Surah At Tawbah in Hindi उच्चारण, अरबी टेक्स्ट और हिंदी अर्थ  | सूरह अत-तौबा हिंदी

12 Oct, 2026

Surah At Tawbah in Hindi उच्चारण, अरबी टेक्स्ट और हिंदी अर्थ | सूरह अत-तौबा हिंदी

सूरह अत-तौबा हिंदी में: उच्चारण, अरबी और हिंदी अर्थ (Surah At-Tawbah in Hindi)
सूरह अत-तौबा पवित्र कुरआन की नौवीं सूरह है, जिसमें कुल 129 आयतें हैं। इस पेज पर आपको सूरह अत-तौबा का अरबी पाठ, हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ आयत-दर-आयत पढ़ने को मिलेगा। इसका उद्देश्य पाठकों को अरबी आयतों के साथ हिंदी उच्चारण पढ़ने और उनके अर्थ को समझने में सहायता देना है।

यदि आप Surah At-Tawbah Hindi, सूरह अत-तौबा का हिंदी अर्थ या सूरह तौबा का अरबी पाठ खोज रहे हैं, तो यहां सभी 129 आयतों को क्रमवार देख सकते हैं। प्रत्येक आयत के अरबी पाठ, हिंदी उच्चारण और हिंदी अर्थ को साथ पढ़कर आप इस सूरह के संदेश को बेहतर ढंग से समझने का प्रयास कर सकते हैं।

ध्यान दें: हिंदी उच्चारण अरबी शब्दों को पढ़ने में सहायता करता है, लेकिन यह अरबी तिलावत का विकल्प नहीं है। सही उच्चारण और तजवीद सीखने के लिए अरबी पाठ के साथ किसी योग्य कारी की तिलावत भी सुनें।

पवित्र कुरआन की ९वीं सूरह, सूरह अत-तौबा (Surah At-Tawbah) का इस्लाम में एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह सूरह मदीना मुनव्वरा में नाज़िल हुई (मदनी सूरह) और इसमें कुल १२९ आयतें हैं। सूरह अत-तौबा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कुरआन की एकमात्र ऐसी सूरह है जिसके शुरू में 'बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम' नहीं पढ़ा जाता।

यदि आप सूरह अत-तौबा को सही और स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए बेहद मददगार साबित होगा। यहाँ हमने सूरह अत-तौबा का अरबी टेक्स्ट, हिंदी उच्चारण (Hindi Transliteration) और हिंदी अनुवाद (Hindi Meaning) एक ही स्थान पर सरल भाषा में प्रस्तुत किया है।

इस पोस्ट की मदद से आप न केवल सूरह अत-तौबा का पाठ आसानी से कर सकेंगे, बल्कि इसके अर्थ और संदेशों को गहराई से समझ भी सकेंगे। आइए, सूरह अत-तौबा का अध्ययन शुरू करें।

At-Tawbah · अत-तौबा

सूरह अत तौबा हिंदी उच्चारण 


1

बरा'अतुम्-मिनल्लाहि व रसूलिही इलल्-लज़ीन आहद्त्तुम्-मिनल्-मुश्रिकीन्

2

फ़सीहू फ़िल्-अर्दि अर्ब'अत अश्हुरिव्-व'अलमू अन्नकुम् ग़ैरु मु'जिज़िल्लाहि व अन्नल्लाह मुख़्ज़िल्-काफ़िरीन्

3

व अज़ानुम्-मिनल्लाहि व रसूलिही इलन्-नासि यौमल्-हज्जिल्-अक्बरि अन्नल्लाह बरी'उम्-मिनल्-मुश्रिकीन व रसूलुहू फ़इन् तुब्तुम् फ़हुव ख़ैरुल्-लकुम् व इन् तवल्लैतुम् फ़'अलमू अन्नकुम् ग़ैरु मु'जिज़िल्लाहि व बश्शिरिल्-लज़ीन कफ़रू बि'अज़ाबिन् अलीम्

4

इल्लल्-लज़ीन आहद्त्तुम्-मिनल्-मुश्रिकीन सुम्म लम् यन्क़ुसूकुम् शैअव्-व लम् युज़ाहिरू अलैकुम् अहदन् फ़अतिम्मू इलैहिम् अह्दहुम् इला मुद्दतिहिम् इन्नल्लाह युहिब्बुल्-मुत्तक़ीन्

5

फ़इज़न्सलख़ल्-अश्हुरुल्-हुरुमु फ़क़्तुलुल्-मुश्रिकीन हैसु वजद्त्तुमूहुम् व ख़ुज़ूहुम् वह्सुरूहुम् वक़्'उदू लहुम् कुल्ल मर्सदिन् फ़इन् ताबू व अक़ामुस्-सलात व आतवुज़्-ज़कात फ़ख़ल्लू सबीलहुम् इन्नल्लाह ग़फ़ूरुर्-रहीम्

6

व इन् अहदुम्-मिनल्-मुश्रिकीनिस्-तजारक फ़अजिर्हु हत्ता यस्म'अ कलामल्लाहि सुम्म अब्लिग़्हु मअमनहू ज़ालिक बिअन्नहुम् क़ौमुल्-ला य'अलमून्

7

कैफ़ यकूनु लिल्-मुश्रिकीन अह्दुन् इन्दल्लाहि व इन्द रसूलिही इल्लल्-लज़ीन आहद्त्तुम् इन्दल्-मस्जिदिल्-हरामि फ़मस्तक़ामू लकुम् फ़स्तक़ीमू लहुम् इन्नल्लाह युहिब्बुल्-मुत्तक़ीन्

8

कैफ़ व इय्-यज़्हरू अलैकुम् ला यर्क़ुबू फ़ीकुम् इल्लव्-व ला ज़िम्मतन् युर्दूनकुम् बिअफ़्वाहिहिम् व ता'बा क़ुलूबुहुम् व अक्सरुहुम् फ़ासिक़ून्

9

इश्तरौ बिआयातिल्लाहि समनन् क़लीलन् फ़सद्दू अन् सबीलिही इन्नहुम् साअ मा कानू य'अमलून्

10

ला यर्क़ुबून फ़ी मु'मिनिन् इल्लव्-व ला ज़िम्मतन् व उलाइक हुमुल्-मु'तदून्

11

फ़इन् ताबू व अक़ामुस्-सलात व आतवुज़्-ज़कात फ़इख़्वानुकुम् फ़िद्-दीनि व नुफ़स्सिलुल्-आयाति लिक़ौमिय्-य'अलमून्

12

व इन्-नकसू ऐमानहुम्-मिम्-बा'दि अह्दिहिम् व त'अनू फ़ी दीनिकुम् फ़क़ातिलू अइम्मतल्-कुफ़्रि इन्नहुम् ला ऐमान लहुम् ल'अल्लहुम् यन्तहून्

13

अला तुक़ातिलून क़ौमन्-नकसू ऐमानहुम् व हम्मू बिइख़्राजिर्-रसूलि व हुम् बदउकुम् अव्वल मर्रतिन् अतख़्शौनहुम् फ़ल्लाहु अहक़्क़ु अन् तख़्शौहु इन् कुन्तुम्-मु'मिनीन्

14

क़ातिलूहुम् यु'अज़्ज़िब्हुमुल्लाहु बिऐदीकुम् व युख़्ज़िहिम् व यन्सुर्कुम् अलैहिम् व यश्फ़ि सुदूर क़ौमिम्-मु'मिनीन्

15

व युज़्हिब् ग़ैज़ क़ुलूबिहिम् व यतूबुल्लाहु अला मय्-यशाउ वल्लाहु अलीमुन् हकीम्

16

अम् हसिब्तुम् अन् तुत्रकू व लम्मा य'अलमिल्लाहुल्-लज़ीन जाहदू मिन्कुम् व लम् यत्तख़िज़ू मिन् दूनिल्लाहि व ला रसूलिही व लल्-मु'मिनीन वलीजतन् वल्लाहु ख़बीरुम्-बिमा त'अमलून्

17

मा कान लिल्-मुश्रिकीन अय्-य'अमुरू मसाजिदल्लाहि शाहिदीन अला अन्फ़ुसिहिम् बिल्-कुफ़्रि उलाइक हबितत् आ'मालुहुम् व फ़िन्-नारि हुम् ख़ालिदून्

18

इन्नमा य'अमुरु मसाजिदल्लाहि मन् आमन बिल्लाहि वल्-यौमिल्-आख़िरि व अक़ामस्-सलात व आतज़्-ज़कात व लम् यख़्श इल्लल्लाह फ़'असा उलाइक अय्-यकूनू मिनल्-मुह्तदीन्

19

अज'अल्तुम् सिक़ायतल्-हाज्जि व इमारतल्-मस्जिदिल्-हरामि कमन् आमन बिल्लाहि वल्-यौमिल्-आख़िरि व जाहद फ़ी सबीलिल्लाहि ला यस्तवून इन्दल्लाहि वल्लाहु ला यह्दिल्-क़ौमज़्-ज़ालिमीन्

20

अल्लज़ीन आमनू व हाजरू व जाहदू फ़ी सबीलिल्लाहि बिअम्वालिहिम् व अन्फ़ुसिहिम् आ'ज़मु दरजतन् इन्दल्लाहि व उलाइक हुमुल्-फ़ाइज़ून्

21

युबश्शिरुहुम् रब्बुहुम्-बिरह्मतिम्-मिन्हु व रिज़्वानिव्-व जन्नातिल्-लहुम् फ़ीहा न'ईमुम्-मुक़ीम्

22

ख़ालिदीन फ़ीहा अबदन् इन्नल्लाह इन्दहू अज्रुन् अज़ीम्

23

या अय्युहल्लज़ीन आमनू ला तत्तख़िज़ू आबाअकुम् व इख़्वानकुम् औलिया'अ इनिस्-तहब्बुल्-कुफ़्र अलल्-ईमानि व मय्-यतवल्लहुम्-मिन्कुम् फ़उलाइक हुमुज़्-ज़ालिमून्

24

क़ुल् इन् कान आबाउकुम् व अब्नाउकुम् व इख़्वानुकुम् व अज़्वाजुकुम् व अशीरतुकुम् व अम्वालुनिक़्-तरफ़्तुमूहा व तिजारतुन् तख़्शौन कसादहा व मसाकिनु तर्दौनहा अहब्ब इलैकुम्-मिनल्लाहि व रसूलिही व जिहादिन् फ़ी सबीलिही फ़तरब्बसू हत्ता यअतियल्लाहु बिअम्रिही वल्लाहु ला यह्दिल्-क़ौमल्-फ़ासिक़ीन्

25

लक़द् नसरकुमुल्लाहु फ़ी मवातिन कसीरतिव्-व यौम हुनैनिन् इज़ आ'जबत्कुम् कस्रतुकुम् फ़लम् तुग़्नि अन्कुम् शैअव्-व दाक़त् अलैकुमुल्-अर्दु बिमा रहुबत् सुम्म वल्लैतुम्-मुद्बिरीन्

26

सुम्म अन्ज़लल्लाहु सकीनतहू अला रसूलिही व अलल्-मु'मिनीन व अन्ज़ल जुनूदल्-लम् तरौहा व अज़्ज़बल्-लज़ीन कफ़रू व ज़ालिक जज़ाउल्-काफ़िरीन्

27

सुम्म यतूबुल्लाहु मिम्-बा'दि ज़ालिक अला मय्-यशाउ वल्लाहु ग़फ़ूरुर्-रहीम्

28

या अय्युहल्लज़ीन आमनू इन्नमल्-मुश्रिकून नजसुन् फ़ला यक़्रबुल्-मस्जिदल्-हराम बा'द आमिहिम् हाज़ा व इन् ख़िफ़्तुम् ऐलतन् फ़सौफ़ युग़्नीकुमुल्लाहु मिन् फ़द्लिही इन् शाअ इन्नल्लाह अलीमुन् हकीम्

29

क़ातिलुल्-लज़ीन ला यु'मिनून बिल्लाहि व ला बिल्-यौमिल्-आख़िरि व ला युहर्रिमून मा हर्रमल्लाहु व रसूलुहू व ला यदीनून दीनल्-हक़्क़ि मिनल्-लज़ीन ऊतुल्-किताब हत्ता यु'तुल्-जिज़्यत अय्-यदिव्-व हुम् साग़िरून्

