सी इन् अत्तबि'उ इल्ला मा यूहा इलय्य इन्नी अख़ाफ़ु इन् असैतु रब्बी अज़ाब यौमिन् अज़ीम्
16
क़ुल्-लौ शाअल्लाहु मा तलौतुहू अलैकुम् व ला अद्राकुम्-बिही फ़क़द् लबिस्तु फ़ीकुम् उमुरम्-मिन् क़ब्लिही अफ़ला त'अक़िलून्
17
फ़मन् अज़्लमु मिम्मनिफ़्-तरा अलल्लाहि कज़िबन् औ कज़्ज़ब बिआयातिही इन्नहू ला युफ़्लिहुल्-मुज्रिमून्
18
व य'अबुदून मिन् दूनिल्लाहि मा ला यदुर्रुहुम् व ला यन्फ़'उहुम् व यक़ूलून हाउला'इ शुफ़'आउना इन्दल्लाहि क़ुल् अतुनब्बि'ऊनल्लाह बिमा ला य'अलमु फ़िस्-समावाति व ला फ़िल्-अर्दि सुब्हानहू व त'आला अम्मा युश्रिकून्
19
व मा कानन्-नासु इल्ला उम्मतव्-वाहिदतन् फ़ख़्तलफ़ू व लौला कलिमतुन् सबक़त् मिर्-रब्बिक लक़ुदिय बैनहुम् फ़ीमा फ़ीहि यख़्तलिफ़ून्
20
व यक़ूलून लौला उन्ज़िल अलैहि आयतुम्-मिर्-रब्बिही फ़क़ुल् इन्नमल्-ग़ैबु लिल्लाहि फ़न्तज़िरू इन्नी म'अकुम्-मिनल्-मुन्तज़िरीन्
21
व इज़ा अज़क़्नन्-नास रह्मतम्-मिम्-बा'दि दर्राअ मस्सत्हुम् इज़ा लहुम्-मक्रुन् फ़ी आयातिना क़ुलिल्लाहु अस्र'उ मक्रन् इन्न रुसुलना यक्तुबून मा तम्कुरून्
22
हुवल्लज़ी युसय्यिरुकुम् फ़िल्-बर्रि वल्-बह्रि हत्ता इज़ा कुन्तुम् फ़िल्-फ़ुल्कि व जरैन बिहिम्-बिरीहिन् तय्यिबतिव्-व फ़रिहू बिहा जाअत्हा रीहुन् आसिफ़ुव्-व जाअहुमुल्-मौजु मिन् कुल्लि मकानिव्-व ज़न्नू अन्नहुम् उहीत बिहिम् द'अवुल्लाह मुख़्लिसीन लहुद्-दीन ल'इन् अन्जैतना मिन् हाज़िही लनकूनन्न मिनश्-शाकिरीन्
23
फ़लम्मा अन्जाहुम् इज़ा हुम् यब्ग़ून फ़िल्-अर्दि बिग़ैरिल्-हक़्क़ि या अय्युहन्-नासु इन्नमा बग़्युकुम् अला अन्फ़ुसिकुम्-मता'अल्-हयातिद्-दुन्या सुम्म इलैना मर्जि'उकुम् फ़नुनब्बि'उकुम्-बिमा कुन्तुम् त'अमलून्
24
इन्नमा मसलुल्-हयातिद्-दुन्या कमाइन् अन्ज़ल्नाहु मिनस्-समाइ फ़ख़्तलत बिही नबातुल्-अर्दि मिम्मा या'कुलुन्-नासु वल्-अन्'आमु हत्ता इज़ा अख़ज़तिल्-अर्दु ज़ुख़्रुफ़हा वज़्ज़य्यनत् व ज़न्न अह्लुहा अन्नहुम् क़ादिरून अलैहा अताहा अम्रुना लैलन् औ नहारन् फ़ज'अल्नाहा हसीदन् कअल्-लम् तग़्न बिल्-अम्सि कज़ालिक नुफ़स्सिलुल्-आयाति लिक़ौमिय्-यतफ़क्करून्
25
वल्लाहु यद्'ऊ इला दारिस्-सलामि व यह्दी मय्-यशाउ इला सिरातिम्-मुस्तक़ीम्
26
लिल्लज़ीन अह्सनुल्-हुस्ना व ज़ियादतुव्-व ला यर्हक़ु वुजूहहुम् क़तरुन् व ला ज़िल्लतुन् उलाइक अस्हाबुल्-जन्नति हुम् फ़ीहा ख़ालिदून्
27
वल्लज़ीन कसबुस्-सय्यि'आति जज़ाउ सय्यिअतिम्-बिमिस्लिहा व तर्हक़ुहुम् ज़िल्लतुन् मा लहुम्-मिनल्लाहि मिन् आसिमिन् कअन्नमा उग़्शियत् वुजूहुहुम् क़ित'अम्-मिनल्-लैलि मुज़्लिमन् उलाइक अस्हाबुन्-नारि हुम् फ़ीहा ख़ालिदून्
28
व यौम नह्शुरुहुम् जमी'अन् सुम्म नक़ूलु लिल्लज़ीन अश्रकू मकानकुम् अन्तुम् व शुरका'उकुम् फ़ज़य्यल्ना बैनहुम् व क़ाल शुरका'उहुम्-मा कुन्तुम् इय्याना त'अबुदून्
29
फ़कफ़ा बिल्लाहि शहीदम्-बैनना व बैनकुम् इन् कुन्ना अन् इबादतिकुम् लग़ाफ़िलीन्
30
हुनालिक तब्लू कुल्लु नफ़्सिम्-मा अस्लफ़त् व रुद्दू इलल्लाहि मौलाहुमुल्-हक़्क़ि व दल्ल अन्हुम्-मा कानू यफ़्तरून्
31
क़ुल् मय्-यर्ज़ुक़ुकुम्-मिनस्-समाइ वल्-अर्दि अम्मन् यम्लिकुस्-सम्'अ वल्-अब्सार व मय्-युख़्रिजुल्-हय्य मिनल्-मय्यिति व युख़्रिजुल्-मय्यित मिनल्-हय्यि व मय्-युदब्बिरुल्-अम्र फ़सयक़ूलूनल्लाहु फ़क़ुल् अफ़ला तत्तक़ून्
32
फ़ज़ालिकुमुल्लाहु रब्बुकुमुल्-हक़्क़ु फ़माज़ा बा'दल्-हक़्क़ि इल्लद्-दलालु फ़अन्ना तुस्रफ़ून्
33
कज़ालिक हक़्क़त् कलिमतु रब्बिक अलल्-लज़ीन फ़सक़ू अन्नहुम् ला यु'मिनून्
34
क़ुल् हल् मिन् शुरका'इकुम्-मय्-यब्दउल्-ख़ल्क़ सुम्म यु'ईदुहू क़ुलिल्लाहु यब्दउल्-ख़ल्क़ सुम्म यु'ईदुहू फ़अन्ना तु'फ़कून्
35
क़ुल् हल् मिन् शुरका'इकुम्-मय्-यह्दी इलल्-हक़्क़ि क़ुलिल्लाहु यह्दी लिल्-हक़्क़ि अफ़मन् यह्दी इलल्-हक़्क़ि अहक़्क़ु अय्-युत्तब'अ अम्मन् ला यहिद्दी इल्ला अय्-युह्दा फ़मा लकुम् कैफ़ तह्कुमून्
36
व मा यत्तबि'उ अक्सरुहुम् इल्ला ज़न्नन् इन्नज़्-ज़न्न ला युग़्नी मिनल्-हक़्क़ि शैअन् इन्नल्लाह अलीमुम्-बिमा यफ़्'अलून्
37
व मा कान हाज़ल्-क़ुरआनु अय्-युफ़्तरा मिन् दूनिल्लाहि व लाकिन् तस्दीक़ल्-लज़ी बैन यदैहि व तफ़्सीलल्-किताबि ला रैब फ़ीहि मिर्-रब्बिल्-आलमीन्
38
अम् यक़ूलूनफ़्-तराहु क़ुल् फ़ा'तू बिसूरतिम्-मिस्लिही वद्'ऊ मनिस्-तत'अत्तुम्-मिन् दूनिल्लाहि इन् कुन्तुम् सादिक़ीन्
39
बल् कज़्ज़बू बिमा लम् युहीतू बिइल्मिही व लम्मा या'तिहिम् ता'वीलुहू कज़ालिक कज़्ज़बल्-लज़ीन मिन् क़ब्लिहिम् फ़न्ज़ुर् कैफ़ कान आक़िबतुज़्-ज़ालिमीन्
40
व मिन्हुम्-मय्-यु'मिनु बिही व मिन्हुम्-मल्-ला यु'मिनु बिही व रब्बुक अलमु बिल्-मुफ़्सिदीन्
41
व इन् कज़्ज़बूक फ़क़ुल्-ली अमली व लकुम् अमलुकुम् अन्तुम् बरी'ऊन मिम्मा अमलु व अन बरी'उम्-मिम्मा त'अमलून्
42
व मिन्हुम्-मय्-यस्तमि'ऊन इलैक अफ़अन्त तुस्मि'उस्-सुम्म व लौ कानू ला य'अक़िलून्
43
व मिन्हुम्-मय्-यन्ज़ुरु इलैक अफ़अन्त तह्दिल्-उम्य व लौ कानू ला युब्सिरून्
44
इन्नल्लाह ला यज़्लिमुन्-नास शैअव्-व लाकिन्नन्-नास अन्फ़ुसहुम् यज़्लिमून्
45
व यौम यह्शुरुहुम् कअल्-लम् यल्बसू इल्ला सा'अतम्-मिनन्-नहारि यत'आरफ़ून बैनहुम् क़द् ख़सिरल्-लज़ीन कज़्ज़बू बिलिक़ाइल्लाहि व मा कानू मुह्तदीन्
46
व इम्मा नुरियन्नक बा'दल्-लज़ी न'इदुहुम् औ नतवफ़्फ़यन्नक फ़इलैना मर्जि'उहुम् सुम्मल्लाहु शहीदुन् अला मा यफ़्'अलून्
47
व लिकुल्लि उम्मतिर्-रसूलुन् फ़इज़ा जाअ रसूलुहुम् क़ुदिय बैनहुम्-बिल्-क़िस्ति व हुम् ला युज़्लमून्
48
व यक़ूलून मता हाज़ल्-वा'दु इन् कुन्तुम् सादिक़ीन्
49
क़ुल्-ला अम्लिकु लिनफ़्सी दर्रव्-व ला नफ़्'अन् इल्ला मा शाअल्लाहु लिकुल्लि उम्मतिन् अजलुन् इज़ा जाअ अजलुहुम् फ़ला यस्ता'ख़िरून सा'अतव्-व ला यस्तक़्दिमून्
50
क़ुल् अर'ऐतुम् इन् अताकुम् अज़ाबुहू बयातन् औ नहारम्-माज़ा यस्त'अजिलु मिन्हुल्-मुज्रिमून्
51
असुम्म इज़ा मा वक़'अ आमन्तुम् बिही आल्-आन व क़द् कुन्तुम् बिही तस्त'अजिलून्
52
सुम्म क़ील लिल्लज़ीन ज़लमू ज़ूक़ू अज़ाबल्-ख़ुल्दि हल् तुज्ज़ौन इल्ला बिमा कुन्तुम् तक्सिबून्
53
व यस्तम्बि'ऊनक अहक़्क़ुन् हुव क़ुल् ई व रब्बी इन्नहू लहक़्क़ुव्-व मा अन्तुम्-बिमु'जिज़ीन्
54
व लौ अन्न लिकुल्लि नफ़्सिन् ज़लमत् मा फ़िल्-अर्दि लफ़्तदत् बिही व असरुन्-नदामत लम्मा र'अवुल्-अज़ाब व क़ुदिय बैनहुम्-बिल्-क़िस्ति व हुम् ला युज़्लमून्
55
अला इन्न लिल्लाहि मा फ़िस्-समावाति वल्-अर्दि अला इन्न वा'दल्लाहि हक़्क़ुव्-व लाकिन्न अक्सरहुम् ला य'अलमून्
56
हुव युह्यी व युमीतु व इलैहि तुर्ज'ऊन्
57
या अय्युहन्-नासु क़द् जाअत्कुम्-मौ'इज़तुम्-मिर्-रब्बिकुम् व शिफ़ाउल्-लिमा फ़िस्-सुदूरि व हुदव्-व रह्मतुल्-लिल्-मु'मिनीन्
58
क़ुल् बिफ़द्लिल्लाहि व बिरह्मतिही फ़बिज़ालिक फ़ल्यफ़्रहू हुव ख़ैरुम्-मिम्मा यज्म'ऊन्
59
क़ुल् अर'ऐतुम्-मा अन्ज़लल्लाहु लकुम्-मिर्-रिज़्क़िन् फ़ज'अल्तुम्-मिन्हु हरामव्-व हलालन् क़ुल् आल्लाहु अज़िन लकुम् अम् अलल्लाहि तफ़्तरून्
60
व मा ज़न्नुल्-लज़ीन यफ़्तरून अलल्लाहिल्-कज़िब यौमल्-क़ियामति इन्नल्लाह लज़ू फ़द्लिन् अलन्-नासि व लाकिन्न अक्सरहुम् ला यश्कुरून्
61
व मा तकूनु फ़ी शा'निव्-व मा तत्लू मिन्हु मिन् क़ुरआनिव्-व ला त'अमलून मिन् अमलिन् इल्ला कुन्ना अलैकुम् शुहूदन् इज़ तुफ़ीदून फ़ीहि व मा या'ज़ुबु अर्-रब्बिक मिम्-मिस्क़ालि ज़र्रतिन् फ़िल्-अर्दि व ला फ़िस्-समाइ व ला अस्ग़र मिन् ज़ालिक व ला अक्बर इल्ला फ़ी किताबिम्-मुबीन्
62
अला इन्न औलिया'अल्लाहि ला ख़ौफ़ुन् अलैहिम् व ला हुम् यह्ज़नून्
63
अल्लज़ीन आमनू व कानू यत्तक़ून्
64