30

व क़ालतिल्-यहूदु उज़ैरुनिब्-नुल्लाहि व क़ालतिन्-नसारल्-मसीहुब्-नुल्लाहि ज़ालिक क़ौलुहुम् बिअफ़्वाहिहिम् युदाहि'ऊन क़ौलल्-लज़ीन कफ़रू मिन् क़ब्लु क़ातलहुमुल्लाहु अन्ना यु'फ़कून्

31

इत्तख़ज़ू अह्बारहुम् व रुह्बानहुम् अर्बाबम्-मिन् दूनिल्लाहि वल्-मसीहब्-न मर्यम व मा उमिरू इल्ला लिया'बुदू इलाहव्-वाहिदल्-ला इलाह इल्ला हुव सुब्हानहू अम्मा युश्रिकून्

32

युरीदून अय्-युत्फ़ि'ऊ नूरल्लाहि बिअफ़्वाहिहिम् व या'बल्लाहु इल्ला अय्-युतिम्म नूरहू व लौ करिहल्-काफ़िरून्

33

हुवल्लज़ी अर्सल रसूलहू बिल्-हुदा व दीनिल्-हक़्क़ि लियुज़्हिरहू अलद्-दीनि कुल्लिही व लौ करिहल्-मुश्रिकून्

34

या अय्युहल्लज़ीन आमनू इन्न कसीरम्-मिनल्-अह्बारि वर्-रुह्बानि लया'कुलून अम्वालन्-नासि बिल्-बातिलि व यसुद्दून अन् सबीलिल्लाहि वल्लज़ीन यक्निज़ूनज़्-ज़हब वल्-फ़िद्दत व ला युन्फ़िक़ूनहा फ़ी सबीलिल्लाहि फ़बश्शिर्हुम्-बि'अज़ाबिन् अलीम्

35

यौम युह्मा अलैहा फ़ी नारि जहन्नम फ़तुक्वा बिहा जिबाहुहुम् व जुनूबुहुम् व ज़ुहूरुहुम् हाज़ा मा कनज़्तुम् लिअन्फ़ुसिकुम् फ़ज़ूक़ू मा कुन्तुम् तक्निज़ून्

36

इन्न इद्दतश्-शुहूरि इन्दल्लाहित्-ना अशर शह्रन् फ़ी किताबिल्लाहि यौम ख़लक़स्-समावाति वल्-अर्द मिन्हा अर्ब'अतुन् हुरुमुन् ज़ालिकद्-दीनुल्-क़य्यिमु फ़ला तज़्लिमू फ़ीहिन्न अन्फ़ुसकुम् व क़ातिलुल्-मुश्रिकीन काफ़्फ़तन् कमा युक़ातिलूनकुम् काफ़्फ़तन् व'अलमू अन्नल्लाह म'अल्-मुत्तक़ीन्

37

इन्नमन्-नसीउ ज़ियादतुन् फ़िल्-कुफ़्रि युदल्लु बिहिल्-लज़ीन कफ़रू युहिल्लूनहू आमव्-व युहर्रिमूनहू आमल्-लियुवाति'ऊ इद्दत मा हर्रमल्लाहु फ़युहिल्लू मा हर्रमल्लाहु ज़ुय्यिन लहुम् सूउ आ'मालिहिम् वल्लाहु ला यह्दिल्-क़ौमल्-काफ़िरीन्

38

या अय्युहल्लज़ीन आमनू मा लकुम् इज़ा क़ील लकुमुन्-फ़िरू फ़ी सबीलिल्लाहित्-साक़ल्तुम् इलल्-अर्दि अरदीतुम् बिल्-हयातिद्-दुन्या मिनल्-आख़िरति फ़मा मता'उल्-हयातिद्-दुन्या फ़िल्-आख़िरति इल्ला क़लील्

39

इल्ला तन्फ़िरू यु'अज़्ज़िब्कुम् अज़ाबन् अलीमव्-व यस्तब्दिल् क़ौमन् ग़ैरकुम् व ला तदुर्रूहु शैअव्-वल्लाहु अला कुल्लि शैइन् क़दीर्

40

इल्ला तन्सुरूहु फ़क़द् नसरहुल्लाहु इज़ अख़्रजहुल्-लज़ीन कफ़रू सानियस्-नैनि इज़ हुमा फ़िल्-ग़ारि इज़ यक़ूलु लिसाहिबिही ला तह्ज़न् इन्नल्लाह म'अना फ़अन्ज़लल्लाहु सकीनतहू अलैहि व अय्यदहू बिजुनूदिल्-लम् तरौहा व ज'अल कलिमतल्-लज़ीन कफ़रुस्-सुफ़्ला व कलिमतुल्लाहि हियल्-उल्या वल्लाहु अज़ीज़ुन् हकीम्

41

इन्फ़िरू ख़िफ़ाफ़व्-व सिक़ालव्-व जाहिदू बिअम्वालिकुम् व अन्फ़ुसिकुम् फ़ी सबीलिल्लाहि ज़ालिकुम् ख़ैरुल्-लकुम् इन् कुन्तुम् त'अलमून्

42

लौ कान अरदन् क़रीबव्-व सफ़रन् क़ासिदल्-लत्तब'ऊक व लाकिम्-ब'उदत् अलैहिमुश्-शुक़्क़तु व सयह्लिफ़ून बिल्लाहि लविस्-तत'अन्ना लख़रज्ना म'अकुम् युह्लिकून अन्फ़ुसहुम् वल्लाहु य'अलमु इन्नहुम् लकाज़िबून्

43

अफ़ल्लाहु अन्क लिम अज़िन्त लहुम् हत्ता यतबय्यन लकल्-लज़ीन सदक़ू व त'अलमल्-काज़िबीन्

44

ला यस्ता'ज़िनुकल्-लज़ीन यु'मिनून बिल्लाहि वल्-यौमिल्-आख़िरि अय्-युजाहिदू बिअम्वालिहिम् व अन्फ़ुसिहिम् वल्लाहु अलीमुम्-बिल्-मुत्तक़ीन्

45

इन्नमा यस्ता'ज़िनुकल्-लज़ीन ला यु'मिनून बिल्लाहि वल्-यौमिल्-आख़िरि वर्ताबत् क़ुलूबुहुम् फ़हुम् फ़ी रैबिहिम् यतरद्ददून्

46

व लौ अरादुल्-ख़ुरूज लअ'अद्दू लहू उद्दतव्-व लाकिन् करिहल्लाहु इन्बि'आथहुम् फ़सब्बतहुम् व क़ील अक़्'उदू म'अल्-क़ा'इदीन्

47

लौ ख़रजू फ़ीकुम्-मा ज़ादूकुम् इल्ला ख़बालव्-व लअव्दा'ऊ ख़िलालकुम् यब्ग़ूनकुमुल्-फ़ित्नत व फ़ीकुम् सम्मा'ऊन लहुम् वल्लाहु अलीमुम्-बिज़्-ज़ालिमीन्

48

लक़दिब्-तग़वुल्-फ़ित्नत मिन् क़ब्लु व क़ल्लबू लकल्-उमूर हत्ता जाअल्-हक़्क़ु व ज़हर अम्रुल्लाहि व हुम् कारिहून्

49

व मिन्हुम्-मय्-यक़ूलु इ'ज़न ली व ला तफ़्तिन्नी अला फ़िल्-फ़ित्नति सक़तू व इन्न जहन्नम लमुहीततुम्-बिल्-काफ़िरीन्

50

इन् तुसिब्क हसनतुन् तसुहुम् व इन् तुसिब्क मुसीबतुय्-यक़ूलू क़द् अख़ज़्ना अम्रना मिन् क़ब्लु व यतवल्लौ व हुम् फ़रिहून्

51

क़ुल्-लय्-युसीबना इल्ला मा कतबल्लाहु लना हुव मौलाना व अलल्लाहि फ़ल्यतवक्कलिल्-मु'मिनून्

52

क़ुल् हल् तरब्बसून बिना इल्ला इह्दल्-हुस्नयैनि व नह्नु नतरब्बसु बिकुम् अय्-युसीबकुमुल्लाहु बि'अज़ाबिम्-मिन् इन्दिही औ बिऐदीना फ़तरब्बसू इन्ना म'अकुम्-मुतरब्बिसून्

53

क़ुल् अन्फ़िक़ू तौ'अन् औ करहल्-लय्-युतक़ब्बल मिन्कुम् इन्नकुम् कुन्तुम् क़ौमन् फ़ासिक़ीन्

54

व मा मन'अहुम् अन् तुक़बल मिन्हुम् नफ़क़ातुहुम् इल्ला अन्नहुम् कफ़रू बिल्लाहि व बिरसूलिही व ला यअतूनस्-सलात इल्ला व हुम् कुसाला व ला युन्फ़िक़ून इल्ला व हुम् कारिहून्

55

फ़ला तु'जिब्क अम्वालुहुम् व ला औलादुहुम् इन्नमा युरीदुल्लाहु लियु'अज़्ज़िबहुम्-बिहा फ़िल्-हयातिद्-दुन्या व तज़्हक़ अन्फ़ुसुहुम् व हुम् काफ़िरून्

56

व यह्लिफ़ून बिल्लाहि इन्नहुम् लमिन्कुम् व मा हुम्-मिन्कुम् व लाकिन्नहुम् क़ौमुय्-यफ़्रक़ून्

57

लौ यजिदून मल्ज'अन् औ मग़ारातिन् औ मुद्दख़लल्-लवल्लौ इलैहि व हुम् यज्महून्

58

व मिन्हुम्-मय्-यल्मिज़ुक फ़िस्-सदक़ाति फ़इन् उ'तू मिन्हा रदू व इल्-लम् यु'तौ मिन्हा इज़ा हुम् यस्ख़तून्

59

व लौ अन्नहुम् रदू मा आताहुमुल्लाहु व रसूलुहू व क़ालू हस्बुनल्लाहु सयु'तीनल्लाहु मिन् फ़द्लिही व रसूलुहू इन्ना इलल्लाहि राग़िबून्

60

इन्नमस्-सदक़ातु लिल्-फ़ुक़राइ वल्-मसाकीनि वल्-आमिलीन अलैहा वल्-मुअल्लफ़ति क़ुलूबुहुम् व फ़िर्-रिक़ाबि वल्-ग़ारिमीन व फ़ी सबीलिल्लाहि वब्निस्-सबीलि फ़रीदतम्-मिनल्लाहि वल्लाहु अलीमुन् हकीम्

61

व मिन्हुमुल्-लज़ीन यु'ज़ूनन्-नबिय्य व यक़ूलून हुव उज़ुनुन् क़ुल् उज़ुनु ख़ैरिल्-लकुम् यु'मिनु बिल्लाहि व यु'मिनु लिल्-मु'मिनीन व रह्मतुल्-लिल्लज़ीन आमनू मिन्कुम् वल्लज़ीन यु'ज़ून रसूलल्लाहि लहुम् अज़ाबुन् अलीम्

62

यह्लिफ़ून बिल्लाहि लकुम् लियुर्दूकुम् वल्लाहु व रसूलुहू अहक़्क़ु अय्-युर्दूहु इन् कानू मु'मिनीन्

63

अलम् य'अलमू अन्नहू मय्-युहादिदिल्लाह व रसूलहू फ़अन्न लहू नार जहन्नम ख़ालिदन् फ़ीहा ज़ालिकल्-ख़िज़्युल्-अज़ीम्

64

यह्ज़रुल्-मुनाफ़िक़ून अन् तुनज़्ज़ल अलैहिम् सूरतुन् तुनब्बि'उहुम्-बिमा फ़ी क़ुलूबिहिम् क़ुलिस्-तह्ज़ि'ऊ इन्नल्लाह मुख़्रिजुम्-मा तह्ज़रून्

65

व लइन् स'अल्तहुम् लयक़ूलुन्न इन्नमा कुन्ना नख़ूदु व नल्'अबु क़ुल् अबिल्लाहि व आयातिही व रसूलिही कुन्तुम् तस्तह्ज़िऊन्

66

ला त'अतज़िरू क़द् कफ़र्तुम् बा'द ईमानिकुम् इन्-न'अफ़ु अन् ता'इफ़तिम्-मिन्कुम् नु'अज़्ज़िब् ता'इफ़तम्-बिअन्नहुम् कानू मुज्रिमीन्

67

अल्-मुनाफ़िक़ून वल्-मुनाफ़िक़ातु बा'दुहुम्-मिम्-बा'दिय्-य'अमुरून बिल्-मुन्करि व यन्हौन अनिल्-म'अरूफ़ि व यक़्बिदून ऐदियहुम् नसुल्लाह फ़नसियहुम् इन्नल्-मुनाफ़िक़ीन हुमुल्-फ़ासिक़ून्