लहुमुल्-बुश्रा फ़िल्-हयातिद्-दुन्या व फ़िल्-आख़िरति ला तब्दील लिकलिमातिल्लाहि ज़ालिक हुवल्-फ़ौज़ुल्-अज़ीम्
65
व ला यह्ज़ुन्क क़ौलुहुम् इन्नल्-इज़्ज़त लिल्लाहि जमी'अन् हुवस्-समी'उल्-अलीम्
66
अला इन्न लिल्लाहि मन् फ़िस्-समावाति व मन् फ़िल्-अर्दि व मा यत्तबि'उल्-लज़ीन यद्'ऊन मिन् दूनिल्लाहि शुरका'अ इय्-यत्तबि'ऊन इल्लज़्-ज़न्न व इन् हुम् इल्ला यख़्रुसून्
67
हुवल्लज़ी ज'अल लकुमुल्-लैल लितस्कुनू फ़ीहि वन्-नहार मुब्सिरन् इन्न फ़ी ज़ालिक ल-आयातिल्-लिक़ौमिय्-यस्म'ऊन्
68
क़ालुत्-तख़ज़ल्लाहु वलदन् सुब्हानहू हुवल्-ग़निय्यु लहू मा फ़िस्-समावाति व मा फ़िल्-अर्दि इन् इन्दकुम्-मिन् सुल्तानिम्-बिहाज़ा अतक़ूलून अलल्लाहि मा ला त'अलमून्
69
क़ुल् इन्नल्-लज़ीन यफ़्तरून अलल्लाहिल्-कज़िब ला युफ़्लिहून्
70
मता'उन् फ़िद्-दुन्या सुम्म इलैना मर्जि'उहुम् सुम्म नुज़ीक़ुहुमुल्-अज़ाबश्-शदीद बिमा कानू यक्फ़ुरून्
71
वत्लु अलैहिम् नब'अ नूहिन् इज़ क़ाल लिक़ौमिही या क़ौमि इन् कान कबुर अलैकुम्-मक़ामी व तज़्किरी बिआयातिल्लाहि फ़'अलल्लाहि तवक्कल्तु फ़अज्मि'ऊ अम्रकुम् व शुरका'अकुम् सुम्म ला यकुन् अम्रुकुम् अलैकुम् ग़ुम्मतन् सुम्मक़्-दू इलय्य व ला तुन्ज़िरूनि
72
फ़इन् तवल्लैतुम् फ़मा स'अल्तुकुम्-मिन् अज्रिन् इन् अज्रिय इल्ला अलल्लाहि व उमिर्तु अन् अकून मिनल्-मुस्लिमीन्
73
फ़कज़्ज़बूहु फ़नज्जैनाहु व मम्-म'अहू फ़िल्-फ़ुल्कि व ज'अल्नाहुम् ख़लाइफ़ व अग़्रक़्नल्-लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिना फ़न्ज़ुर् कैफ़ कान आक़िबतुल्-मुन्ज़रीन्
74
सुम्म ब'अस्ना मिम्-बा'दिही रुसुलन् इला क़ौमिहिम् फ़जाऊहुम्-बिल्-बय्यिनाति फ़मा कानू लियु'मिनू बिमा कज़्ज़बू बिही मिन् क़ब्लु कज़ालिक नत्ब'उ अला क़ुलूबिल्-मु'तदीन्
75
सुम्म ब'अस्ना मिम्-बा'दिहिम्-मूसा व हारून इला फ़िर्'औन व मल'इही बिआयातिना फ़स्तक्बरू व कानू क़ौमम्-मुज्रिमीन्
76
फ़लम्मा जाअहुमुल्-हक़्क़ु मिन् इन्दिना क़ालू इन्न हाज़ा लसिह्रुम्-मुबीन्
77
क़ाल मूसा अतक़ूलून लिल्-हक़्क़ि लम्मा जाअकुम् असिह्रुन् हाज़ा व ला युफ़्लिहुस्-साहिरून्
78
क़ालू अजि'तना लितल्फ़ितना अम्मा वजद्ना अलैहि आबाअना व तकून लकुमल्-किब्रिया'उ फ़िल्-अर्दि व मा नह्नु लकुमा बिमु'मिनीन्
79
व क़ाल फ़िर्'औनु'तूनी बिकुल्लि साहिरिन् अलीम्
80
फ़लम्मा जाअस्-सहरतु क़ाल लहुम्-मूसा अल्क़ू मा अन्तुम्-मुल्क़ून्
81
फ़लम्मा अल्क़ौ क़ाल मूसा मा जि'तुम्-बिहिस्-सिह्रु इन्नल्लाह सयुब्तिलुहू इन्नल्लाह ला युस्लिहु अमलल्-मुफ़्सिदीन्
82
व युहिक़्क़ुल्लाहुल्-हक़्क़ बिकलिमातिही व लौ करिहल्-मुज्रिमून्
83
फ़मा आमन लिमूसा इल्ला ज़ुर्रिय्यतुम्-मिन् क़ौमिही अला ख़ौफ़िम्-मिन् फ़िर्'औन व मल'इहिम् अय्-यफ़्तिनहुम् व इन्न फ़िर्'औन ल'आलिन् फ़िल्-अर्दि व इन्नहू लमिनल्-मुस्रिफ़ीन्
84
व क़ाल मूसा या क़ौमि इन् कुन्तुम् आमन्तुम् बिल्लाहि फ़'अलैहि तवक्कलू इन् कुन्तुम्-मुस्लिमीन्
85
फ़क़ालू अलल्लाहि तवक्कल्ना रब्बना ला तज्'अल्ना फ़ित्नतल्-लिल्-क़ौमिज़्-ज़ालिमीन्
86
व नज्जिना बिरह्मतिक मिनल्-क़ौमिल्-काफ़िरीन्
87
व औहैना इला मूसा व अख़ीहि अन् तबव्व'आ लिक़ौमिकुमा बिमिस्र बुयूतव्-वज्'अलू बुयूतकुम् क़िब्लतव्-व अक़ीमुस्-सलात व बश्शिरिल्-मु'मिनीन्
88
व क़ाल मूसा रब्बना इन्नक आतैत फ़िर्'औन व मल'अहू ज़ीनतव्-व अम्वालन् फ़िल्-हयातिद्-दुन्या रब्बना लियुदिल्लू अन् सबीलिक रब्बनत्-मिस् अला अम्वालिहिम् वश्दुद् अला क़ुलूबिहिम् फ़ला यु'मिनू हत्ता यरवुल्-अज़ाबल्-अलीम्
89
क़ाल क़द् उजीबत्-दा'वतुकुमा फ़स्तक़ीमा व ला तत्तबि'आन्नि सबीलल्-लज़ीन ला य'अलमून्
90
व जावज़्ना बिबनी इस्राईलल्-बह्र फ़अत्ब'अहुम् फ़िर्'औनु व जुनूदुहू बग़्यव्-व अद्वन् हत्ता इज़ा अद्रकहुल्-ग़रक़ु क़ाल आमन्तु अन्नहू ला इलाह इल्लल्-लज़ी आमनत् बिही बनू इस्राईल व अन मिनल्-मुस्लिमीन्
91
आल्-आन व क़द् असैत क़ब्लु व कुन्त मिनल्-मुफ़्सिदीन्
92
फ़ल्-यौम नुनज्जीक बिबदनिक लितकून लिमन् ख़ल्फ़क आयतव्-व इन्न कसीरम्-मिनन्-नासि अन् आयातिना लग़ाफ़िलून्
93
व लक़द् बव्वा'ना बनी इस्राईल मुबव्व'अ सिद्क़िव्-व रज़क़्नाहुम्-मिनत्-तय्यिबाति फ़मख़्तलफ़ू हत्ता जाअहुमुल्-इल्मु इन्न रब्बक यक़्दी बैनहुम् यौमल्-क़ियामति फ़ीमा कानू फ़ीहि यख़्तलिफ़ून्
94
फ़इन् कुन्त फ़ी शक्किम्-मिम्मा अन्ज़ल्ना इलैक फ़स्'अलिल्-लज़ीन यक़्र'ऊनल्-किताब मिन् क़ब्लिक लक़द् जाअकल्-हक़्क़ु मिर्-रब्बिक फ़ला तकूनन्न मिनल्-मुम्तरीन्
95
व ला तकूनन्न मिनल्-लज़ीन कज़्ज़बू बिआयातिल्लाहि फ़तकून मिनल्-ख़ासिरीन्
96
इन्नल्-लज़ीन हक़्क़त् अलैहिम् कलिमतु रब्बिक ला यु'मिनून्
97
व लौ जाअत्हुम् कुल्लु आयतिन् हत्ता यरवुल्-अज़ाबल्-अलीम्
98
फ़लौला कानत् क़र्यतुन् आमनत् फ़नफ़'अहा ईमानुहा इल्ला क़ौम यूनुस लम्मा आमनू कशफ़्ना अन्हुम् अज़ाबल्-ख़िज़्यि फ़िल्-हयातिद्-दुन्या व मत्त'अनाहुम् इला हीन्
99
व लौ शाअ रब्बुक ल-आमन मन् फ़िल्-अर्दि कुल्लुहुम् जमी'अन् अफ़अन्त तुक्रिहुन्-नास हत्ता यकूनू मु'मिनीन्
100
व मा कान लिनफ़्सिन् अन् तु'मिन इल्ला बिइज़्निल्लाहि व यज्'अलुर्-रिज्स अलल्-लज़ीन ला य'अक़िलून्
101
क़ुलिन्ज़ुरू माज़ा फ़िस्-समावाति वल्-अर्दि व मा तुग़्निल्-आयातु वन्-नुज़ुरु अन् क़ौमिल्-ला यु'मिनून्
102
फ़हल् यन्तज़िरून इल्ला मिस्ल अय्यामिल्-लज़ीन ख़लौ मिन् क़ब्लिहिम् क़ुल् फ़न्तज़िरू इन्नी म'अकुम्-मिनल्-मुन्तज़िरीन्
103
सुम्म नुनज्जी रुसुलना वल्लज़ीन आमनू कज़ालिक हक़्क़न् अलैना नुन्जिल्-मु'मिनीन्
104
क़ुल् या अय्युहन्-नासु इन् कुन्तुम् फ़ी शक्किम्-मिन् दीनी फ़ला अबुदुल्-लज़ीन त'अबुदून मिन् दूनिल्लाहि व लाकिन् अबुदुल्लाहल्-लज़ी यतवफ़्फ़ाकुम् व उमिर्तु अन् अकून मिनल्-मु'मिनीन्
105
व अन् अक़िम् वज्हक लिद्-दीनि हनीफ़व्-व ला तकूनन्न मिनल्-मुश्रिकीन्
106
व ला तद्'उ मिन् दूनिल्लाहि मा ला यन्फ़'उक व ला यदुर्रुक फ़इन् फ़'अल्त फ़इन्नक इज़म्-मिनज़्-ज़ालिमीन्
107
व इय्-यम्सस्कल्लाहु बिदुर्रिन् फ़ला काशिफ़ लहू इल्ला हुव व इय्-युरिद्क बिख़ैरिन् फ़ला रादा लिफ़द्लिही युसीबु बिही मय्-यशाउ मिन् इबादिही व हुवल्-ग़फ़ूरुर्-रहीम्
108
क़ुल् या अय्युहन्-नासु क़द् जाअकुमुल्-हक़्क़ु मिर्-रब्बिकुम् फ़मनिह्-तदा फ़इन्नमा यह्तदी लिनफ़्सिही व मन् दल्ल फ़इन्नमा यदिल्लु अलैहा व मा अन अलैकुम्-बिवकील्
109
वत्तबि' मा यूहा इलैक वस्बिर् हत्ता यह्कुमल्लाहु व हुव ख़ैरुल्-हाकिमीन्
सूरह यूनुस अर्थ
अल्लाह के नाम से, जो सबसे ज़्यादा मेहरबान (दयालु) और सबसे ज़्यादा रहम करने वाला (कृपाशील) है
1
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। ये तत्वदर्शितायुक्त किताब की आयतें हैं
2
क्या लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि हमने उन्ही में से एक आदमी की ओर प्रकाशना की कि लोगों को सचेत कर दो और जो लोग मान लें, उनको शुभ समाचार दे दो कि उनके लिए रब के पास शाश्वत सच्चा उन्नत स्थान है? इनकार करनेवाले कहने लगे, "निस्संदेह यह एक खुला जादूगर है।"
3
निस्संदेह तुम्हारा रब वही अल्लाह है, जिसने आकाशों और धरती को छः दिनों में पैदा किया, फिर सिंहासन पर विराजमान होकर व्यवस्था चला रहा है। उसकी अनुज्ञा के बिना कोई सिफ़ारिश करनेवाला भी नहीं है। वह अल्लाह है तुम्हारा रब। अतः उसी की बन्दगी करो। तो क्या तुम ध्यान न दोगे?
4
उसी की ओर तुम सबको लौटना है। यह अल्लाह का पक्का वादा है। निस्संदेह वही पहली बार पैदा करता है। फिर दोबारा पैदा करेगा, ताकि जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें न्यायपूर्वक बदला दे। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया उनके लिए खौलता पेय और दुखद यातना है, उस इनकार के बदले में जो वे करते रहे