68

व'अदल्लाहुल्-मुनाफ़िक़ीन वल्-मुनाफ़िक़ाति वल्-कुफ़्फ़ार नार जहन्नम ख़ालिदीन फ़ीहा हिय हस्बुहुम् व ल'अनहुमुल्लाहु व लहुम् अज़ाबुम्-मुक़ीम्

69

कल्लज़ीन मिन् क़ब्लिकुम् कानू अशद्द मिन्कुम् क़ुव्वतव्-व अक्सर अम्वालव्-व औलादन् फ़स्तम्त'ऊ बिख़लाक़िहिम् फ़स्तम्त'अत्तुम् बिख़लाक़िकुम् कमस्तम्त'अल्-लज़ीन मिन् क़ब्लिकुम्-बिख़लाक़िहिम् व ख़ुद्तुम् कल्लज़ी ख़ादू उलाइक हबितत् आ'मालुहुम् फ़िद्-दुन्या वल्-आख़िरति व उलाइक हुमुल्-ख़ासिरून्

70

अलम् या'तिहिम् नब'उल्-लज़ीन मिन् क़ब्लिहिम् क़ौमि नूहिव्-व आदिव्-व समूद व क़ौमि इब्राहीम व अस्हाबि मद्यन वल्-मु'तफ़िकाति अतत्हुम् रुसुलुहुम्-बिल्-बय्यिनाति फ़मा कानल्लाहु लियज़्लिमहुम् व लाकिन् कानू अन्फ़ुसहुम् यज़्लिमून्

71

वल्-मु'मिनून वल्-मु'मिनातु बा'दुहुम् औलिया'उ बा'दिय्-य'अमुरून बिल्-म'अरूफ़ि व यन्हौन अनिल्-मुन्करि व युक़ीमूनस्-सलात व यु'तूनज़्-ज़कात व युती'ऊनल्लाह व रसूलहू उलाइक सयर्हमुहुमुल्लाहु इन्नल्लाह अज़ीज़ुन् हकीम्

72

व'अदल्लाहुल्-मु'मिनीन वल्-मु'मिनाति जन्नातिन् तज्री मिन् तह्तिहल्-अन्हारु ख़ालिदीन फ़ीहा व मसाकिन तय्यिबतन् फ़ी जन्नाति अद्निव्-व रिज़्वानुम्-मिनल्लाहि अक्बरु ज़ालिक हुवल्-फ़ौज़ुल्-अज़ीम्

73

या अय्युहन्-नबिय्यु जाहिदिल्-कुफ़्फ़ार वल्-मुनाफ़िक़ीन वग़्लुज़् अलैहिम् व मा'वाहुम् जहन्नमु व बि'सल्-मसीर्

74

यह्लिफ़ून बिल्लाहि मा क़ालू व लक़द् क़ालू कलिमतल्-कुफ़्रि व कफ़रू बा'द इस्लामिहिम् व हम्मू बिमा लम् यनालू व मा नक़मू इल्ला अन् अग़्नाहुमुल्लाहु व रसूलुहू मिन् फ़द्लिही फ़इय्-यतूबू यकु ख़ैरल्-लहुम् व इय्-यतवल्लौ यु'अज़्ज़िब्हुमुल्लाहु अज़ाबन् अलीमन् फ़िद्-दुन्या वल्-आख़िरति व मा लहुम् फ़िल्-अर्दि मिन् वलिय्यिव्-व ला नसीर्

75

व मिन्हुम्-मन् आहदल्लाह लइन् आताना मिन् फ़द्लिही लनस्सद्दक़न्न व लनकूनन्न मिनस्-सालिहीन्

76

फ़लम्मा आताहुम्-मिन् फ़द्लिही बख़िलू बिही व तवल्लौ व हुम्-मु'रिदून्

77

फ़आ'क़बहुम् निफ़ाक़न् फ़ी क़ुलूबिहिम् इला यौमि यल्क़ौनहू बिमा अख़्लफ़ुल्लाह मा व'अदूहु व बिमा कानू यक्ज़िबून्

78

अलम् य'अलमू अन्नल्लाह य'अलमु सिर्रहुम् व नज्वाहुम् व अन्नल्लाह अल्लामुल्-ग़ुयूब्

79

अल्लज़ीन यल्मिज़ूनल्-मुत्तव्वि'ईन मिनल्-मु'मिनीन फ़िस्-सदक़ाति वल्लज़ीन ला यजिदून इल्ला जुह्दहुम् फ़यस्ख़रून मिन्हुम् सख़िरल्लाहु मिन्हुम् व लहुम् अज़ाबुन् अलीम्

80

इस्तग़्फ़िर् लहुम् औ ला तस्तग़्फ़िर् लहुम् इन् तस्तग़्फ़िर् लहुम् सब्'ईन मर्रतन् फ़लय्-यग़्फ़िरल्लाहु लहुम् ज़ालिक बिअन्नहुम् कफ़रू बिल्लाहि व रसूलिही वल्लाहु ला यह्दिल्-क़ौमल्-फ़ासिक़ीन्

81

फ़रिहल्-मुख़ल्लफ़ून बिमक़्'अदिहिम् ख़िलाफ़ रसूलिल्लाहि व करिहू अय्-युजाहिदू बिअम्वालिहिम् व अन्फ़ुसिहिम् फ़ी सबीलिल्लाहि व क़ालू ला तन्फ़िरू फ़िल्-हर्रि क़ुल् नारु जहन्नम अशद्दु हर्रल्-लौ कानू यफ़्क़हून्

82

फ़ल्यद्हकू क़लीलव्-वल्यब्कू कसीरन् जज़ाअम्-बिमा कानू यक्सिबून्

83

फ़इर्-रज'अकल्लाहु इला ता'इफ़तिम्-मिन्हुम् फ़स्ता'ज़नूक लिल्-ख़ुरूजि फ़क़ुल्-लन् तख़्रुजू म'इय अबदव्-व लन् तुक़ातिलू म'इय अदुव्वन् इन्नकुम् रदीतुम् बिल्-क़ु'ऊदि अव्वल मर्रतिन् फ़क़्'उदू म'अल्-ख़ालिफ़ीन्

84

व ला तुसल्लि अला अहदिम्-मिन्हुम्-मात अबदव्-व ला तक़ुम् अला क़ब्रिही इन्नहुम् कफ़रू बिल्लाहि व रसूलिही व मातू व हुम् फ़ासिक़ून्

85

व ला तु'जिब्क अम्वालुहुम् व औलादुहुम् इन्नमा युरीदुल्लाहु अय्-यु'अज़्ज़िबहुम्-बिहा फ़िद्-दुन्या व तज़्हक़ अन्फ़ुसुहुम् व हुम् काफ़िरून्

86

व इज़ा उन्ज़िलत् सूरतुन् अन् आमिनू बिल्लाहि व जाहिदू म'अ रसूलिहिस्-ता'ज़नक उलुत्-तौलि मिन्हुम् व क़ालू ज़र्ना नकुम्-म'अल्-क़ा'इदीन्

87

रदू बिअय्-यकूनू म'अल्-ख़वालिफ़ि व तुबि'अ अला क़ुलूबिहिम् फ़हुम् ला यफ़्क़हून्

88

लाकिनिर्-रसूलु वल्लज़ीन आमनू म'अहू जाहदू बिअम्वालिहिम् व अन्फ़ुसिहिम् व उलाइक लहुमुल्-ख़ैरातु व उलाइक हुमुल्-मुफ़्लिहून्

89

अ'अद्दल्लाहु लहुम् जन्नातिन् तज्री मिन् तह्तिहल्-अन्हारु ख़ालिदीन फ़ीहा ज़ालिकल्-फ़ौज़ुल्-अज़ीम्

90

व जाअल्-मु'अज़्ज़िरून मिनल्-आ'राबि लियु'ज़न लहुम् व क़'अदल्-लज़ीन कज़बुल्लाह व रसूलहू सयुसीबुल्-लज़ीन कफ़रू मिन्हुम् अज़ाबुन् अलीम्

91

लैस अलद्-दु'अफ़ाइ व ला अलल्-मर्दा व ला अलल्-लज़ीन ला यजिदून मा युन्फ़िक़ून हरजुन् इज़ा नसहू लिल्लाहि व रसूलिही मा अलल्-मुह्सिनीन मिन् सबीलिव्-वल्लाहु ग़फ़ूरुर्-रहीम्

92

व ला अलल्-लज़ीन इज़ा मा अतौक लितह्मिलहुम् क़ुल्त ला अजिदु मा अह्मिलुकुम् अलैहि तवल्लौ व आ'युनुहुम् तफ़ीदु मिनद्-दम्'इ हज़नन् अल्ला यजिदू मा युन्फ़िक़ून्

93

इन्नमस्-सबीलु अलल्-लज़ीन यस्ता'ज़िनूनक व हुम् अग़्निया'उ रदू बिअय्-यकूनू म'अल्-ख़वालिफ़ि व तब'अल्लाहु अला क़ुलूबिहिम् फ़हुम् ला य'अलमून्

94

य'अतज़िरून इलैकुम् इज़ा रज'अतुम् इलैहिम् क़ुल्-ला त'अतज़िरू लन्-नु'मिन लकुम् क़द् नब्ब'अनल्लाहु मिन् अख़्बारिकुम् व सयरल्लाहु अमलकुम् व रसूलुहू सुम्म तुरद्दून इला आलिमिल्-ग़ैबि वश्-शहादति फ़युनब्बि'उकुम्-बिमा कुन्तुम् त'अमलून्

95

सयह्लिफ़ून बिल्लाहि लकुम् इज़न्-क़लब्तुम् इलैहिम् लितु'रिदू अन्हुम् फ़आ'रिदू अन्हुम् इन्नहुम् रिज्सुव्-व मा'वाहुम् जहन्नमु जज़ाअम्-बिमा कानू यक्सिबून्

96

यह्लिफ़ून लकुम् लितर्दौ अन्हुम् फ़इन् तर्दौ अन्हुम् फ़इन्नल्लाह ला यर्दा अनिल्-क़ौमिल्-फ़ासिक़ीन्

97

अल्-आ'राबु अशद्दु कुफ़्रव्-व निफ़ाक़व्-व अज्दरु अल्ला य'अलमू हुदूद मा अन्ज़लल्लाहु अला रसूलिही वल्लाहु अलीमुन् हकीम्

98

व मिनल्-आ'राबि मय्-यत्तख़िज़ु मा युन्फ़िक़ु मग़्रमव्-व यतरब्बसु बिकुमुद्-दवाइर अलैहिम् दाइरतुस्-सौइ वल्लाहु समी'उन् अलीम्

99

व मिनल्-आ'राबि मय्-यु'मिनु बिल्लाहि वल्-यौमिल्-आख़िरि व यत्तख़िज़ु मा युन्फ़िक़ु क़ुरुबातिन् इन्दल्लाहि व सलवातिर्-रसूलि अला इन्नहा क़ुर्बतुल्-लहुम् सयुद्ख़िलुहुमुल्लाहु फ़ी रह्मतिही इन्नल्लाह ग़फ़ूरुर्-रहीम्

100

वस्-साबिक़ूनल्-अव्वलून मिनल्-मुहाजिरीन वल्-अन्सारि वल्लज़ीनत्-तब'ऊहुम्-बिइह्सानिर्-रदियल्लाहु अन्हुम् व रदू अन्हु व अ'अद्द लहुम् जन्नातिन् तज्री तह्तहल्-अन्हारु ख़ालिदीन फ़ीहा अबदन् ज़ालिकल्-फ़ौज़ुल्-अज़ीम्

101

व मिम्मन् हौलकुम्-मिनल्-आ'राबि मुनाफ़िक़ून व मिन् अह्लिल्-मदीनति मरदू अलन्-निफ़ाक़ि ला त'अलमुहुम् नह्नु न'अलमुहुम् सनु'अज़्ज़िबुहुम्-मर्रतैनि सुम्म युरद्दून इला अज़ाबिन् अज़ीम्

102

व आख़रूना'तरफ़ू बिज़ुनूबिहिम् ख़लतू अमलन् सालिहव्-व आख़र सय्यिअन् असल्लाहु अय्-यतूब अलैहिम् इन्नल्लाह ग़फ़ूरुर्-रहीम्

103

ख़ुज़् मिन् अम्वालिहिम् सदक़तन् तुतह्हिरुहुम् व तुज़क्कीहिम्-बिहा व सल्लि अलैहिम् इन्न सलातक सकनुल्-लहुम् वल्लाहु समी'उन् अलीम्