5
वही है जिसने सूर्य को सर्वथा दीप्ति और चन्द्रमा का प्रकाश बनाया औऱ उनके लिए मंज़िलें निश्चित की, ताकि तुम वर्षों की गिनती और हिसाब मालूम कर लिया करो। अल्लाह ने यह सब कुछ सोद्देश्य ही पैदा किया है। वह अपनी निशानियों को उन लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, जो जानना चाहें
6
निस्संदेह रात और दिन के उलट-फेर में और जो कुछ अल्लाह ने आकाशों और धरती में पैदा किया उसमें डर रखनेवाले लोगों के लिए निशानियाँ है
7
रहे वे लोग जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते और सांसारिक जीवन ही पर निहाल हो गए है और उसी पर संतुष्ट हो बैठे, और जो हमारी निशानियों की ओर से असावधान है;
8
ऐसे लोगों का ठिकाना आग है, उसके बदले में जो वे कमाते रहे
9
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनका रब उनके ईमान के कारण उनका मार्गदर्शन करेगा। उनके नेमत भरी जन्नतों में नहरें बह रही होगी
10
वहाँ उनकी पुकार यह होगी कि "महिमा है तेरी, ऐ अल्लाह!" और उनका पारस्परिक अभिवादन "सलाम" होगा। और उनकी पुकार का अन्त इसपर होगा कि "प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का रब है।"
11
यदि अल्लाह लोगों के लिए उनके जल्दी मचाने के कारण भलाई की जगह बुराई को शीघ्र घटित कर दे तो उनकी ओर उनकी अवधि पूरी कर दी जाए, किन्तु हम उन लोगों को जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते उनकी अपनी सरकशी में भटकने के लिए छोड़ देते है
12
मनुष्य को जब कोई तकलीफ़ पहुँचती है, वह लेटे या बैठे या खड़े हमको पुकारने लग जाता है। किन्तु जब हम उसकी तकलीफ़ उससे दूर कर देते है तो वह इस तरह चल देता है मानो कभी कोई तकलीफ़ पहुँचने पर उसने हमें पुकारा ही न था। इसी प्रकार मर्यादाहीन लोगों के लिए जो कुछ वे कर रहे है सुहावना बना दिया गया है
13
तुमसे पहले कितनी ही नस्लों को, जब उन्होंने अत्याचार किया, हम विनष्ट कर चुके है, हालाँकि उनके रसूल उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे। किन्तु वे ऐसे न थे कि उन्हें मानते। अपराधी लोगों को हम इसी प्रकार बदला दिया करते है
14
फिर उनके पश्चात हमने धरती में उनकी जगह तुम्हें रखा, ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो
15
और जब उनके सामने हमारी खुली हुई आयतें पढ़ी जाती है तो वे लोग, जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, कहते है, "इसके सिवा कोई और क़ुरआन ले आओ या इसमें कुछ परिवर्तन करो।" कह दो, "मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं अपनी ओर से इसमें कोई परिवर्तन करूँ। मैं तो बस उसका अनुपालन करता हूँ, जो प्रकाशना मेरी ओर अवतरित की जाती है। यदि मैं अपने प्रभु की अवज्ञा करँस तो इसमें मुझे एक बड़े दिन की यातना का भय है।"
16
कह दो, "यदि अल्लाह चाहता तो मैं तुम्हें यह पढ़कर न सुनाता और न वह तुम्हें इससे अवगत कराता। आख़िर इससे पहले मैं तुम्हारे बीच जीवन की पूरी अवधि व्यतीत कर चुका हूँ। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?"
17
फिर उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े या उसकी आयतों को झुठलाए? निस्संदेह अपराधी कभी सफल नहीं होते
18
वे लोग अल्लाह से हटकर उनको पूजते हैं, जो न उनका कुछ बिगाड़ सकें और न उनका कुछ भला कर सकें। और वे कहते है, "ये अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी है।" कह दो, "क्या तुम अल्लाह को उसकी ख़बर देनेवाले? हो, जिसका अस्तित्व न उसे आकाशों में ज्ञात है न धरती में" महिमावान है वह और उसकी उच्चता के प्रतिकूल है वह शिर्क, जो वे कर रहे है
19
सारे मनुष्य एक ही समुदाय थे। वे तो स्वयं अलग-अलग हो रहे। और यदि तेरे रब की ओर से पहले ही एक बात निश्चित न हो गई होती, तो उनके बीच का फ़ैसला कर दिया जाता जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं
20
वे कहते है, "उस पर उनके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी?" तो कह दो, "परोक्ष तो अल्लाह ही से सम्बन्ध रखता है। अच्छा, प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
21
जब हम लोगों को उनके किसी तकलीफ़ में पड़ने के पश्चात दयालुता का रसास्वादन कराते है तो वे हमारी आयतों के विषय में चालबाज़ियाँ करने लग जाते है। कह दो, "अल्लाह की चाल ज़्यादा तेज़ है।" निस्संदेह, जो चालबाजियाँ तुम कर रहे हो, हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनको लिखते जा रहे है
22
वही है जो तुम्हें थल और जल में चलाता है, यहाँ तक कि जब तुम नौका में होते हो और वह लोगो को लिए हुए अच्छी अनुकूल वायु के सहारे चलती है और वे उससे हर्षित होते है कि अकस्मात उनपर प्रचंड वायु का झोंका आता है, हर ओर से लहरें उनपर चली आती है और वे समझ लेते है कि बस अब वे घिर गए, उस समय वे अल्लाह ही को, निरी उसी पर आस्था रखकर पुकारने लगते है, "यदि तूने हमें इससे बचा लिया तो हम अवश्य आभारी होंगे।"
23
फिर जब वह उनको बचा लेता है, तो क्या देखते है कि वे नाहक़ धरती में सरकशी करने लग जाते है। ऐ लोगों! तुम्हारी सरकशी तुम्हारे अपने ही विरुद्ध है। सांसारिक जीवन का सुख ले लो। फिर तुम्हें हमारी ही ओर लौटकर आना है। फिर हम तुम्हें बता देंगे जो कुछ तुम करते रहे होगे
24
सांसारिक जीवन की उपमा तो बस ऐसी है जैसे हमने आकाश से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगनेवाली चीज़े, जिनको मनुष्य और चौपाये सभी खाते है, घनी हो गई, यहाँ तक कि धरती ने अपना शृंगार कर लिया और सँवर गई और उसके मालिक समझने लगे कि उन्हें उसपर पूरा अधिकार प्राप्त है कि रात या दिन में हमारा आदेश आ पहुँचा। फिर हमने उसे कटी फ़सल की तरह कर दिया, मानो कल वहाँ कोई आबादी ही न थी। इसी तरह हम उन लोगों के लिए खोल-खोलकर निशानियाँ बयान करते है, जो सोच-विचार से काम लेना चाहें
25
और अल्लाह तुम्हें सलामती के घर की ओर बुलाता है, और जिसे चाहता है सीधी राह चलाता है;
26
अच्छे से अच्छा कर्म करनेवालों के लिए अच्छा बदला है और इसके अतिरिक्त और भी। और उनके चहरों पर न तो कलौस छाएगी और न ज़िल्लत। वही जन्नतवाले है; वे उसमें सदैव रहेंगे
27
रहे वे लोग जिन्होंने बुराइयाँ कमाई, तो एक बुराई का बदला भी उसी जैसा होगा; और ज़िल्लत उनपर छा रही होगी। उन्हें अल्लाह से बचानेवाला कोई न होगा। उनके चहरों पर मानो अँधेरी रात के टुकड़े ओढ़ा दिए गए हों। वही आगवाले हैं, उन्हें उसमें सदैव रहना है
28
और जिस दिन हम उन सबको इकट्ठा करेंगे, फिर उन लोगों से, जिन्होंने शिर्क किया होगा, कहेंगे, "अपनी जगह ठहरे रहो तुम भी और तुम्हारे साझीदार भी।" फिर हम उनके बीच अलगाव पैदा कर देंगे, और उनके ठहराए हुए साझीदार कहेंगे, "तुम हमारी तो हमारी बन्दगी नहीं करते थे
29
"हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है। हमें तो तुम्हारी बन्दगी की ख़बर तक न थी।"
30
वहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने पहले के किए हुए कर्मों को स्वयं जाँच लेगा और वह अल्लाह, अपने वास्तविक स्वामी की ओर फिरेंगे और जो कुछ झूठ वे घड़ते रहे थे, वह सब उनसे गुम होकर रह जाएगा
31
कहो, "तुम्हें आकाश और धरती से रोज़ी कौन देता है, या ये कान और आँखें किसके अधिकार में है और कौन जीवन्त को निर्जीव से निकालता है और निर्जीव को जीवन्त से निकालता है और कौन यह सारा इन्तिज़ाम चला रहा है?" इसपर वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह!" तो कहो, "फिर आख़िर तुम क्यों नहीं डर रखते?"