104

अलम् य'अलमू अन्नल्लाह हुव यक़्बलुत्-तौबत अन् इबादिही व या'ख़ुज़ुस्-सदक़ाति व अन्नल्लाह हुवत्-तव्वाबुर्-रहीम्

105

व क़ुलि'मलू फ़सयरल्लाहु अमलकुम् व रसूलुहू वल्-मु'मिनून व सतुरद्दून इला आलिमिल्-ग़ैबि वश्-शहादति फ़युनब्बि'उकुम्-बिमा कुन्तुम् त'अमलून्

106

व आख़रून मुर्जौन लिअम्रिल्लाहि इम्मा यु'अज़्ज़िबुहुम् व इम्मा यतूबु अलैहिम् वल्लाहु अलीमुन् हकीम्

107

वल्लज़ीनत्-तख़ज़ू मस्जिदन् दिरारव्-व कुफ़्रव्-व तफ़्रीक़म्-बैनल्-मु'मिनीन व इर्सादल्-लिमन् हारबल्लाह व रसूलहू मिन् क़ब्लु व लयह्लिफ़ुन्न इन् अरद्ना इल्लल्-हुस्ना वल्लाहु यश्हदु इन्नहुम् लकाज़िबून्

108

ला तक़ुम् फ़ीहि अबदल्-लमस्जिदुन् उस्सिस अलत्-तक़्वा मिन् अव्वलि यौमिन् अहक़्क़ु अन् तक़ूम फ़ीहि फ़ीहि रिजालुय्-युहिब्बून अय्-यतत्तह्हरू वल्लाहु युहिब्बुल्-मुत्तह्हिरीन्

109

अफ़मन् अस्सस बुन्यानहू अला तक़्वा मिनल्लाहि व रिज़्वानिन् ख़ैरुन् अम्-मन् अस्सस बुन्यानहू अला शफ़ा जुरुफ़िन् हारिन् फ़न्हार बिही फ़ी नारि जहन्नम वल्लाहु ला यह्दिल्-क़ौमज़्-ज़ालिमीन्

110

ला यज़ालु बुन्यानुहुमुल्-लज़ी बनौ रीबतन् फ़ी क़ुलूबिहिम् इल्ला अन् तक़त्त'अ क़ुलूबुहुम् वल्लाहु अलीमुन् हकीम्

111

इन्नल्लाहश्-तरा मिनल्-मु'मिनीन अन्फ़ुसहुम् व अम्वालहुम्-बिअन्न लहुमुल्-जन्नत युक़ातिलून फ़ी सबीलिल्लाहि फ़यक़्तुलून व युक़्तलून वा'दन् अलैहि हक़्क़न् फ़ित्-तौराति वल्-इन्जीलि वल्-क़ुरआनि व मन् औफ़ा बि'अह्दिही मिनल्लाहि फ़स्तब्शिरू बिबै'इकुमुल्-लज़ी बाय'अतुम्-बिही व ज़ालिक हुवल्-फ़ौज़ुल्-अज़ीम्

112

अत्-ता'इबूनल्-आबिदूनल्-हामिदूनस्-सा'इहूनर्-राकि'ऊनस्-साजिदूनल्-आमिरून बिल्-म'अरूफ़ि वन्-नाहून अनिल्-मुन्करि वल्-हाफ़िज़ून लिहुदूदिल्लाहि व बश्शिरिल्-मु'मिनीन्

113

मा कान लिन्-नबिय्यि वल्लज़ीन आमनू अय्-यस्तग़्फ़िरू लिल्-मुश्रिकीन व लौ कानू उली क़ुर्बा मिम्-बा'दि मा तबय्यन लहुम् अन्नहुम् अस्हाबुल्-जहीम्

114

व मा कानस्तिग़्फ़ारु इब्राहीम लिअबीहि इल्ला अम्-मौ'इदतिव्-व'अदहा इय्याहु फ़लम्मा तबय्यन लहू अन्नहू अदुव्वुल्-लिल्लाहि तबर्र'अ मिन्हु इन्न इब्राहीम ल'अव्वाहुन् हलीम्

115

व मा कानल्लाहु लियुदिल्ल क़ौमम्-बा'द इज़ हदाहुम् हत्ता युबय्यिन लहुम्-मा यत्तक़ून इन्नल्लाह बिकुल्लि शैइन् अलीम्

116

इन्नल्लाह लहू मुल्कुस्-समावाति वल्-अर्दि युह्यी व युमीतु व मा लकुम्-मिन् दूनिल्लाहि मिन् वलिय्यिव्-व ला नसीर्

117

लक़त्-ताबल्लाहु अलन्-नबिय्यि वल्-मुहाजिरीन वल्-अन्सारिल्-लज़ीनत्-तब'ऊहु फ़ी सा'अतिल्-उस्रति मिम्-बा'दि मा काद यज़ीग़ु क़ुलूबु फ़रीक़िम्-मिन्हुम् सुम्म ताब अलैहिम् इन्नहू बिहिम् र'ऊफ़ुर्-रहीम्

118

व अलस्-सलासतिल्-लज़ीन ख़ुल्लिफ़ू हत्ता इज़ा दाक़त् अलैहिमुल्-अर्दु बिमा रहुबत् व दाक़त् अलैहिम् अन्फ़ुसुहुम् व ज़न्नू अल्-ला मल्ज'अ मिनल्लाहि इल्ला इलैहि सुम्म ताब अलैहिम् लियतूबू इन्नल्लाह हुवत्-तव्वाबुर्-रहीम्

119

या अय्युहल्लज़ीन आमनुत्-तक़ुल्लाह व कूनू म'अस्-सादिक़ीन्

120

मा कान लिअह्लिल्-मदीनति व मन् हौलहुम्-मिनल्-आ'राबि अय्-यतख़ल्लफ़ू अर्-रसूलिल्लाहि व ला यर्ग़बू बिअन्फ़ुसिहिम् अन्-नफ़्सिही ज़ालिक बिअन्नहुम् ला युसीबुहुम् ज़म'उव्-व ला नसबुव्-व ला मख़्मसतुन् फ़ी सबीलिल्लाहि व ला यत'ऊन मौति'अय्-यग़ीज़ुल्-कुफ़्फ़ार व ला यनालून मिन् अदुव्विन्-नैलन् इल्ला कुतिब लहुम्-बिही अमलुन् सालिहुन् इन्नल्लाह ला युदी'उ अज्रल्-मुह्सिनीन्

121

व ला युन्फ़िक़ून नफ़क़तन् सग़ीरतव्-व ला कबीरतव्-व ला यक़्त'ऊन वादियन् इल्ला कुतिब लहुम् लियज्ज़ियहुमुल्लाहु अह्सन मा कानू य'अमलून्

122

व मा कानल्-मु'मिनून लियन्फ़िरू काफ़्फ़तन् फ़लौला नफ़र मिन् कुल्लि फ़िर्क़तिम्-मिन्हुम् ता'इफ़तुल्-लियतफ़क़्क़हू फ़िद्-दीनि व लियुन्ज़िरू क़ौमहुम् इज़ा रज'ऊ इलैहिम् ल'अल्लहुम् यह्ज़रून्

123

या अय्युहल्लज़ीन आमनू क़ातिलुल्-लज़ीन यलूनकुम्-मिनल्-कुफ़्फ़ारि वल्यजिदू फ़ीकुम् ग़िल्ज़तव्-व'अलमू अन्नल्लाह म'अल्-मुत्तक़ीन्

124

व इज़ा मा उन्ज़िलत् सूरतुन् फ़मिन्हुम्-मय्-यक़ूलु अय्युकुम् ज़ादत्हु हाज़िही ईमानन् फ़अम्मल्-लज़ीन आमनू फ़ज़ादत्हुम् ईमानव्-व हुम् यस्तब्शिरून्

125

व अम्मल्-लज़ीन फ़ी क़ुलूबिहिम्-मरदुन् फ़ज़ादत्हुम् रिज्सन् इला रिज्सिहिम् व मातू व हुम् काफ़िरून्

126

अवला यरौन अन्नहुम् युफ़्तनून फ़ी कुल्लि आमिम्-मर्रतन् औ मर्रतैनि सुम्म ला यतूबून व ला हुम् यज़्ज़क्करून्

127

व इज़ा मा उन्ज़िलत् सूरतुन्-नज़र बा'दुहुम् इला बा'दिन् हल् यराकुम्-मिन् अहदिन् सुम्मन्सरफ़ू सरफ़ल्लाहु क़ुलूबहुम्-बिअन्नहुम् क़ौमुल्-ला यफ़्क़हून्

128

लक़द् जाअकुम् रसूलुम्-मिन् अन्फ़ुसिकुम् अज़ीज़ुन् अलैहि मा अनित्तुम् हरीसुन् अलैकुम्-बिल्-मु'मिनीन र'ऊफ़ुर्-रहीम्

129

फ़इन् तवल्लौ फ़क़ुल् हस्बियल्लाहु ला इलाह इल्ला हुव अलैहि तवक्कल्तु व हुव रब्बुल्-अर्शिल्-अज़ीम्

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सूरह अत तौबा हिंदी अर्थ 

1
 
मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उद्घॊषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से

2
 
"अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"

3
 
सार्वजनिक उद्घॊषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति जिम्मेदार से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो

4
 
सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नही की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय है

5
 
फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है

6
 
और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं

7
 
इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय है। -

8
 
कैसे बाक़ी रह सकती है? जबकि उनका हाल यह है कि यदि वे तुम्हें दबा पाएँ तो वे न तुम्हारे विषय में किसी नाते-रिश्ते का ख़याल रखें औऱ न किसी अभिवचन का। वे अपने मुँह ही से तुम्हें राज़ी करते है, किन्तु उनके दिल इनकार करते रहते है और उनमें अधिकतर अवज्ञाकारी है

9
 
उन्होंने अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ा-सा मूल्य स्वीकार किया और इस प्रकार वे उसका मार्ग अपनाने से रूक गए। निश्चय ही बहुत बुरा है, जो कुछ वे कर रहे हैं

10
 
किसी मोमिन के बारे में न तो नाते-रिश्ते का ख़याल रखते है और न किसी अभिवचन का। वही लोग है जिन्होंने सीमा का उल्लंघन किया

11
 
अतः यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो वे धर्म के भाई हैं। और हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर बयान करते हैं, जो जानना चाहें

12
 
और यदि अपने अभिवचन के पश्चात वे अपनी क़समॊं कॊ तॊड़ डालॆं और तुम्हारॆ दीन (धर्म) पर चॊटें करनॆ लगॆं, तॊ फिर कुफ़्र (अधर्म) कॆ सरदारों सॆ युद्ध करॊ, उनकी क़समॆं कुछ नहीं, ताकि वॆ बाज़ आ जाऐं।

13
 
क्या तुम ऐसॆ लॊगॊं सॆ नहीं लड़ॊगॆ जिन्हॊंनॆ अपनी क़समों को तोड़ डालीं और रसूल को निकाल देना चाहा और वही हैं जिन्होंने तुमसे छेड़ में पहल की? क्या तुम उनसे डरते हो? यदि तुम मोमिन हो तो इसका ज़्यादा हक़दार अल्लाह है कि तुम उससे डरो

14
 
उनसे लड़ो। अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें यातना देगा और उन्हें अपमानित करेगा और उनके मुक़ाबले में वह तुम्हारी सहायता करेगा। और ईमानवाले लोगों के दिलों का दुखमोचन करेगा;

15
 
उनके दिलों का क्रोध मिटाएगा, अल्लाह जिसे चाहेगा, उसपर दया-दृष्टि डालेगा। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है

16
 
क्या तुमने यह समझ रखा है कि तुम ऐसे ही छोड़ दिए जाओगे, हालाँकि अल्लाह ने अभी उन लोगों को छाँटा ही नहीं, जिन्होंने तुममें से जिहाद किया और अल्लाह और उसके रसूल और मोमिनों को छोड़कर किसी को घनिष्ठ मित्र नहीं बनाया? तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है

17
 
यह मुशरिकों का काम नहीं कि वे अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करें और उसके प्रबंधक हों, जबकि वे स्वयं अपने विरुद्ध कुफ़्र की गवाही दे रहे है। उन लोगों का सारा किया-धरा अकारथ गया और वे आग में सदैव रहेंगे

18
 
अल्लाह की मस्जिदों का प्रबंधक और उसे आबाद करनेवाला वही हो सकता है जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाया, नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अल्लाह के सिवा किसी से न डरा। अतः ऐसे ही लोग, आशा है कि सीधा मार्ग पानेवाले होंगे