32
फिर यही अल्लाह तो है तुम्हारा वास्तविक रब। फिर आख़िर सत्य के पश्चात पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और क्या रह जाता है? फिर तुम कहाँ से फिरे जाते हो?
33
इसी तरह अवज्ञाकारी लोगों के प्रति तुम्हारे रब की बात सच्ची होकर रही कि वे मानेंगे नहीं
34
कहो, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारों में कोई है जो सृष्टि का आरम्भ भी करता हो, फिर उसकी पुनरावृत्ति भी करे?" कहो, "अल्लाह ही सृष्टि का आरम्भ करता है और वही उसकी पुनरावृति भी; आख़िर तुम कहाँ औधे हुए जाते हो?"
35
कहो, "क्या तुम्हारे ठहराए साझीदारों में कोई है जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे?" कहो, "अल्लाह ही सत्य के मार्ग पर चलाता है। फिर जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता हो, वह इसका ज़्यादा हक़दार है कि उसका अनुसरण किया जाए या वह जो स्वयं ही मार्ग न पाए जब तक कि उसे मार्ग न दिखाया जाए? फिर यह तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो?"
36
और उनमें से अधिकतर तो बस अटकल पर चलते है। निश्चय ही अटकल सत्य को कुछ भी दूर नहीं कर सकती। वे जो कुछ कर रहे हैं अल्लाह उसको भली-भाँति जानता है
37
यह क़ुरआन ऐसा नहीं है कि अल्लाह से हटकर घड लिया जाए, बल्कि यह तो जिसके समझ है, उसकी पुष्टि में है और किताब का विस्तार है, जिसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं। यह सारे संसार के रब की ओर से है
38
(क्या उन्हें कोई खटक है) या वे कहते है, "इस व्यक्ति (पैग़म्बर) ने उसे स्वयं ही घड़ लिया है?" कहो, "यदि तुम सच्चे हो, तो इस जैसी एक सुरा ले आओ और अल्लाह से हटकर उसे बुला लो, जिसपर तुम्हारा बस चले।"
39
बल्कि बात यह है कि जिस चीज़ के ज्ञान पर वे हावी न हो सके, उसे उन्होंने झुठला दिया और अभी उसका परिणाम उनके सामने नहीं आया। इसी प्रकार उन लोगों ने भी झुठलाया था, जो इनसे पहले थे। फिर देख लो उन अत्याचारियों का कैसा परिणाम हुआ!
40
उनमें कुछ लोग उसपर ईमान रखनेवाले है और उनमें कुछ लोग उसपर ईमान लानेवाले नहीं है। और तुम्हारा रब बिगाड़ पैदा करनेवालों को भली-भाँति जानता है
41
और यदि वे तुझे झुठलाएँ तो कह दो, "मेरा कर्म मेरे लिए है और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। जो कुछ मैं करता हूँ उसकी ज़िम्मेदारी से तुम बरी हो और जो कुछ तुम करते हो उसकी ज़िम्मेदारी से मैं बरी हूँ।"
42
और उनमें बहुत-से ऐसे लोग है जो तेरी ओर कान लगाते है। किन्तु क्या तू बहरों को सुनाएगा, चाहे वे समझ न रखते हों?
43
और कुछ उनमें ऐसे हैं, जो तेरी ओर ताकते हैं, किन्तु क्या तू अंधों का मार्ग दिखाएगा, चाहे उन्हें कुछ सूझता न हो?
44
अल्लाह तो लोगों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता, किन्तु लोग स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार करते है
45
जिस दिन वह उनको इकट्ठा करेगा तो ऐसा जान पड़ेगा जैसे वे दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे। वे परस्पर एक-दूसरे को पहचानेंगे। वे लोग घाटे में पड़ गए, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया और वे मार्ग न पा सके
46
जिस चीज़ का हम उनसे वादा करते है उसमें से कुछ चाहे तुझे दिखा दें या हम तुझे (इससे पहले) उठा लें, उन्हें तो हमारी ओर लौटकर आना ही है। फिर जो कुछ वे कर रहे है उसपर अल्लाह गवाह है
47
प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल है। फिर जब उनके पास उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाता है। उनपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाता
48
वे कहते है, "यदि तुम सच्चे हो तो यह वादा कब पूरा होगा?"
49
कहो, "मुझे अपने लिए न तो किसी हानि का अधिकार प्राप्त है और न लाभ का, बल्कि अल्लाह जो चाहता है वही होता है। हर समुदाय के लिए एक नियत समय है, जब उनका नियत समय आ जाता है तो वे न घड़ी भर पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है।"
50
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर उसकी यातना रातों रात या दिन को आ जाए तो (क्या तुम उसे टाल सकोगे?) वह आख़िर कौन-सी चीज़ होगी जिसके लिए अपराधियों को जल्दी पड़ी हुई है?
51
क्या फिर जब वह घटित हो जाएगी तब तुम उसे मानोगे? - क्या अब! इसी के लिए तो तुम जल्दी मचा रहे थे!"
52
"फिर अत्याचारी लोगों से कहा जाएगा, "स्थायी यातना का मज़ा चख़ो! जो कुछ तुम कमाते रहे हो, उसके सिवा तुम्हें और क्या बदला दिया जा सकता है?"
53
वे तुम से चाहते है कि उन्हें ख़बर दो कि "क्या वह वास्तव में सत्य है?" कह दो, "हाँ, मेरे रब की क़सम! वह बिल्कुल सत्य है और तुम क़ाबू से बाहर निकल जानेवाले नहीं हो।"
54
यदि प्रत्येक अत्याचारी व्यक्ति के पास वह सब कुछ हो जो धरती में है, तो वह अर्थदंड के रूप में उसे दे डाले। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन में पछताएँगे। उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार न होगा
55
सुन लो, जो कुछ आकाशों और धरती में है, अल्लाह ही का है। जान लो, निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है, किन्तु उनमें अधिकतर लोग जानते नहीं
56
वही जिलाता है और मारता है और उसी की ओर तुम लौटाए जा रहे हो
57
ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से उपदेश औऱ जो कुछ सीनों में (रोग) है, उसके लिए रोगमुक्ति और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता आ चुकी है
58
कह दो, "यह अल्लाह के अनुग्रह और उसकी दया से है, अतः इस पर प्रसन्न होना चाहिए। यह उन सब चीज़ों से उत्तम है, जिनको वे इकट्ठा करने में लगे हुए है।"
59
कह दो, "क्या तुम लोगों ने यह भी देखा कि जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हारे लिए उतारी है उसमें से तुमने स्वयं ही कुछ को हराम और हलाल ठहरा लिया?" कहो, "क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है या तुम अल्लाह पर झूठ घड़कर थोप रहे हो?"
60
जो लोग झूठ घड़कर उसे अल्लाह पर थोंपते है, उन्होंने क़ियामत के दिन के विषय में क्या समझ रखा है? अल्लाह तो लोगों के लिए बड़ा अनुग्रहवाला है, किन्तु उनमें अधिकतर कृतज्ञता नहीं दिखलाते
61
तुम जिस दशा में भी होते हो और क़ुरआन से जो कुछ भी पढ़ते हो और तुम लोग जो काम भी करते हो हम तुम्हें देख रहे होते है, जब तुम उसमें लगे होते हो। और तुम्हारे रब से कण भर भी कोई चीज़ छिपी नहीं है, न धरती में न आकाश में और न उससे छोटी और न बड़ी कोई त चीज़ ऐसी है जो एक स्पष्ट किताब में मौजूद न हो
62
सुन लो, अल्लाह के मित्रों को न तो कोई डर है और न वे शोकाकुल ही होंगे
63
ये वे लोग है जो ईमान लाए और डर कर रहे
64
उनके लिए सांसारिक जीवन में भी शुभ-सूचना है और आख़िरत में भी - अल्लाह के शब्द बदलते नहीं - यही बड़ी सफलता है
65
उनकी बात तुम्हें दुखी न करे, सारा प्रभुत्व अल्लाह ही के लिए है, वह सुनता, जानता है
66
जान रखो! जो कोई भी आकाशों में है और जो कोई धरती में है, अल्लाह ही का है। जो लोग अल्लाह को छोड़कर दूसरे साझीदारों को पुकारते है, वे आखिर किसका अनुसरण करते है? वे तो केवल अटकल पर चलते है और वे निरे अटकले दौड़ाते है
67
वही है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें चैन पाओ और दिन को प्रकाशमान बनाया (ताकि तुम उसमें दौड़-धूप कर सको); निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो सुनते है
68
वे कहते है, "अल्लाह औलाद रखता है।" महान और उच्च है वह! वह निरपेक्ष है, आकाशों और धरती में जो कुछ है उसी का है। तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं। क्या तुम अल्लाह से जोड़कर वह बाते कहते हो, जिसका तुम्हे ज्ञान नही?