19
 
क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदे हराम (काबा) के प्रबंध को उस क्यक्ति के काम के बराबर ठहरा लिया है, जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान लाया और उसने अल्लाह के मार्ग में संघर्ष किया?अल्लाह की दृष्टि में वे बराबर नहीं। और अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाता

20
 
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने हिजरत की और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों से जिहाद किया, अल्लाह के यहाँ दर्जे में वे बहुत बड़े है और वही सफल है

21
 
उन्हें उनका रब अपना दयालुता और प्रसन्नता और ऐसे बाग़ों की शुभ-सूचना देता है, जिनमें उनके लिए स्थायी सुख-सामग्री है

22
 
उनमें वे सदैव रहेंगे। निस्संदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला है

23
 
ऐ ईमान लानेवालो! अपने बाप और अपने भाइयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र उन्हें प्रिय हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे

24
 
कह दो, "यदि तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नि यों और तुम्हारे रिश्ते-नातेवाले और माल, जो तुमने कमाए है और कारोबार जिसके मन्दा पड़ जाने का तुम्हें भय है और घर जिन्हें तुम पसन्द करते हो, तुम्हे अल्लाह और उसके रसूल और उसके मार्ग में जिहाद करने से अधिक प्रिय है तो प्रतीक्षा करो, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला ले आए। औऱ अल्लाह अवज्ञाकारियों को मार्ग नहीं दिखाता।"

25
 
अल्लाह बहुत-से अवसरों पर तुम्हारी सहायता कर चुका है और हुनैन (की लड़ाई) के दिन भी, जब तुम अपनी अधिकता पर फूल गए, तो वह तुम्हारे कुछ काम न आई और धरती अपनी विशालता के बावजूद तुम पर तंग हो गई। फिर तुम पीठ फेरकर भाग खड़े हुए

26
 
अन्ततः अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और ऐसी सेनाएँ उतारी जिनको तुमने नहीं देखा। और इनकार करनेवालों को यातना दी, और यही इनकार करनेवालों का बदला है

27
 
फिर इसके बाद अल्लाह जिसको चाहता है उसे तौबा नसीब करता है। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है

28
 
ऐ ईमान लानेवालो! मुशरिक तो बस अपवित्र ही है। अतः इस वर्ष के पश्चात वे मस्जिदे हराम के पास न आएँ। और यदि तुम्हें निर्धनता का भय हो तो आगे यदि अल्लाह चाहेगा तो तुम्हें अपने अनुग्रह से समृद्ध कर देगा। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है

29
 
वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते है और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते है और न सत्यधर्म का अनुपालन करते है, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज़्या देने लगे

30
 
यहूदी करते है, "उज़ैर अल्लाह का बेटा है।" और ईसाई कहते है, "मसीह अल्लाह का बेटा है।" ये उनकी अपने मुँह की बातें हैं। ये उन लोगों की-सी बातें कर रहे है जो इससे पहले इनकार कर चुके है। अल्लाह की मार इन पर! ये कहाँ से औधे हुए जा रहे हैं!

31
 
उन्होंने अल्लाह से हटकर अपने धर्मज्ञाताओं और संसार-त्यागी संतों और मरयम के बेटे ईसा को अपने रब बना लिए है - हालाँकि उन्हें इसके सिवा और कोई आदेश नहीं दिया गया था कि अकेले इष्टि-पूज्य की वे बन्दगी करें, जिसक सिवा कोई और पूज्य नहीं। उसकी महिमा के प्रतिकूल है वह शिर्क जो ये लोग करते है। -

32
 
चाहते है कि अल्लाह के प्रकाश को अपने मुँह से बुझा दें, किन्तु अल्लाह अपने प्रकाश को पूर्ण किए बिना नहीं रहेगा, चाहे इनकार करनेवालों को अप्रिय ही लगे

33
 
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा ताकि उसे तमाम दीन (धर्म) पर प्रभावी कर दे, चाहे मुशरिकों को बुरा लगे

34
 
ऐ ईमान लानेवालो! अवश्य ही बहुत-से धर्मज्ञाता और संसार-त्यागी संत ऐसे है जो लोगो को माल नाहक़ खाते है और अल्लाह के मार्ग से रोकते है, और जो लोग सोना और चाँदी एकत्र करके रखते है और उन्हें अल्लाह के मार्ग में ख़र्च नहीं करते, उन्हें दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो

35
 
जिस दिन उनको जहन्नम की आग में तपाया जाएगा फिर उससे उनके ललाटो और उनके पहलुओ और उनकी पीठों को दाग़ा जाएगा (और कहा जाएगा), "यहीं है जो तुमने अपने लिए संचय किया, तो जो कुछ तुम संचित करते रहे हो, उसका मज़ा चखो!"

36
 
निस्संदेह महीनों की संख्या - अल्लाह के अध्यादेश में उस दिन से जब उसने आकाशों और धरती को पैदा किया - अल्लाह की दृष्टि में बारह महीने है। उनमें चार आदर के है, यही सीधा दीन (धर्म) है। अतः तुम उन (महीनों) में अपने ऊपर अत्याचार न करो। और मुशरिकों से तुम सबके सब लड़ो, जिस प्रकार वे सब मिलकर तुमसे लड़ते है। और जान लो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है

37
 
(आदर के महीनों का) हटाना तो बस कुफ़्र में एक बृद्धि है, जिससे इनकार करनेवाले गुमराही में पड़ते है। किसी वर्ष वे उसे हलाल (वैध) ठहरा लेते है और किसी वर्ष उसको हराम ठहरा लेते है, ताकि अल्लाह के आदृत (महीनों) की संख्या पूरी कर लें, और इस प्रकार अल्लाह के हराम किए हुए को वैध ठहरा ले। उनके अपने बुरे कर्म उनके लिए सुहाने हो गए है और अल्लाह इनकार करनेवाले लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता

38
 
ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के मार्ग में निकलो" तो तुम धरती पर ढहे जाते हो? क्या तुम आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन पर राज़ी हो गए? सांसारिक जीवन की सुख-सामग्री तो आख़िरत के हिसाब में है कुछ थोड़ी ही!

39
 
यदि तुम निकालोगे तो वह तुम्हें दुखद यातना देगा और वह तुम्हारी जगह दूसरे गिरोह को ले आएगा और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। और अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है

40
 
यदि तुम उसकी सहायता न भी करो तो अल्लाह उसकी सहायता उस समय कर चुका है जब इनकार करनेवालों ने उसे इस स्थिति में निकाला कि वह केवल दो में का दूसरा था, जब वे दोनों गुफ़ा में थे। जबकि वह अपने साथी से कह रहा था, "शोकाकुल न हो। अवश्यमेव अल्लाह हमारे साथ है।" फिर अल्लाह ने उसपर अपनी ओर से सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और उसकी सहायता ऐसी सेनाओं से की जिन्हें तुम देख न सके और इनकार करनेवालों का बोल नीचा कर दिया, बोल तो अल्लाह ही का ऊँचा रहता है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशील, तत्वदर्शी है

41
 
हलके और बोझिल निकल पड़ो और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करो! यही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम जानो

42
 
यदि निकट (भविष्य में) ही कुछ मिलनेवाला होता और सफ़र भी हलका होता तो वे अवश्य तुम्हारे पीछे चल पड़ते, किन्तु मार्ग की दूरी उन्हें कठिन और बहुत दीर्घ प्रतीत हुई। अब वे अल्लाह की क़समें खाएँगे कि, "यदि हममें इसकी सामर्थ्य होती तो हम अवश्य तुम्हारे साथ निकलते।" वे अपने आपको तबाही में डाल रहे है और अल्लाह भली-भाँति जानता है कि निश्चय ही वे झूठे है

43
 
अल्लाह ने तुम्हे क्षमा कर दिया! तुमने उन्हें क्यों अनुमति दे दी, यहाँ तक कि जो लोग सच्चे है वे तुम्हारे सामने प्रकट हो जाते और झूठों को भी तुम जान लेते?

44
 
जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखते है, वे तुमसे कभी यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करने से माफ़ रखा जाए। और अल्लाह डर रखनेवालों को भली-भाँति जानता है

45
 
तुमसे छुट्टी तो बस वही लोग माँगते है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान नहीं रखते, और जिनके दिल सन्देह में पड़े है, तो वे अपने सन्देह ही में डाँवाडोल हो रहे है

46
 
यदि वे निकलने का इरादा करते तो इसके लिए कुछ सामग्री जुटाते, किन्तु अल्लाह ने उनके उठने को नापसन्द किया तो उसने उन्हें रोक दिया। उनके कह दिया गया, "बैठनेवालों के साथ बैठ रहो।"

47
 
यदि वे तुम्हारे साथ निकलते भी तो तुम्हारे अन्दर ख़राबी के सिवा किसी और चीज़ की अभिवृद्धि नहीं करते। और वे तुम्हारे बीच उपद्रव मचाने के लिए दौड़-धूप करते और तुममें उनकी सुननेवाले है। और अल्लाह अत्याचारियों को भली-भाँति जानता है

48
 
उन्होंने तो इससे पहले भी उपद्रव मचाना चाहा था और वे तुम्हारे विरुद्ध घटनाओं और मामलों के उलटने-पलटने में लगे रहे, यहाँ तक कि हक़ आ गया और अल्लाह को आदेश प्रकट होकर रहा, यद्यपि उन्हें अप्रिय ही लगता रहा

49
 
उनमें कोई है, जो कहता है, "मुझे इजाज़त दे दीजिए, मुझे फ़ितने में न डालिए।" जान लो कि वे फ़ितने में तो पड़ ही चुके है और निश्चय ही जहन्नम भी इनकार करनेवालों को घेर रही है

50
 
यदि तुम्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है, तो उन्हें बुरा लगता है औऱ यदि तुम पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो वे कहते है, "हमने तो अपना काम पहले ही सँभाल लिया था।" और वे ख़ुश होते हुए पलटते है

51
 
कह दो, "हमें कुछ भी पेश नहीं आ सकता सिवाय उसके जो अल्लाह ने लिख दिया है। वही हमारा स्वामी है। और ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"

52
 
कहो, "तुम हमारे लिए दो भलाईयों में से किसी एक भलाई के सिवा किसकी प्रतीक्षा कर सकते है? जबकि हमें तुम्हारे हक़ में इसी की प्रतिक्षा है कि अल्लाह अपनी ओर से तुम्हें कोई यातना देता है या हमारे हाथों दिलाता है। अच्छा तो तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहे है।"

53
 
कह दो, "तुम चाहे स्वेच्छापूर्वक ख़र्च करो या अनिच्छापूर्वक, तुमसे कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। निस्संदेह तुम अवज्ञाकारी लोग हो।"

54
 
उनके ख़र्च के स्वीकृत होने में इसके अतिरिक्त और कोई चीज़ बाधक नहीं कि उन्होंने अल्लाह औऱ उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया। नमाज़ को आते है तो बस हारे जी आते है और ख़र्च करते है, तो अनिच्छापूर्वक ही

55
 
अतः उनके माल तुम्हें मोहित न करें और न उनकी सन्तान ही। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें सांसारिक जीवन में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे इनकार करनेवाले ही रहे

56
 
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि वे तुम्हीं में से है, हालाँकि वे तुममें से नहीं है, बल्कि वे ऐसे लोग है जो त्रस्त रहते है

57
 
यदि वे कोई शरण पा लें या कोई गुफा या घुस बैठने की जगह, तो अवश्य ही वे बगटुट उसकी ओर उल्टे भाग जाएँ

58
 
और उनमें से कुछ लोग सदक़ो के विषय में तुम पर चोटे करते है। किन्तु यदि उन्हें उसमें से दे दिया जाए तो प्रसन्न हो जाएँ और यदि उन्हें उसमें से न दिया गया तो क्या देखोगे कि वे क्रोधित होने लगते है

59
 
यदि अल्लाह और उसके रसूल ने जो कुछ उन्हें दिया था, उसपर वे राज़ी रहते औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह हमें जल्द ही अपने अनुग्रह से देगा और उसका रसूल भी। हम तो अल्लाह ही की ओऱ उन्मुख है।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता)

60
 
सदक़े तो बस ग़रीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए है, जो काम पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना औऱ परचाना अभीष्ट हो और गर्दनों को छुड़ाने और क़र्ज़दारों और तावान भरनेवालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है। यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है

61
 
और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं, जो नबी को दुख देते है और कहते है, "वह तो निरा कान है!" कह दो, "वह सर्वथा कान तुम्हारी भलाई के लिए है। वह अल्लाह पर ईमान रखता है और ईमानवालों पर भी विश्वास करता है। और उन लोगों के लिए सर्वथा दयालुता है जो तुममें से ईमान लाए है। रहे वे लोग जो अल्लाह के रसूल को दुख देते है, उनके लिए दुखद यातना है।"

62
 
वे तुम लोगों के सामने अल्लाह की क़समें खाते है, ताकि तुम्हें राज़ी कर लें, हालाँकि यदि वे मोमिन है तो अल्लाह और उसका रसूल इसके ज़्यादा हक़दार है कि उनको राज़ी करें

63
 
क्या उन्हें मालूम नहीं कि जो अल्लाह औऱ उसके रसूल का विरोध करता है, उसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें वह सदैव रहेगा। यह बहुत बड़ी रुसवाई है

64
 
मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) डर रहे है कि कहीं उनके बारे में कोई ऐसी सूरा न अवतरित हो जाए जो वह सब कुछ उनपर खोल दे, जो उनके दिलों में है। कह दो, "मज़ाक़ उड़ा लो, अल्लाह तो उसे प्रकट करके रहेगा, जिसका तुम्हें डर है।"

65
 
और यदि उनसे पूछो तो कह देंगे, "हम तो केवल बातें और हँसी-खेल कर रहे थे।" कहो, "क्या अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल के साथ हँसी-मज़ाक़ करते थे?