69
कह दो, "जो लोग अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़ते है, वे सफल नहीं होते।"
70
यह तो सांसारिक सुख है। फिर हमारी ओर ही उन्हें लौटना है, फिर जो इनकार वे करते रहे होगे उसके बदले में हम उन्हें कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
71
उन्हें नूह का वृत्तान्त सुनाओ। जब उसने अपनी क़ौम से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मेरा खड़ा होना और अल्लाह की आयतों के द्वारा नसीहत करना तुम्हें भारी हो गया है तो मेरा भरोसा अल्लाह पर है। तु अपना मामला ठहरा लो और अपने ठहराए हुए साझीदारों को भी साथ ले लो, फिर तुम्हारा मामला तुम पर कुछ संदिग्ध न रहे; फिर मेरे साथ जो कुछ करना है, कर डालों और मुझे मुहलत न दो।"
72
फिर यदि तुम मुँह फेरोगे तो मैंने तुमसे कोई बदला नहीं माँगा। मेरा बदला (पारिश्रामिक) बस अल्लाह के ज़िम्मे है, और आदेश मुझे मुस्लिम (आज्ञाकारी) होने का हुआ है
73
किन्तु उन्होंने झूठला दिया, तो हमने उसे और उन लोगों को, जो उनके साथ नौका में थे, बचा लिया और उन्हें उतराधिकारी बनाया, और उन लोगो को डूबो दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था। अतः देख लो, जिन्हें सचेत किया गया था उनका क्या परिणाम हुआ!
74
फिर उसके बाद कितने ही रसूल हमने उनकी क़ौम की ओर भेजे और वे उनके पास स्पष्ट निशानियां लेकर आए, किन्तु वे ऐसे न थे कि जिसको पहले झुठला चुके हॊं, उसे मानते। इसी तरह अतिक्रमणकारियों कॆ दिलों पर हम मुहर लगा देते हैं
75
फिर उनके बाद हमने मूसा और हारून को अपनी आयतों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा। किन्तु उन्होंने घमंड किया, वे थे ही अपराधी लोग
76
अतः जब हमारी ओर से सत्य उनके सामने आया तो वे कहने लगे, "यह तो खुला जादू है।"
77
मूसा ने कहा, "क्या तुम सत्य के विषय में ऐसा कहते हो, जबकि यह तुम्हारे सामने आ गया है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो सफल नहीं हुआ करते।"
78
उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें उस चीज़ से फेर दे जिसपर हमने अपना बाप-दादा का पाया है और धरती में तुम दोनों की बड़ाई स्थापित हो जाए? हम तो तुम्हें माननेवाले नहीं।"
79
फ़िरऔन ने कहा, "हर कुशल जादूगर को मेरे पास लाओ।"
80
फिर जब जादूगर आ गए तो मूसा ने उनसे कहा, "जो कुछ तुम डालते हो, डालो।"
81
फिर जब उन्होंने डाला तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ लाए हो, जादू है। अल्लाह अभी उसे मटियामेट किए देता है। निस्संदेह अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवालों के कर्म को फलीभूत नहीं होने देता
82
"अल्लाह अपने शब्दों से सत्य को सत्य कर दिखाता है, चाहे अपराधी नापसन्द ही करें।"
83
फिर मूसा की बात उसकी क़ौम की संतति में से बस कुछ ही लोगों ने मानी; फ़िरऔन और उनके सरदारों के भय से कि कहीं उन्हें किसी फ़ितने में न डाल दें। फ़िरऔन था भी धरती में बहुत सिर उठाए हुए, औऱ निश्चय ही वह हद से आगे बढ़ गया था
84
मूसा ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो तो उसपर भरोसा करो, यदि तुम आज्ञाकारी हो।"
85
इसपर वे बोले, "हमने अल्लाह पर भरोसा किया। ऐ हमारे रब! तू हमें अत्याचारी लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल
86
"और अपनी दयालुता से हमें इनकार करनेवालों से छुटकारा दिया।"
87
हमने मूसा और उसके भाई की ओर प्रकाशना की कि "तुम दोनों अपने लोगों के लिए मिस्र में कुछ घर निश्चित कर लो औऱ अपने घरों को क़िबला बना लो। और नमाज़ क़ायम करो और ईमानवालों को शुभसूचना दे दो।"
88
मूसा ने कहा, "हमारे रब! तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को सांसारिक जीवन में शोभा-सामग्री और धन दिए है, हमारे रब, इसलिए कि वे तेरे मार्ग से भटकाएँ! हमारे रब, उनके धन नष्ट कर दे और उनके हृदय कठोर कर दे कि वे ईमान न लाएँ, ताकि वे दुखद यातना देख लें।"
89
कहा, "तुम दोनों की प्रार्थना स्वीकृत हो चुकी। अतः तुम दोनों जमें रहो और उन लोगों के मार्ग पर कदापि न चलना, जो जानते नहीं।"
90
और हमने इसराईलियों को समुद्र पार करा दिया। फिर फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने सरकशी और ज़्यादती के साथ उनका पीछा किया, यहाँ तक कि जब वह डूबने लगा तो पुकार उठा, "मैं ईमान ले आया कि उसके सिव कोई पूज्य-प्रभु नही, जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान लाई। अब मैं आज्ञाकारी हूँ।"
91
"क्या अब? हालाँकि इससे पहले तुने अवज्ञा की और बिगाड़ पैदा करनेवालों में से था
92
"अतः आज हम तेरे शरीर को बचा लेगें, ताकि तू अपने बादवालों के लिए एक निशानी हो जाए। निश्चय ही, बहुत-से लोग हमारी निशानियों के प्रति असावधान ही रहते है।"
93
और हमने इसराईल की सन्तान को अच्छा, सम्मानित ठिकाना दिया औ उन्हें अच्छी आजीविका प्रदान की। फिर उन्होंने उस समय विभेद किया, जबकि ज्ञान उनके पास आ चुका था। निश्चय ही तुम्हारा रब क़ियामत के दिन उनके बीच उस चीज़ का फ़ैसला कर देगा, जिसमें वे विभेद करते रहे है
94
अतः यदि तुम्हें उस चीज़ के बारे में कोई संदेह हो, जो हमने तुम्हारी ओर अवतरित की है, तो उनसे पूछ लो जो तुमसे पहले से किताब पढ़ रहे है। तुम्हारे पास तो तुम्हारे रब की ओर से सत्य आ चुका। अतः तुम कदापि सन्देह करनेवाले न हो
95
और न उन लोगों में सम्मिलित होना जिन्होंन अल्लाह की आयतों को झुठलाया, अन्यथा तुम घाटे में पड़कर रहोगे
96
निस्संदेह जिन लोगों के विषय में तुम्हारे रब की बात सच्ची होकर रही वे ईमान नहीं लाएँगे,
97
जब तक के वे दुखद यातना न देख लें, चाहे प्रत्येक निशानी उनके पास आ जाए
98
फिर ऐसी कोई बस्ती क्यों न हुई कि वह ईमान लाती और उसका ईमान उसके लिए लाभप्रद सिद्ध होता? हाँ, यूनुस की क़ौम के लोग इसके लिए अपवाद है। जब वे ईमान लाए तो हमने सांसारिक जीवन में अपमानजनक यातना को उनपर से टाल दिया और उन्हें एक अवधि तक सुखोपभोग का अवसर प्रदान किया
99
यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती में जितने लोग है वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ?
100
हालाँकि किसी व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं कि अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई क्यक्ति ईमान लाए। वह तो उन लोगों पर गन्दगी डाल देता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते
101
कहो, "देख लो, आकाशों और धरती में क्या कुछ है!" किन्तु निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के कुछ काम नहीं आती, जो ईमान न लाना चाहें
102
अतः वे तो उस तरह के दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिस तरह के दिन वे लोग देख चुके है जो उनसे पहले गुज़रे है। कह दो, "अच्छा, प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
103
फिर हम अपने रसूलों और उन लोगों को बचा लेते रहे हैं, जो ईमान ले आए। ऐसी ही हमारी रीति है, हमपर यह हक़ है कि ईमानवालों को बचा लें
104
कह दो, "ऐ लोगों! यदि तुम मेरे धर्म के विषय में किसी सन्देह में हो तो मैं तो उनकी बन्दगी नहीं करता जिनकी तुम अल्लाह से हटकर बन्दगी करते हो, बल्कि मैं उस अल्लाह की बन्दगी करता हूँ जो तुम्हें मृत्यु देता है। और मुझे आदेश है कि मैं ईमानवालों में से होऊँ
105
और यह कि हर ओर से एकाग्र होकर अपना रुख़ इस धर्म की ओर कर लो और मुशरिक़ों में कदापि सम्मिलित न हो,
106
और अल्लाह से हटकर उसे न पुकारो जो न तुम्हें लाभ पहुँचाए और न तुम्हें हानि पहुँचा सके और न तुम्हारा बुरा कर सके, क्योंकि यदि तुमने ऐसा किया तो उस समय तुम अत्याचारी होगे
107
यदि अल्लाह तुम्हें किसी तकलीफ़ में डाल दे तो उसके सिवा कोई उसे दूर करनेवाला नहीं। और यदि वह तुम्हारे लिए किसी भलाई का इरादा कर ले तो कोई उसके अनुग्रह को फेरनेवाला भी नहीं। वह इसे अपने बन्दों में से जिस तक चाहता है, पहुँचाता है और वह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
108
कह दो, "ऐ लोगों! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से सत्य आ चुका है। अब जो कोई मार्ग पर आएगा, तो वह अपने ही लिए मार्ग पर आएगा, और जो कोई पथभ्रष्ट होगा तो वह अपने ही बुरे के लिए पथभ्रष्टि होगा। मैं तुम्हारे ऊपर कोई हवालेदार तो हूँ नहीं।"
109
जो कुछ तुमपर प्रकाशना की जा रही है, उसका अनुसरण करो और धैर्य से काम लो, यहाँ तक कि अल्लाह फ़ैसला कर दे, और वह सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है
सूरह यूनुस अरबी
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
الٓرۚ تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡحَكِيمِ ﴿١﴾
أَكَانَ لِلنَّاسِ عَجَبًا أَنۡ أَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ رَجُلࣲ مِّنۡهُمۡ أَنۡ أَنذِرِ ٱلنَّاسَ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَنَّ لَهُمۡ قَدَمَ صِدۡقٍ عِندَ رَبِّهِمۡۗ قَالَ ٱلۡكَٰفِرُونَ إِنَّ هَٰذَا لَسَٰحِرࣱ مُّبِينٌ ﴿٢﴾
إِنَّ رَبَّكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامࣲ ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰ عَلَى ٱلۡعَرۡشِۖ يُدَبِّرُ ٱلۡأَمۡرَۖ مَا مِن شَفِيعٍ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ إِذۡنِهِۦۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمۡ فَٱعۡبُدُوهُۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴿٣﴾
إِلَيۡهِ مَرۡجِعُكُمۡ جَمِيعࣰاۖ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقًّاۚ إِنَّهُۥ يَبۡدَؤُاْ ٱلۡخَلۡقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ لِيَجۡزِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ بِٱلۡقِسۡطِۚ وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَهُمۡ شَرَابࣱ مِّنۡ حَمِيمࣲ وَعَذَابٌ أَلِيمُۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡفُرُونَ ﴿٤﴾
هُوَ ٱلَّذِي جَعَلَ ٱلشَّمۡسَ ضِيَآءࣰ وَٱلۡقَمَرَ نُورࣰا وَقَدَّرَهُۥ مَنَازِلَ لِتَعۡلَمُواْ عَدَدَ ٱلسِّنِينَ وَٱلۡحِسَابَۚ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ ذَٰلِكَ إِلَّا بِٱلۡحَقِّۚ يُفَصِّلُ ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمࣲ يَعۡلَمُونَ ﴿٥﴾
إِنَّ فِي ٱخۡتِلَٰفِ ٱلَّيۡلِ وَٱلنَّهَارِ وَمَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ لَأٓيَٰتࣲ لِّقَوۡمࣲ يَتَّقُونَ ﴿٦﴾
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ لِقَآءَنَا وَرَضُواْ بِٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَٱطۡمَأَنُّواْ بِهَا وَٱلَّذِينَ هُمۡ عَنۡ ءَايَٰتِنَا غَٰفِلُونَ ﴿٧﴾
أُوْلَٰٓئِكَ مَأۡوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ ﴿٨﴾
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ يَهۡدِيهِمۡ رَبُّهُم بِإِيمَٰنِهِمۡۖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهِمُ ٱلۡأَنۡهَٰرُ فِي جَنَّٰتِ ٱلنَّعِيمِ ﴿٩﴾
دَعۡوَىٰهُمۡ فِيهَا سُبۡحَٰنَكَ ٱللَّهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمۡ فِيهَا سَلَٰمࣱۚ وَءَاخِرُ دَعۡوَىٰهُمۡ أَنِ ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ﴿١٠﴾
۞ وَلَوۡ يُعَجِّلُ ٱللَّهُ لِلنَّاسِ ٱلشَّرَّ ٱسۡتِعۡجَالَهُم بِٱلۡخَيۡرِ لَقُضِيَ إِلَيۡهِمۡ أَجَلُهُمۡۖ فَنَذَرُ ٱلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ لِقَآءَنَا فِي طُغۡيَٰنِهِمۡ يَعۡمَهُونَ ﴿١١﴾
وَإِذَا مَسَّ ٱلۡإِنسَٰنَ ٱلضُّرُّ دَعَانَا لِجَنۢبِهِۦٓ أَوۡ قَاعِدًا أَوۡ قَآئِمࣰا فَلَمَّا كَشَفۡنَا عَنۡهُ ضُرَّهُۥ مَرَّ كَأَن لَّمۡ يَدۡعُنَآ إِلَىٰ ضُرࣲّ مَّسَّهُۥۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلۡمُسۡرِفِينَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ﴿١٢﴾
وَلَقَدۡ أَهۡلَكۡنَا ٱلۡقُرُونَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَمَّا ظَلَمُواْ وَجَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ وَمَا كَانُواْ لِيُؤۡمِنُواْۚ كَذَٰلِكَ نَجۡزِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡمُجۡرِمِينَ ﴿١٣﴾
ثُمَّ جَعَلۡنَٰكُمۡ خَلَٰٓئِفَ فِي ٱلۡأَرۡضِ مِنۢ بَعۡدِهِمۡ لِنَنظُرَ كَيۡفَ تَعۡمَلُونَ ﴿١٤﴾
وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡ ءَايَاتُنَا بَيِّنَٰتࣲ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرۡجُونَ لِقَآءَنَا ٱئۡتِ بِقُرۡءَانٍ غَيۡرِ هَٰذَآ أَوۡ بَدِّلۡهُۚ قُلۡ مَا يَكُونُ لِيٓ أَنۡ أُبَدِّلَهُۥ مِن تِلۡقَآيِٕ نَفۡسِيٓۖ إِنۡ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَيَّۖ إِنِّيٓ أَخَافُ إِنۡ عَصَيۡتُ رَبِّي عَذَابَ يَوۡمٍ عَظِيمࣲ ﴿١٥﴾
قُل لَّوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا تَلَوۡتُهُۥ عَلَيۡكُمۡ وَلَآ أَدۡرَىٰكُم بِهِۦۖ فَقَدۡ لَبِثۡتُ فِيكُمۡ عُمُرࣰا مِّن قَبۡلِهِۦٓۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ ﴿١٦﴾
فَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّنِ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوۡ كَذَّبَ بِـَٔايَٰتِهِۦٓۚ إِنَّهُۥ لَا يُفۡلِحُ ٱلۡمُجۡرِمُونَ ﴿١٧﴾
وَيَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمۡ وَلَا يَنفَعُهُمۡ وَيَقُولُونَ هَٰٓؤُلَآءِ شُفَعَٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِۚ قُلۡ أَتُنَبِّـُٔونَ ٱللَّهَ بِمَا لَا يَعۡلَمُ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَلَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ ﴿١٨﴾
وَمَا كَانَ ٱلنَّاسُ إِلَّآ أُمَّةࣰ وَٰحِدَةࣰ فَٱخۡتَلَفُواْۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةࣱ سَبَقَتۡ مِن رَّبِّكَ لَقُضِيَ بَيۡنَهُمۡ فِيمَا فِيهِ يَخۡتَلِفُونَ ﴿١٩﴾
وَيَقُولُونَ لَوۡلَآ أُنزِلَ عَلَيۡهِ ءَايَةࣱ مِّن رَّبِّهِۦۖ فَقُلۡ إِنَّمَا ٱلۡغَيۡبُ لِلَّهِ فَٱنتَظِرُوٓاْ إِنِّي مَعَكُم مِّنَ ٱلۡمُنتَظِرِينَ ﴿٢٠﴾
وَإِذَآ أَذَقۡنَا ٱلنَّاسَ رَحۡمَةࣰ مِّنۢ بَعۡدِ ضَرَّآءَ مَسَّتۡهُمۡ إِذَا لَهُم مَّكۡرࣱ فِيٓ ءَايَاتِنَاۚ قُلِ ٱللَّهُ أَسۡرَعُ مَكۡرًاۚ إِنَّ رُسُلَنَا يَكۡتُبُونَ مَا تَمۡكُرُونَ ﴿٢١﴾
هُوَ ٱلَّذِي يُسَيِّرُكُمۡ فِي ٱلۡبَرِّ وَٱلۡبَحۡرِۖ حَتَّىٰٓ إِذَا كُنتُمۡ فِي ٱلۡفُلۡكِ وَجَرَيۡنَ بِهِم بِرِيحࣲ طَيِّبَةࣲ وَفَرِحُواْ بِهَا جَآءَتۡهَا رِيحٌ عَاصِفࣱ وَجَآءَهُمُ ٱلۡمَوۡجُ مِن كُلِّ مَكَانࣲ وَظَنُّوٓاْ أَنَّهُمۡ أُحِيطَ بِهِمۡ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ لَئِنۡ أَنجَيۡتَنَا مِنۡ هَٰذِهِۦ لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلشَّٰكِرِينَ ﴿٢٢﴾
فَلَمَّآ أَنجَىٰهُمۡ إِذَا هُمۡ يَبۡغُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّۗ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّمَا بَغۡيُكُمۡ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمۖ مَّتَٰعَ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۖ ثُمَّ إِلَيۡنَا مَرۡجِعُكُمۡ فَنُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ﴿٢٣﴾
إِنَّمَا مَثَلُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا كَمَآءٍ أَنزَلۡنَٰهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ فَٱخۡتَلَطَ بِهِۦ نَبَاتُ ٱلۡأَرۡضِ مِمَّا يَأۡكُلُ ٱلنَّاسُ وَٱلۡأَنۡعَٰمُ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَخَذَتِ ٱلۡأَرۡضُ زُخۡرُفَهَا وَٱزَّيَّنَتۡ وَظَنَّ أَهۡلُهَآ أَنَّهُمۡ قَٰدِرُونَ عَلَيۡهَآ أَتَىٰهَآ أَمۡرُنَا لَيۡلًا أَوۡ نَهَارࣰا فَجَعَلۡنَٰهَا حَصِيدࣰا كَأَن لَّمۡ تَغۡنَ بِٱلۡأَمۡسِۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمࣲ يَتَفَكَّرُونَ ﴿٢٤﴾
وَٱللَّهُ يَدۡعُوٓاْ إِلَىٰ دَارِ ٱلسَّلَٰمِ وَيَهۡدِي مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطࣲ مُّسۡتَقِيمࣲ ﴿٢٥﴾
۞ لِّلَّذِينَ أَحۡسَنُواْ ٱلۡحُسۡنَىٰ وَزِيَادَةࣱۖ وَلَا يَرۡهَقُ وُجُوهَهُمۡ قَتَرࣱ وَلَا ذِلَّةٌۚ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَنَّةِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ﴿٢٦﴾
وَٱلَّذِينَ كَسَبُواْ ٱلسَّيِّـَٔاتِ جَزَآءُ سَيِّئَةِۭ بِمِثۡلِهَا وَتَرۡهَقُهُمۡ ذِلَّةࣱۖ مَّا لَهُم مِّنَ ٱللَّهِ مِنۡ عَاصِمࣲۖ كَأَنَّمَآ أُغۡشِيَتۡ وُجُوهُهُمۡ قِطَعࣰا مِّنَ ٱلَّيۡلِ مُظۡلِمًاۚ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ﴿٢٧﴾
وَيَوۡمَ نَحۡشُرُهُمۡ جَمِيعࣰا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشۡرَكُواْ مَكَانَكُمۡ أَنتُمۡ وَشُرَكَآؤُكُمۡۚ فَزَيَّلۡنَا بَيۡنَهُمۡۖ وَقَالَ شُرَكَآؤُهُم مَّا كُنتُمۡ إِيَّانَا تَعۡبُدُونَ ﴿٢٨﴾
فَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدَۢا بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمۡ إِن كُنَّا عَنۡ عِبَادَتِكُمۡ لَغَٰفِلِينَ ﴿٢٩﴾