66
 
"बहाने न बनाओ, तुमने अपने ईमान के पश्चात इनकार किया। यदि हम तुम्हारे कुछ लोगों को क्षमा भी कर दें तो भी कुछ लोगों को यातना देकर ही रहेंगे, क्योंकि वे अपराधी हैं।"

67
 
मुनाफ़िक़ पुरुष और मुनाफ़िक़ स्त्रियाँ सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वे बुराई का हुक्म देते है और भलाई से रोकते है और हाथों को बन्द किए रहते है। वे अल्लाह को भूल बैठे तो उसने भी उन्हें भुला दिया। निश्चय ही मुनाफ़िक़ अवज्ञाकारी हैं

68
 
अल्लाह ने मुनाफ़िक़ पुरुषों और मुनाफ़िक़ स्त्रियों और इनकार करनेवालों से जहन्नम की आग का वादा किया है, जिसमें वे सदैव ही रहेंगे। वही उनके लिए काफ़ी है और अल्लाह ने उनपर लानत की, और उनके लिए स्थाई यातना है

69
 
उन लोगों की तरह, जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं, वे शक्ति में तुमसे बढ़-बढ़कर थे और माल और औलाद में भी बढ़े हुए थे। फिर उन्होंने अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा और तुमने भी अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा, जिस प्रकार कि तुमसे पहले के लोगों ने अपने हिस्से का मज़ा उठाना चाहा, और जिस वाद-विवाद में तुम पड़े थे तुम भी वाद-विवाद में पड़ गए। ये वही लोग है जिनका किया-धरा दुनिया और आख़िरत में अकारथ गया, और वही घाटे में है

70
 
क्या उन्हें उन लोगों का वृतान्त नहीं पहुँचा जो उनसे पहले गुज़रे - नूह के लोगो का, आद और समूद का, और इबराहीम की क़ौम का और मदयनवालों का और उन बस्तियों का जिन्हें उलट दिया गया? उसके रसूल उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए थे, फिर अल्लाह ऐसा न था कि वह उनपर अत्याचार करता, किन्तु वे स्वयं अपने-आप पर अत्याचार कर रहे थे

71
 
रहे मोमिन मर्द औऱ मोमिन औरतें, वे सब परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते है। नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते है और अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। ये वे लोग है, जिनकर शीघ्र ही अल्लाह दया करेगा। निस्सन्देह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है

72
 
मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों से अल्लाह ने ऐसे बाग़ों का वादा किया है जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जिनमें वे सदैव रहेंगे और सदाबहार बाग़ों में पवित्र निवास गृहों का (भी वादा है) और, अल्लाह की प्रसन्नता और रज़ामन्दी का; जो सबसे बढ़कर है। यही सबसे बड़ी सफलता है

73
 
ऐ नबी! इनकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों से जिहाद करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ। अन्ततः उनका ठिकाना जहन्नम है और वह जा पहुँचने की बहुत बुरी जगह है!

74
 
वे अल्लाह की क़समें खाते है कि उन्होंने नहीं कहा, हालाँकि उन्होंने अवश्य ही कुफ़्र की बात कही है और अपने इस्लाम स्वीकार करने के पश्चात इनकार किया, और वह चाहा जो वे न पा सके। उनके प्रतिशोध का कारण तो यह है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपने अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दिया। अब यदि वे तौबा कर लें तो उन्हीं के लिए अच्छा है और यदि उन्होंने मुँह मोड़ा तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में दुखद यातना देगा और धरती में उनका न कोई मित्र होगा और न सहायक

75
 
और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होने अल्लाह को वचन दिया था कि "यदि उसने हमें अपने अनुग्रह से दिया तो हम अवश्य दान करेंगे और नेक होकर रहेंगे।"

76
 
किन्तु जब अल्लाह ने उन्हें अपने अनुग्रह से दिया तो वे उसमें कंजूसी करने लगे और पहलू बचाकर फिर गए

77
 
फिर परिणाम यह हुआ कि उसने उनके दिलों में उस दिन तक के लिए कपटाचार डाल दिया, जब वे उससे मिलेंगे, इसलिए कि उन्होंने अल्लाह से जो प्रतिज्ञा की थी उसे भंग कर दिया और इसलिए भी कि वे झूठ बोलते रहे

78
 
क्या उन्हें खबर नहीं कि अल्लाह उनका भेद और उनकी कानाफुसियों को अच्छी तरह जानता है और यह कि अल्लाह परोक्ष की सारी बातों को भली-भाँति जानता है

79
 
जो लोग स्वेच्छापूर्वक देनेवाले मोमिनों पर उनके सदक़ो (दान) के विषय में चोटें करते है और उन लोगों का उपहास करते है, जिनके पास इसके सिवा कुछ नहीं जो वे मशक़्क़त उठाकर देते है, उन (उपहास करनेवालों) का उपहास अल्लाह ने किया और उनके लिए दुखद यातना है

80
 
तुम उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो या उनके लिए क्षमा की प्रार्थना न करो। यदि तुम उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा की प्रार्थना करोगे, तो भी अल्लाह उन्हें क्षमा नहीं करेगा, यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और अल्लाह अवज्ञाकारियों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता

81
 
पीछे रह जानेवाले अल्लाह के रसूल के पीछे अपने बैठ रहने पर प्रसन्न हुए। उन्हें यह नापसन्द हुआ कि अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद करें। और उन्होंने कहा, "इस गर्मी में न निकलो।" कह दो, "जहन्नम की आग इससे कहीं अधिक गर्म है," यदि वे समझ पाते (तो ऐसा न कहते)

82
 
अब चाहिए कि जो कुछ वे कमाते रहे है, उसके बदले में हँसे कम और रोएँ अधिक

83
 
अव यदि अल्लाह तुम्हें उनके किसी गिरोह की ओर रुजू कर दे और भविष्य में वे तुमसे साथ निकलने की अनुमति चाहें तो कह देना, "तुम मेरे साथ कभी भी नहीं निकल सकते और न मेरे साथ होकर किसी शत्रु से लड़ सकते हो। तुम पहली बार बैठ रहने पर ही राज़ी हुए, तो अब पीछे रहनेवालों के साथ बैठे रहो।"

84
 
औऱ उनमें से जिस किसी व्यक्ति की मृत्यु हो उसकी जनाज़े की नमाज़ कभी न पढ़ना और न कभी उसकी क़ब्र पर खड़े होना। उन्होंने तो अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और मरे इस दशा में कि अवज्ञाकारी थे

85
 
और उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें मोहित न करें। अल्लाह तो बस यह चाहता है कि उनके द्वारा उन्हें संसार में यातना दे और उनके प्राण इस दशा में निकलें कि वे काफ़िर हों

86
 
और जब कोई सूरा उतरती है कि "अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल के साथ होकर जिहाद करो।" तो उनके सामर्थ्यवान लोग तुमसे छुट्टी माँगने लगते है और कहते है कि "हमें छोड़ दो कि हम बैठनेवालों के साथ रह जाएँ।"

87
 
वे इसी पर राज़ी हुए कि पीछे रह जानेवाली स्त्रियों के साथ रह जाएँ और उनके दिलों पर तो मुहर लग गई है, अतः वे समझते नहीं

88
 
किन्तु, रसूल और उसके ईमानवाले साथियों ने अपने मालों और अपनी जानों के साथ जिहाद किया, और वही लोग है जिनके लिए भलाइयाँ है और वही लोग है जो सफल है

89
 
अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनके नीचे नहरें बह रह हैं, वे उनमें सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है

90
 
बहाने करनेवाले बद्दूल भी आए कि उन्हें (बैठे रहने की) छुट्टी मिल जाए। और जो अल्लाह और उसके रसूल से झूठ बोले वे भी बैठे रहे। उनमें से जिन्होंने इनकार किया उन्हें शीघ्र ही एक दुखद यातना पहुँचकर रहेगी

91
 
न तो कमज़ोरों के लिए कोई दोष की बात है और न बीमारों के लिए और न उन लोगों के लिए जिन्हें ख़र्च करने के लिए कुछ प्राप्त नहीं, जबकि वे अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठावान हों। उत्तमकारों पर इलज़ाम की कोई गुंजाइश नहीं है। अल्लाह तो बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है

92
 
और न उन लोगों पर आक्षेप करने की कोई गुंजाइश है जिनका हाल यह है कि जब वे तुम्हारे पास आते है, कि तुम उनके लिए सवारी का प्रबन्ध कर दो, तुम कहते हो, "मुझे ऐसा कुछ प्राप्त नहीं जिसपर तुम्हें सवार करूँ।" वे इस दशा में लौटते है कि इस ग़म में उनकी आँखे आँसू बहा रही होती है कि वे अपने पास ख़र्च करने को कुछ नहीं पाते

93
 
इल्ज़ाम तो बस उनपर है जो धनवान होते हुए तुमसे छुट्टी माँगते है। वे इसपर राज़ी हुए कि पीछे डाले गए लोगों के साथ रह जाएँ। अल्लाह ने तो उनके दिलों पर मुहर लगा दी है, इसलिए वे जानते नहीं

94
 
जब तुम पलटकर उनके पास पहुँचोगे तो वे तुम्हारे सामने बहाने करेंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म्हारी बात कदापि नहीं मानेंगे। हमें अल्लाह ने तुम्हारे वृत्तांत बता दिए है। अभी अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारे काम को देखेगा, फिर तुम उसकी ओर लौटोगे, जो छिपे और खुले का ज्ञान रखता है। फिर जो कुछ तुम करते रहे हो वह तुम्हे बता देगा।"

95
 
जब तुम पलटकर उनके पास जाओगे तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो। तो तुम उन्हें छोड़ ही दो। निश्चय ही वे गन्दगी है और उनका ठिकाना जहन्नम है। जो कुछ वे कमाते रहे है, यह उसी का बदला है

96
 
वे तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे ताकि तुम उनसे राज़ी हो जाओ, किन्तु यदि तुम उनसे राज़ी भी हो गए तो अल्लाह ऐसे लोगो से कदापि राज़ी न होगा, जो अवज्ञाकारी है

97
 
वे बद्दूग इनकार और कपटाचार में बहुत-ही बढ़े हुए है। और इसी के ज़्यादा योग्य है कि उनकी सीमाओं से अनभिज्ञ रहें, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल पर अवतरित किया है। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है

98
 
और कुछ बद्दूज ऐसे है कि वे जो कुछ ख़र्च करते है, उसे तावान समझते है और तुम्हारे हक़ मं बुरी गर्दिशों (बुरे दिन) की प्रतीक्षा में हैं, बुरी गर्दिश में तो वही है। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है

99
 
और बद्दु,ओं में ऐसे भी लोग है जो अल्लाह और अन्तिम दिन को मानते है और जो कुछ ख़र्च करते है, उसे अल्लाह के यहाँ निकटताओं का और रसूल की दुआओं को प्राप्त करने का साधन बनाते है। हाँ! निस्संदेह वह उनके हक़ में निकटता ही है। अल्लाह उन्हें शीघ्र ही अपनी दयालुता में दाख़िल करेगा। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है