هُنَالِكَ تَبۡلُواْ كُلُّ نَفۡسࣲ مَّآ أَسۡلَفَتۡۚ وَرُدُّوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ مَوۡلَىٰهُمُ ٱلۡحَقِّۖ وَضَلَّ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَفۡتَرُونَ ﴿٣٠﴾
قُلۡ مَن يَرۡزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ أَمَّن يَمۡلِكُ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡأَبۡصَٰرَ وَمَن يُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَيُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتَ مِنَ ٱلۡحَيِّ وَمَن يُدَبِّرُ ٱلۡأَمۡرَۚ فَسَيَقُولُونَ ٱللَّهُۚ فَقُلۡ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴿٣١﴾
فَذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمُ ٱلۡحَقُّۖ فَمَاذَا بَعۡدَ ٱلۡحَقِّ إِلَّا ٱلضَّلَٰلُۖ فَأَنَّىٰ تُصۡرَفُونَ ﴿٣٢﴾
كَذَٰلِكَ حَقَّتۡ كَلِمَتُ رَبِّكَ عَلَى ٱلَّذِينَ فَسَقُوٓاْ أَنَّهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ ﴿٣٣﴾
قُلۡ هَلۡ مِن شُرَكَآئِكُم مَّن يَبۡدَؤُاْ ٱلۡخَلۡقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥۚ قُلِ ٱللَّهُ يَبۡدَؤُاْ ٱلۡخَلۡقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥۖ فَأَنَّىٰ تُؤۡفَكُونَ ﴿٣٤﴾
قُلۡ هَلۡ مِن شُرَكَآئِكُم مَّن يَهۡدِيٓ إِلَى ٱلۡحَقِّۚ قُلِ ٱللَّهُ يَهۡدِي لِلۡحَقِّۗ أَفَمَن يَهۡدِيٓ إِلَى ٱلۡحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لَّا يَهِدِّيٓ إِلَّآ أَن يُهۡدَىٰۖ فَمَا لَكُمۡ كَيۡفَ تَحۡكُمُونَ ﴿٣٥﴾
وَمَا يَتَّبِعُ أَكۡثَرُهُمۡ إِلَّا ظَنًّاۚ إِنَّ ٱلظَّنَّ لَا يُغۡنِي مِنَ ٱلۡحَقِّ شَيۡـًٔاۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمُۢ بِمَا يَفۡعَلُونَ ﴿٣٦﴾
وَمَا كَانَ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانُ أَن يُفۡتَرَىٰ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَٰكِن تَصۡدِيقَ ٱلَّذِي بَيۡنَ يَدَيۡهِ وَتَفۡصِيلَ ٱلۡكِتَٰبِ لَا رَيۡبَ فِيهِ مِن رَّبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ﴿٣٧﴾
أَمۡ يَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰهُۖ قُلۡ فَأۡتُواْ بِسُورَةࣲ مِّثۡلِهِۦ وَٱدۡعُواْ مَنِ ٱسۡتَطَعۡتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ﴿٣٨﴾
بَلۡ كَذَّبُواْ بِمَا لَمۡ يُحِيطُواْ بِعِلۡمِهِۦ وَلَمَّا يَأۡتِهِمۡ تَأۡوِيلُهُۥۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۖ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلظَّٰلِمِينَ ﴿٣٩﴾
وَمِنۡهُم مَّن يُؤۡمِنُ بِهِۦ وَمِنۡهُم مَّن لَّا يُؤۡمِنُ بِهِۦۚ وَرَبُّكَ أَعۡلَمُ بِٱلۡمُفۡسِدِينَ ﴿٤٠﴾
وَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل لِّي عَمَلِي وَلَكُمۡ عَمَلُكُمۡۖ أَنتُم بَرِيٓـُٔونَ مِمَّآ أَعۡمَلُ وَأَنَا۠ بَرِيٓءࣱ مِّمَّا تَعۡمَلُونَ ﴿٤١﴾
وَمِنۡهُم مَّن يَسۡتَمِعُونَ إِلَيۡكَۚ أَفَأَنتَ تُسۡمِعُ ٱلصُّمَّ وَلَوۡ كَانُواْ لَا يَعۡقِلُونَ ﴿٤٢﴾
وَمِنۡهُم مَّن يَنظُرُ إِلَيۡكَۚ أَفَأَنتَ تَهۡدِي ٱلۡعُمۡيَ وَلَوۡ كَانُواْ لَا يُبۡصِرُونَ ﴿٤٣﴾
إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَظۡلِمُ ٱلنَّاسَ شَيۡـࣰٔا وَلَٰكِنَّ ٱلنَّاسَ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ﴿٤٤﴾
وَيَوۡمَ يَحۡشُرُهُمۡ كَأَن لَّمۡ يَلۡبَثُوٓاْ إِلَّا سَاعَةࣰ مِّنَ ٱلنَّهَارِ يَتَعَارَفُونَ بَيۡنَهُمۡۚ قَدۡ خَسِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بِلِقَآءِ ٱللَّهِ وَمَا كَانُواْ مُهۡتَدِينَ ﴿٤٥﴾
وَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعۡضَ ٱلَّذِي نَعِدُهُمۡ أَوۡ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيۡنَا مَرۡجِعُهُمۡ ثُمَّ ٱللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا يَفۡعَلُونَ ﴿٤٦﴾
وَلِكُلِّ أُمَّةࣲ رَّسُولࣱۖ فَإِذَا جَآءَ رَسُولُهُمۡ قُضِيَ بَيۡنَهُم بِٱلۡقِسۡطِ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ ﴿٤٧﴾
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا ٱلۡوَعۡدُ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ﴿٤٨﴾
قُل لَّآ أَمۡلِكُ لِنَفۡسِي ضَرࣰّا وَلَا نَفۡعًا إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُۗ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌۚ إِذَا جَآءَ أَجَلُهُمۡ فَلَا يَسۡتَـٔۡخِرُونَ سَاعَةࣰ وَلَا يَسۡتَقۡدِمُونَ ﴿٤٩﴾
قُلۡ أَرَءَيۡتُمۡ إِنۡ أَتَىٰكُمۡ عَذَابُهُۥ بَيَٰتًا أَوۡ نَهَارࣰا مَّاذَا يَسۡتَعۡجِلُ مِنۡهُ ٱلۡمُجۡرِمُونَ ﴿٥٠﴾
أَثُمَّ إِذَا مَا وَقَعَ ءَامَنتُم بِهِۦٓۚ ءَآلۡـَٰٔنَ وَقَدۡ كُنتُم بِهِۦ تَسۡتَعۡجِلُونَ ﴿٥١﴾
ثُمَّ قِيلَ لِلَّذِينَ ظَلَمُواْ ذُوقُواْ عَذَابَ ٱلۡخُلۡدِ هَلۡ تُجۡزَوۡنَ إِلَّا بِمَا كُنتُمۡ تَكۡسِبُونَ ﴿٥٢﴾
۞ وَيَسۡتَنۢبِـُٔونَكَ أَحَقٌّ هُوَۖ قُلۡ إِي وَرَبِّيٓ إِنَّهُۥ لَحَقࣱّۖ وَمَآ أَنتُم بِمُعۡجِزِينَ ﴿٥٣﴾
وَلَوۡ أَنَّ لِكُلِّ نَفۡسࣲ ظَلَمَتۡ مَا فِي ٱلۡأَرۡضِ لَٱفۡتَدَتۡ بِهِۦۗ وَأَسَرُّواْ ٱلنَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُاْ ٱلۡعَذَابَۖ وَقُضِيَ بَيۡنَهُم بِٱلۡقِسۡطِ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ ﴿٥٤﴾
أَلَآ إِنَّ لِلَّهِ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۗ أَلَآ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقࣱّ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ ﴿٥٥﴾
هُوَ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ ﴿٥٦﴾
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ قَدۡ جَآءَتۡكُم مَّوۡعِظَةࣱ مِّن رَّبِّكُمۡ وَشِفَآءࣱ لِّمَا فِي ٱلصُّدُورِ وَهُدࣰى وَرَحۡمَةࣱ لِّلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿٥٧﴾
قُلۡ بِفَضۡلِ ٱللَّهِ وَبِرَحۡمَتِهِۦ فَبِذَٰلِكَ فَلۡيَفۡرَحُواْ هُوَ خَيۡرࣱ مِّمَّا يَجۡمَعُونَ ﴿٥٨﴾
قُلۡ أَرَءَيۡتُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ لَكُم مِّن رِّزۡقࣲ فَجَعَلۡتُم مِّنۡهُ حَرَامࣰا وَحَلَٰلࣰا قُلۡ ءَآللَّهُ أَذِنَ لَكُمۡۖ أَمۡ عَلَى ٱللَّهِ تَفۡتَرُونَ ﴿٥٩﴾
وَمَا ظَنُّ ٱلَّذِينَ يَفۡتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضۡلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَشۡكُرُونَ ﴿٦٠﴾
وَمَا تَكُونُ فِي شَأۡنࣲ وَمَا تَتۡلُواْ مِنۡهُ مِن قُرۡءَانࣲ وَلَا تَعۡمَلُونَ مِنۡ عَمَلٍ إِلَّا كُنَّا عَلَيۡكُمۡ شُهُودًا إِذۡ تُفِيضُونَ فِيهِۚ وَمَا يَعۡزُبُ عَن رَّبِّكَ مِن مِّثۡقَالِ ذَرَّةࣲ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا فِي ٱلسَّمَآءِ وَلَآ أَصۡغَرَ مِن ذَٰلِكَ وَلَآ أَكۡبَرَ إِلَّا فِي كِتَٰبࣲ مُّبِينٍ ﴿٦١﴾
أَلَآ إِنَّ أَوۡلِيَآءَ ٱللَّهِ لَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ ﴿٦٢﴾
ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَكَانُواْ يَتَّقُونَ ﴿٦٣﴾
لَهُمُ ٱلۡبُشۡرَىٰ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِۚ لَا تَبۡدِيلَ لِكَلِمَٰتِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ﴿٦٤﴾
وَلَا يَحۡزُنكَ قَوۡلُهُمۡۘ إِنَّ ٱلۡعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًاۚ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ ﴿٦٥﴾
أَلَآ إِنَّ لِلَّهِ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَن فِي ٱلۡأَرۡضِۗ وَمَا يَتَّبِعُ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ شُرَكَآءَۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنۡ هُمۡ إِلَّا يَخۡرُصُونَ ﴿٦٦﴾
هُوَ ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيۡلَ لِتَسۡكُنُواْ فِيهِ وَٱلنَّهَارَ مُبۡصِرًاۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتࣲ لِّقَوۡمࣲ يَسۡمَعُونَ ﴿٦٧﴾
قَالُواْ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدࣰاۗ سُبۡحَٰنَهُۥۖ هُوَ ٱلۡغَنِيُّۖ لَهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ إِنۡ عِندَكُم مِّن سُلۡطَٰنِۭ بِهَٰذَآۚ أَتَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعۡلَمُونَ ﴿٦٨﴾
قُلۡ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَفۡتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ لَا يُفۡلِحُونَ ﴿٦٩﴾
مَتَٰعࣱ فِي ٱلدُّنۡيَا ثُمَّ إِلَيۡنَا مَرۡجِعُهُمۡ ثُمَّ نُذِيقُهُمُ ٱلۡعَذَابَ ٱلشَّدِيدَ بِمَا كَانُواْ يَكۡفُرُونَ ﴿٧٠﴾
۞ وَٱتۡلُ عَلَيۡهِمۡ نَبَأَ نُوحٍ إِذۡ قَالَ لِقَوۡمِهِۦ يَٰقَوۡمِ إِن كَانَ كَبُرَ عَلَيۡكُم مَّقَامِي وَتَذۡكِيرِي بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ فَعَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلۡتُ فَأَجۡمِعُوٓاْ أَمۡرَكُمۡ وَشُرَكَآءَكُمۡ ثُمَّ لَا يَكُنۡ أَمۡرُكُمۡ عَلَيۡكُمۡ غُمَّةࣰ ثُمَّ ٱقۡضُوٓاْ إِلَيَّ وَلَا تُنظِرُونِ ﴿٧١﴾
فَإِن تَوَلَّيۡتُمۡ فَمَا سَأَلۡتُكُم مِّنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِۖ وَأُمِرۡتُ أَنۡ أَكُونَ مِنَ ٱلۡمُسۡلِمِينَ ﴿٧٢﴾
فَكَذَّبُوهُ فَنَجَّيۡنَٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِي ٱلۡفُلۡكِ وَجَعَلۡنَٰهُمۡ خَلَٰٓئِفَ وَأَغۡرَقۡنَا ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَاۖ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُنذَرِينَ ﴿٧٣﴾
ثُمَّ بَعَثۡنَا مِنۢ بَعۡدِهِۦ رُسُلًا إِلَىٰ قَوۡمِهِمۡ فَجَآءُوهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَمَا كَانُواْ لِيُؤۡمِنُواْ بِمَا كَذَّبُواْ بِهِۦ مِن قَبۡلُۚ كَذَٰلِكَ نَطۡبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلۡمُعۡتَدِينَ ﴿٧٤﴾
ثُمَّ بَعَثۡنَا مِنۢ بَعۡدِهِم مُّوسَىٰ وَهَٰرُونَ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ وَمَلَإِيْهِۦ بِـَٔايَٰتِنَا فَٱسۡتَكۡبَرُواْ وَكَانُواْ قَوۡمࣰا مُّجۡرِمِينَ ﴿٧٥﴾
فَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلۡحَقُّ مِنۡ عِندِنَا قَالُوٓاْ إِنَّ هَٰذَا لَسِحۡرࣱ مُّبِينࣱ ﴿٧٦﴾
قَالَ مُوسَىٰٓ أَتَقُولُونَ لِلۡحَقِّ لَمَّا جَآءَكُمۡۖ أَسِحۡرٌ هَٰذَا وَلَا يُفۡلِحُ ٱلسَّٰحِرُونَ ﴿٧٧﴾
قَالُوٓاْ أَجِئۡتَنَا لِتَلۡفِتَنَا عَمَّا وَجَدۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَا وَتَكُونَ لَكُمَا ٱلۡكِبۡرِيَآءُ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَمَا نَحۡنُ لَكُمَا بِمُؤۡمِنِينَ ﴿٧٨﴾
وَقَالَ فِرۡعَوۡنُ ٱئۡتُونِي بِكُلِّ سَٰحِرٍ عَلِيمࣲ ﴿٧٩﴾
فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلۡقُواْ مَآ أَنتُم مُّلۡقُونَ ﴿٨٠﴾
فَلَمَّآ أَلۡقَوۡاْ قَالَ مُوسَىٰ مَا جِئۡتُم بِهِ ٱلسِّحۡرُۖ إِنَّ ٱللَّهَ سَيُبۡطِلُهُۥٓ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُصۡلِحُ عَمَلَ ٱلۡمُفۡسِدِينَ ﴿٨١﴾
وَيُحِقُّ ٱللَّهُ ٱلۡحَقَّ بِكَلِمَٰتِهِۦ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡمُجۡرِمُونَ ﴿٨٢﴾
فَمَآ ءَامَنَ لِمُوسَىٰٓ إِلَّا ذُرِّيَّةࣱ مِّن قَوۡمِهِۦ عَلَىٰ خَوۡفࣲ مِّن فِرۡعَوۡنَ وَمَلَإِيْهِمۡ أَن يَفۡتِنَهُمۡۚ وَإِنَّ فِرۡعَوۡنَ لَعَالࣲ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَإِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلۡمُسۡرِفِينَ ﴿٨٣﴾
وَقَالَ مُوسَىٰ يَٰقَوۡمِ إِن كُنتُمۡ ءَامَنتُم بِٱللَّهِ فَعَلَيۡهِ تَوَكَّلُوٓاْ إِن كُنتُم مُّسۡلِمِينَ ﴿٨٤﴾
فَقَالُواْ عَلَى ٱللَّهِ تَوَكَّلۡنَا رَبَّنَا لَا تَجۡعَلۡنَا فِتۡنَةࣰ لِّلۡقَوۡمِ ٱلظَّٰلِمِينَ ﴿٨٥﴾
وَنَجِّنَا بِرَحۡمَتِكَ مِنَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿٨٦﴾
وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰ وَأَخِيهِ أَن تَبَوَّءَا لِقَوۡمِكُمَا بِمِصۡرَ بُيُوتࣰا وَٱجۡعَلُواْ بُيُوتَكُمۡ قِبۡلَةࣰ وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَۗ وَبَشِّرِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿٨٧﴾
وَقَالَ مُوسَىٰ رَبَّنَآ إِنَّكَ ءَاتَيۡتَ فِرۡعَوۡنَ وَمَلَأَهُۥ زِينَةࣰ وَأَمۡوَٰلࣰا فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا رَبَّنَا لِيُضِلُّواْ عَن سَبِيلِكَۖ رَبَّنَا ٱطۡمِسۡ عَلَىٰٓ أَمۡوَٰلِهِمۡ وَٱشۡدُدۡ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَلَا يُؤۡمِنُواْ حَتَّىٰ يَرَوُاْ ٱلۡعَذَابَ ٱلۡأَلِيمَ ﴿٨٨﴾
قَالَ قَدۡ أُجِيبَت دَّعۡوَتُكُمَا فَٱسۡتَقِيمَا وَلَا تَتَّبِعَآنِّ سَبِيلَ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡلَمُونَ ﴿٨٩﴾
۞ وَجَٰوَزۡنَا بِبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٱلۡبَحۡرَ فَأَتۡبَعَهُمۡ فِرۡعَوۡنُ وَجُنُودُهُۥ بَغۡيࣰا وَعَدۡوًاۖ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَدۡرَكَهُ ٱلۡغَرَقُ قَالَ ءَامَنتُ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا ٱلَّذِيٓ ءَامَنَتۡ بِهِۦ بَنُوٓاْ إِسۡرَٰٓءِيلَ وَأَنَا۠ مِنَ ٱلۡمُسۡلِمِينَ ﴿٩٠﴾
ءَآلۡـَٰٔنَ وَقَدۡ عَصَيۡتَ قَبۡلُ وَكُنتَ مِنَ ٱلۡمُفۡسِدِينَ ﴿٩١﴾
فَٱلۡيَوۡمَ نُنَجِّيكَ بِبَدَنِكَ لِتَكُونَ لِمَنۡ خَلۡفَكَ ءَايَةࣰۚ وَإِنَّ كَثِيرࣰا مِّنَ ٱلنَّاسِ عَنۡ ءَايَٰتِنَا لَغَٰفِلُونَ ﴿٩٢﴾
وَلَقَدۡ بَوَّأۡنَا بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ مُبَوَّأَ صِدۡقࣲ وَرَزَقۡنَٰهُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَٰتِ فَمَا ٱخۡتَلَفُواْ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلۡعِلۡمُۚ إِنَّ رَبَّكَ يَقۡضِي بَيۡنَهُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ فِيمَا كَانُواْ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَ ﴿٩٣﴾
فَإِن كُنتَ فِي شَكࣲّ مِّمَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ فَسۡـَٔلِ ٱلَّذِينَ يَقۡرَءُونَ ٱلۡكِتَٰبَ مِن قَبۡلِكَۚ لَقَدۡ جَآءَكَ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُمۡتَرِينَ ﴿٩٤﴾
وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ فَتَكُونَ مِنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ ﴿٩٥﴾
إِنَّ ٱلَّذِينَ حَقَّتۡ عَلَيۡهِمۡ كَلِمَتُ رَبِّكَ لَا يُؤۡمِنُونَ ﴿٩٦﴾
وَلَوۡ جَآءَتۡهُمۡ كُلُّ ءَايَةٍ حَتَّىٰ يَرَوُاْ ٱلۡعَذَابَ ٱلۡأَلِيمَ ﴿٩٧﴾
فَلَوۡلَا كَانَتۡ قَرۡيَةٌ ءَامَنَتۡ فَنَفَعَهَآ إِيمَٰنُهَآ إِلَّا قَوۡمَ يُونُسَ لَمَّآ ءَامَنُواْ كَشَفۡنَا عَنۡهُمۡ عَذَابَ ٱلۡخِزۡيِ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَمَتَّعۡنَٰهُمۡ إِلَىٰ حِينࣲ ﴿٩٨﴾
وَلَوۡ شَآءَ رَبُّكَ لَأٓمَنَ مَن فِي ٱلۡأَرۡضِ كُلُّهُمۡ جَمِيعًاۚ أَفَأَنتَ تُكۡرِهُ ٱلنَّاسَ حَتَّىٰ يَكُونُواْ مُؤۡمِنِينَ ﴿٩٩﴾
وَمَا كَانَ لِنَفۡسٍ أَن تُؤۡمِنَ إِلَّا بِإِذۡنِ ٱللَّهِۚ وَيَجۡعَلُ ٱلرِّجۡسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَعۡقِلُونَ ﴿١٠٠﴾
قُلِ ٱنظُرُواْ مَاذَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَمَا تُغۡنِي ٱلۡأٓيَٰتُ وَٱلنُّذُرُ عَن قَوۡمࣲ لَّا يُؤۡمِنُونَ ﴿١٠١﴾
فَهَلۡ يَنتَظِرُونَ إِلَّا مِثۡلَ أَيَّامِ ٱلَّذِينَ خَلَوۡاْ مِن قَبۡلِهِمۡۚ قُلۡ فَٱنتَظِرُوٓاْ إِنِّي مَعَكُم مِّنَ ٱلۡمُنتَظِرِينَ ﴿١٠٢﴾
ثُمَّ نُنَجِّي رُسُلَنَا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْۚ كَذَٰلِكَ حَقًّا عَلَيۡنَا نُنجِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿١٠٣﴾
قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِن كُنتُمۡ فِي شَكࣲّ مِّن دِينِي فَلَآ أَعۡبُدُ ٱلَّذِينَ تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَٰكِنۡ أَعۡبُدُ ٱللَّهَ ٱلَّذِي يَتَوَفَّىٰكُمۡۖ وَأُمِرۡتُ أَنۡ أَكُونَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿١٠٤﴾
وَأَنۡ أَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفࣰا وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ﴿١٠٥﴾
وَلَا تَدۡعُ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكَ وَلَا يَضُرُّكَۖ فَإِن فَعَلۡتَ فَإِنَّكَ إِذࣰا مِّنَ ٱلظَّٰلِمِينَ ﴿١٠٦﴾
وَإِن يَمۡسَسۡكَ ٱللَّهُ بِضُرࣲّ فَلَا كَاشِفَ لَهُۥٓ إِلَّا هُوَۖ وَإِن يُرِدۡكَ بِخَيۡرࣲ فَلَا رَآدَّ لِفَضۡلِهِۦۚ يُصِيبُ بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦۚ وَهُوَ ٱلۡغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ﴿١٠٧﴾
قُلۡ يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ قَدۡ جَآءَكُمُ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّكُمۡۖ فَمَنِ ٱهۡتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهۡتَدِي لِنَفۡسِهِۦۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيۡهَاۖ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيۡكُم بِوَكِيلࣲ ﴿١٠٨﴾
وَٱتَّبِعۡ مَا يُوحَىٰٓ إِلَيۡكَ وَٱصۡبِرۡ حَتَّىٰ يَحۡكُمَ ٱللَّهُۚ وَهُوَ خَيۡرُ ٱلۡحَٰكِمِينَ ﴿١٠٩﴾