100
 
सबसे पहले आगे बढ़नेवाले मुहाजिर और अनसार और जिन्होंने भली प्रकार उनका अनुसरण किया, अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे उससे राज़ी हुए। और उसने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे है, जिनके नीचे नहरें बह रही है, वे उनमें सदैव रहेंगे। यही बड़ी सफलता है

101
 
और तुम्हारे आस-पास के बद्दुनओं में और मदीनावालों में कुछ ऐसे कपटाचारी है जो कपट-नीति पर जमें हुए है। उनको तुम नहीं जानते, हम उन्हें भली-भाँति जानते है। शीघ्र ही हम उन्हें दो बार यातना देंगे। फिर वे एक बड़ी यातना की ओर लौटाए जाएँगे

102
 
और दूसरे कुछ लोग है जिन्होंने अपने गुनाहों का इक़रार किया। उन्होंने मिले-जुले कर्म किए, कुछ अच्छे और कुछ बुरे। आशा है कि अल्लाह की कृपा-स्पष्ट उनपर हो। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है

103
 
तुम उनके माल में से दान लेकर उन्हें शुद्ध करो और उनके द्वारा उन (की आत्मा) को विकसित करो और उनके लिए दुआ करो। निस्संदेह तुम्हारी दुआ उनके लिए सर्वथा परितोष है। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है

104
 
क्या वे जानते नहीं कि अल्लाह ही अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और सदक़े लेता है और यह कि अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है

105
 
कह दो, "कर्म किए जाओ। अभी अल्लाह और उसका रसूल और ईमानवाले तुम्हारे कर्म को देखेंगे। फिर तुम उसकी ओर पलटोगे, जो छिपे और खुले को जानता है। फिर जो कुछ तम करते रहे हो, वह सब तुम्हें बता देगा।"

106
 
और कुछ दूसरे लोग भी है जिनका मामला अल्लाह का हुक्म आने तक स्थगित है, चाहे वह उन्हें यातना दे या उनकी तौबा क़बूल करे। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है

107
 
और कुछ ऐसे लोग भी हैं , जिन्होंने मस्जिद बनाई इसलिए कि नुक़सान पहुँचाएँ और कुफ़्र करें और इसलिए कि ईमानवालों के बीच फूट डाले और उस व्यक्ति के घात लगाने का ठिकाना बनाएँ, जो इससे पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ चुका है। वे निश्चय ही क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था।" किन्तु अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे है

108
 
तुम कभी भी उसमें खड़े न होना। वह मस्जिद जिसकी आधारशिला पहले दिन ही से ईशपरायणता पर रखी गई है, वह इसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खड़े हो। उसमें ऐसे लोग पाए जाते हैं, जो अच्छी तरह स्वच्छ रहना पसन्द करते है, और अल्लाह भी पाक-साफ़ रहनेवालों को पसन्द करता है

109
 
फिर क्या वह अच्छा है जिसने अपने भवन की आधारशिला अल्लाह के भय और उसकी ख़ुशी पर रखी है या वह, जिसने अपने भवन की आधारशिला किसी खाई के खोखले कगार पर रखी, जो गिरने को है। फिर वह उसे लेकर जहन्नम की आग में जा गिरा? अल्लाह तो अत्याचारी लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता

110
 
उनका यह भवन जो उन्होंने बनाया है, सदैव उनके दिलों में खटक बनकर रहेगा। हाँ, यदि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ तो दूसरी बात है। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है

111
 
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों से उनके प्राण और उनके माल इसके बदले में खरीद लिए है कि उनके लिए जन्नत है। वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते है, तो वे मारते भी है और मारे भी जाते है। यह उनके ज़िम्मे तौरात, इनजील और क़ुरआन में (किया गया) एक पक्का वादा है। और अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला हो भी कौन सकता है? अतः अपने उस सौदे पर खु़शियाँ मनाओ, जो सौदा तुमने उससे किया है। और यही सबसे बड़ी सफलता है

112
 
वे ऐसे हैं, जो तौबा करते हैं, बन्दगी करते है, स्तुति करते हैं, (अल्लाह के मार्ग में) भ्रमण करते हैं, (अल्लाह के आगे) झुकते है, सजदा करते है, भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते हैं और अल्लाह की निर्धारित सीमाओं की रक्षा करते हैं -और इन ईमानवालों को शुभ-सूचना दे दो

113
 
नबी और ईमान लानेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों के लिए क्षमा की प्रार्थना करें, यद्यपि वे उसके नातेदार ही क्यों न हो, जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे भड़कती आगवाले हैं

114
 
इबराहीम ने अपने बाप के लिए जो क्षमा की प्रार्थना की थी, वह तो केवल एक वादे के कारण की थी, जो वादा वह उससे कर चुका था। फिर जब उसपर यह बात खुल गई कि वह अल्लाह का शत्रु है तो वह उससे विरक्त हो गया। वास्तव में, इबराहीम बड़ा ही कोमल हृदय, अत्यन्त सहनशील था

115
 
अल्लाह ऐसा नहीं कि लोगों को पथभ्रष्ट ठहराए, जबकि वह उनको राह पर ला चुका हो, जब तक कि उन्हें साफ़-साफ़ वे बातें बता न दे, जिनसे उन्हें बचना है। निस्संदेह अल्लाह हर चीज़ को भली-भाँति जानता है

116
 
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है, वही जिलाता है और मारता है। अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक

117
 
अल्लाह नबी पर मेहरबान हो गया और मुहाजिरों और अनसार पर भी, जिन्होंने तंगी की घड़ी में उसका साथ दिया, इसके पश्चात कि उनमें से एक गिरोह के दिल कुटिलता की ओर झुक गए थे। फिर उसने उनपर दया-दृष्टि दर्शाई। निस्संदेह, वह उनके लिए अत्यन्त करुणामय, दयावान है

118
 
और उन तीनों पर भी जो पीछे छोड़ दिए गए थे, यहाँ तक कि जब धरती विशाल होते हुए भी उनपर तंग हो गई और उनके प्राण उनपर दुभर हो गए और उन्होंने समझा कि अल्लाह से बचने के लिए कोई शरण नहीं मिल सकती है तो उसी के यहाँ। फिर उसने उनपर कृपा-दृष्टि की ताकि वे पलट आएँ। निस्संदेह अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है

119
 
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखों और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ

120
 
मदीनावालों और उसके आसपास के बद्दूहओं को ऐसा नहीं चाहिए था कि अल्लाह के रसूल को छोड़कर पीछे रह जाएँ और न यह कि उसकी जान के मुक़ाबले में उन्हें अपनी जान अधिक प्रिय हो, क्योंकि वह अल्लाह के मार्ग में प्यास या थकान या भूख की कोई भी तकलीफ़ उठाएँ या किसी ऐसी जगह क़दम रखें, जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के या जो चरका भी वे शत्रु को लगाएँ, उसपर उनके हक में अनिवार्यतः एक सुकर्म लिख लिया जाता है। निस्संदेह अल्लाह उत्तमकार का कर्मफल अकारथ नहीं जाने देता

121
 
और वे थो़ड़ा या ज़्यादा जो कुछ भी ख़र्च करें या (अल्लाह के मार्ग में) कोई घाटी पार करें, उनके हक़ में अनिवार्यतः लिख लिया जाता है, ताकि अल्लाह उन्हें उनके अच्छे कर्मों का बदला प्रदान करे

122
 
यह तो नहीं कि ईमानवाले सब के सब निकल खड़े हों, फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग निकलते, ताकि वे धर्म में समझ प्राप्ति करते और ताकि वे अपने लोगों को सचेत करते, जब वे उनकी ओर लौटते, ताकि वे (बुरे कर्मों से) बचते?

123
 
ऐ ईमान लानेवालो! उन इनकार करनेवालों से लड़ो जो तुम्हारे निकट है और चाहिए कि वे तुममें सख़्ती पाएँ, और जान रखो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है

124
 
जब भी कोई सूरा अवतरित की गई, तो उनमें से कुछ लोग कहते है, "इसने तुममें से किसके ईमान को बढ़ाया?" हाँ, जो लोग ईमान लाए है इसने उनके ईमान को बढ़ाया है। और वे आनन्द मना रहे है

125
 
रहे वे लोग जिनके दिलों में रोग है, उनकी गन्दगी में अभिवृद्धि करते हुए उसने उन्हें उनकी अपनी गन्दगी में और आगे बढ़ा दिया। और वे मरे तो इनकार की दशा ही में

126
 
क्या वे देखते नहीं कि प्रत्येक वर्ष वॆ एक या दो बार आज़माईश में डाले जाते है ? फिर भी न तो वे तौबा करते हैं और न चेतते।

127
 
और जब कोई सूरा अवतरित होती है, तो वे परस्पर एक-दूसरे को देखने लगते है कि "तुम्हें कोई देख तो नहीं रहा है।" फिर पलट जाते है। अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए, क्योंकि वे ऐसे लोग है जो समझते नहीं है

128
 
तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आ गया है। तुम्हारा मुश्किल में पड़ना उसके लिए असह्य है। वह तुम्हारे लिए लालयित है। वह मोमिनों के प्रति अत्यन्त करुणामय, दयावान है

129
 
अब यदि वे मुँह मोड़े तो कह दो, "मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं! उसी पर मैंने भऱोसा किया और वही बड़े सिंहासन का प्रभु है।"
 
Surah At-Tawbah in अरबी  Arabi
 

بَرَآءَةࣱ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦٓ إِلَى ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّم مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ﴿١﴾

فَسِيحُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ أَرۡبَعَةَ أَشۡهُرࣲ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّكُمۡ غَيۡرُ مُعۡجِزِي ٱللَّهِ وَأَنَّ ٱللَّهَ مُخۡزِي ٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿٢﴾

وَأَذَٰنࣱ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦٓ إِلَى ٱلنَّاسِ يَوۡمَ ٱلۡحَجِّ ٱلۡأَكۡبَرِ أَنَّ ٱللَّهَ بَرِيٓءࣱ مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ وَرَسُولُهُۥۚ فَإِن تُبۡتُمۡ فَهُوَ خَيۡرࣱ لَّكُمۡۖ وَإِن تَوَلَّيۡتُمۡ فَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّكُمۡ غَيۡرُ مُعۡجِزِي ٱللَّهِۗ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ ﴿٣﴾

إِلَّا ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّم مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ثُمَّ لَمۡ يَنقُصُوكُمۡ شَيۡـࣰٔا وَلَمۡ يُظَٰهِرُواْ عَلَيۡكُمۡ أَحَدࣰا فَأَتِمُّوٓاْ إِلَيۡهِمۡ عَهۡدَهُمۡ إِلَىٰ مُدَّتِهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ ﴿٤﴾

فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلۡأَشۡهُرُ ٱلۡحُرُمُ فَٱقۡتُلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ حَيۡثُ وَجَدتُّمُوهُمۡ وَخُذُوهُمۡ وَٱحۡصُرُوهُمۡ وَٱقۡعُدُواْ لَهُمۡ كُلَّ مَرۡصَدࣲۚ فَإِن تَابُواْ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُاْ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّواْ سَبِيلَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورࣱ رَّحِيمࣱ ﴿٥﴾

وَإِنۡ أَحَدࣱ مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ٱسۡتَجَارَكَ فَأَجِرۡهُ حَتَّىٰ يَسۡمَعَ كَلَٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ أَبۡلِغۡهُ مَأۡمَنَهُۥۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ قَوۡمࣱ لَّا يَعۡلَمُونَ ﴿٦﴾

كَيۡفَ يَكُونُ لِلۡمُشۡرِكِينَ عَهۡدٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعِندَ رَسُولِهِۦٓ إِلَّا ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّمۡ عِندَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۖ فَمَا ٱسۡتَقَٰمُواْ لَكُمۡ فَٱسۡتَقِيمُواْ لَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ ﴿٧﴾

كَيۡفَ وَإِن يَظۡهَرُواْ عَلَيۡكُمۡ لَا يَرۡقُبُواْ فِيكُمۡ إِلࣰّا وَلَا ذِمَّةࣰۚ يُرۡضُونَكُم بِأَفۡوَٰهِهِمۡ وَتَأۡبَىٰ قُلُوبُهُمۡ وَأَكۡثَرُهُمۡ فَٰسِقُونَ ﴿٨﴾

ٱشۡتَرَوۡاْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ ثَمَنࣰا قَلِيلࣰا فَصَدُّواْ عَن سَبِيلِهِۦٓۚ إِنَّهُمۡ سَآءَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ﴿٩﴾

لَا يَرۡقُبُونَ فِي مُؤۡمِنٍ إِلࣰّا وَلَا ذِمَّةࣰۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُعۡتَدُونَ ﴿١٠﴾

فَإِن تَابُواْ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُاْ ٱلزَّكَوٰةَ فَإِخۡوَٰنُكُمۡ فِي ٱلدِّينِۗ وَنُفَصِّلُ ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمࣲ يَعۡلَمُونَ ﴿١١﴾

وَإِن نَّكَثُوٓاْ أَيۡمَٰنَهُم مِّنۢ بَعۡدِ عَهۡدِهِمۡ وَطَعَنُواْ فِي دِينِكُمۡ فَقَٰتِلُوٓاْ أَئِمَّةَ ٱلۡكُفۡرِ إِنَّهُمۡ لَآ أَيۡمَٰنَ لَهُمۡ لَعَلَّهُمۡ يَنتَهُونَ ﴿١٢﴾

أَلَا تُقَٰتِلُونَ قَوۡمࣰا نَّكَثُوٓاْ أَيۡمَٰنَهُمۡ وَهَمُّواْ بِإِخۡرَاجِ ٱلرَّسُولِ وَهُم بَدَءُوكُمۡ أَوَّلَ مَرَّةٍۚ أَتَخۡشَوۡنَهُمۡۚ فَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخۡشَوۡهُ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ﴿١٣﴾

قَٰتِلُوهُمۡ يُعَذِّبۡهُمُ ٱللَّهُ بِأَيۡدِيكُمۡ وَيُخۡزِهِمۡ وَيَنصُرۡكُمۡ عَلَيۡهِمۡ وَيَشۡفِ صُدُورَ قَوۡمࣲ مُّؤۡمِنِينَ ﴿١٤﴾

وَيُذۡهِبۡ غَيۡظَ قُلُوبِهِمۡۗ وَيَتُوبُ ٱللَّهُ عَلَىٰ مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿١٥﴾

أَمۡ حَسِبۡتُمۡ أَن تُتۡرَكُواْ وَلَمَّا يَعۡلَمِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ جَٰهَدُواْ مِنكُمۡ وَلَمۡ يَتَّخِذُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَا رَسُولِهِۦ وَلَا ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَلِيجَةࣰۚ وَٱللَّهُ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ ﴿١٦﴾

مَا كَانَ لِلۡمُشۡرِكِينَ أَن يَعۡمُرُواْ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ شَٰهِدِينَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِم بِٱلۡكُفۡرِۚ أُوْلَٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ وَفِي ٱلنَّارِ هُمۡ خَٰلِدُونَ ﴿١٧﴾

إِنَّمَا يَعۡمُرُ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَلَمۡ يَخۡشَ إِلَّا ٱللَّهَۖ فَعَسَىٰٓ أُوْلَٰٓئِكَ أَن يَكُونُواْ مِنَ ٱلۡمُهۡتَدِينَ ﴿١٨﴾

۞ أَجَعَلۡتُمۡ سِقَايَةَ ٱلۡحَآجِّ وَعِمَارَةَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ كَمَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَجَٰهَدَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ لَا يَسۡتَوُۥنَ عِندَ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ ﴿١٩﴾

ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ أَعۡظَمُ دَرَجَةً عِندَ ٱللَّهِۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡفَآئِزُونَ ﴿٢٠﴾

يُبَشِّرُهُمۡ رَبُّهُم بِرَحۡمَةࣲ مِّنۡهُ وَرِضۡوَٰنࣲ وَجَنَّٰتࣲ لَّهُمۡ فِيهَا نَعِيمࣱ مُّقِيمٌ ﴿٢١﴾

خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥٓ أَجۡرٌ عَظِيمࣱ ﴿٢٢﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّخِذُوٓاْ ءَابَآءَكُمۡ وَإِخۡوَٰنَكُمۡ أَوۡلِيَآءَ إِنِ ٱسۡتَحَبُّواْ ٱلۡكُفۡرَ عَلَى ٱلۡإِيمَٰنِۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمۡ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ﴿٢٣﴾

قُلۡ إِن كَانَ ءَابَآؤُكُمۡ وَأَبۡنَآؤُكُمۡ وَإِخۡوَٰنُكُمۡ وَأَزۡوَٰجُكُمۡ وَعَشِيرَتُكُمۡ وَأَمۡوَٰلٌ ٱقۡتَرَفۡتُمُوهَا وَتِجَٰرَةࣱ تَخۡشَوۡنَ كَسَادَهَا وَمَسَٰكِنُ تَرۡضَوۡنَهَآ أَحَبَّ إِلَيۡكُم مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَجِهَادࣲ فِي سَبِيلِهِۦ فَتَرَبَّصُواْ حَتَّىٰ يَأۡتِيَ ٱللَّهُ بِأَمۡرِهِۦۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡفَٰسِقِينَ ﴿٢٤﴾

لَقَدۡ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةࣲ وَيَوۡمَ حُنَيۡنٍ إِذۡ أَعۡجَبَتۡكُمۡ كَثۡرَتُكُمۡ فَلَمۡ تُغۡنِ عَنكُمۡ شَيۡـࣰٔا وَضَاقَتۡ عَلَيۡكُمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ ثُمَّ وَلَّيۡتُم مُّدۡبِرِينَ ﴿٢٥﴾

ثُمَّ أَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَعَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودࣰا لَّمۡ تَرَوۡهَا وَعَذَّبَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْۚ وَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿٢٦﴾

ثُمَّ يَتُوبُ ٱللَّهُ مِنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَ عَلَىٰ مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ غَفُورࣱ رَّحِيمࣱ ﴿٢٧﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّمَا ٱلۡمُشۡرِكُونَ نَجَسࣱ فَلَا يَقۡرَبُواْ ٱلۡمَسۡجِدَ ٱلۡحَرَامَ بَعۡدَ عَامِهِمۡ هَٰذَاۚ وَإِنۡ خِفۡتُمۡ عَيۡلَةࣰ فَسَوۡفَ يُغۡنِيكُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦٓ إِن شَآءَۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمࣱ ﴿٢٨﴾

قَٰتِلُواْ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ ٱلۡحَقِّ مِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ حَتَّىٰ يُعۡطُواْ ٱلۡجِزۡيَةَ عَن يَدࣲ وَهُمۡ صَٰغِرُونَ ﴿٢٩﴾

وَقَالَتِ ٱلۡيَهُودُ عُزَيۡرٌ ٱبۡنُ ٱللَّهِ وَقَالَتِ ٱلنَّصَٰرَى ٱلۡمَسِيحُ ٱبۡنُ ٱللَّهِۖ ذَٰلِكَ قَوۡلُهُم بِأَفۡوَٰهِهِمۡۖ يُضَٰهِـُٔونَ قَوۡلَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن قَبۡلُۚ قَٰتَلَهُمُ ٱللَّهُۖ أَنَّىٰ يُؤۡفَكُونَ ﴿٣٠﴾

ٱتَّخَذُوٓاْ أَحۡبَارَهُمۡ وَرُهۡبَٰنَهُمۡ أَرۡبَابࣰا مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَٱلۡمَسِيحَ ٱبۡنَ مَرۡيَمَ وَمَآ أُمِرُوٓاْ إِلَّا لِيَعۡبُدُوٓاْ إِلَٰهࣰا وَٰحِدࣰاۖ لَّآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۚ سُبۡحَٰنَهُۥ عَمَّا يُشۡرِكُونَ ﴿٣١﴾

يُرِيدُونَ أَن يُطۡفِـُٔواْ نُورَ ٱللَّهِ بِأَفۡوَٰهِهِمۡ وَيَأۡبَى ٱللَّهُ إِلَّآ أَن يُتِمَّ نُورَهُۥ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡكَٰفِرُونَ ﴿٣٢﴾

هُوَ ٱلَّذِيٓ أَرۡسَلَ رَسُولَهُۥ بِٱلۡهُدَىٰ وَدِينِ ٱلۡحَقِّ لِيُظۡهِرَهُۥ عَلَى ٱلدِّينِ كُلِّهِۦ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡمُشۡرِكُونَ ﴿٣٣﴾

۞ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ كَثِيرࣰا مِّنَ ٱلۡأَحۡبَارِ وَٱلرُّهۡبَانِ لَيَأۡكُلُونَ أَمۡوَٰلَ ٱلنَّاسِ بِٱلۡبَٰطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِۗ وَٱلَّذِينَ يَكۡنِزُونَ ٱلذَّهَبَ وَٱلۡفِضَّةَ وَلَا يُنفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَبَشِّرۡهُم بِعَذَابٍ أَلِيمࣲ ﴿٣٤﴾

يَوۡمَ يُحۡمَىٰ عَلَيۡهَا فِي نَارِ جَهَنَّمَ فَتُكۡوَىٰ بِهَا جِبَاهُهُمۡ وَجُنُوبُهُمۡ وَظُهُورُهُمۡۖ هَٰذَا مَا كَنَزۡتُمۡ لِأَنفُسِكُمۡ فَذُوقُواْ مَا كُنتُمۡ تَكۡنِزُونَ ﴿٣٥﴾

إِنَّ عِدَّةَ ٱلشُّهُورِ عِندَ ٱللَّهِ ٱثۡنَا عَشَرَ شَهۡرࣰا فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ يَوۡمَ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ مِنۡهَآ أَرۡبَعَةٌ حُرُمࣱۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُۚ فَلَا تَظۡلِمُواْ فِيهِنَّ أَنفُسَكُمۡۚ وَقَٰتِلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ كَآفَّةࣰ كَمَا يُقَٰتِلُونَكُمۡ كَآفَّةࣰۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ ﴿٣٦﴾

إِنَّمَا ٱلنَّسِيٓءُ زِيَادَةࣱ فِي ٱلۡكُفۡرِۖ يُضَلُّ بِهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ يُحِلُّونَهُۥ عَامࣰا وَيُحَرِّمُونَهُۥ عَامࣰا لِّيُوَاطِـُٔواْ عِدَّةَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ فَيُحِلُّواْ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُۚ زُيِّنَ لَهُمۡ سُوٓءُ أَعۡمَٰلِهِمۡۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿٣٧﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَا لَكُمۡ إِذَا قِيلَ لَكُمُ ٱنفِرُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱثَّاقَلۡتُمۡ إِلَى ٱلۡأَرۡضِۚ أَرَضِيتُم بِٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا مِنَ ٱلۡأٓخِرَةِۚ فَمَا مَتَٰعُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا فِي ٱلۡأٓخِرَةِ إِلَّا قَلِيلٌ ﴿٣٨﴾

إِلَّا تَنفِرُواْ يُعَذِّبۡكُمۡ عَذَابًا أَلِيمࣰا وَيَسۡتَبۡدِلۡ قَوۡمًا غَيۡرَكُمۡ وَلَا تَضُرُّوهُ شَيۡـࣰٔاۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءࣲ قَدِيرٌ ﴿٣٩﴾

إِلَّا تَنصُرُوهُ فَقَدۡ نَصَرَهُ ٱللَّهُ إِذۡ أَخۡرَجَهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ثَانِيَ ٱثۡنَيۡنِ إِذۡ هُمَا فِي ٱلۡغَارِ إِذۡ يَقُولُ لِصَٰحِبِهِۦ لَا تَحۡزَنۡ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَنَاۖ فَأَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَيۡهِ وَأَيَّدَهُۥ بِجُنُودࣲ لَّمۡ تَرَوۡهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلسُّفۡلَىٰۗ وَكَلِمَةُ ٱللَّهِ هِيَ ٱلۡعُلۡيَاۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿٤٠﴾

ٱنفِرُواْ خِفَافࣰا وَثِقَالࣰا وَجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِكُمۡ وَأَنفُسِكُمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرࣱ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ﴿٤١﴾

لَوۡ كَانَ عَرَضࣰا قَرِيبࣰا وَسَفَرࣰا قَاصِدࣰا لَّٱتَّبَعُوكَ وَلَٰكِنۢ بَعُدَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلشُّقَّةُۚ وَسَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَوِ ٱسۡتَطَعۡنَا لَخَرَجۡنَا مَعَكُمۡ يُهۡلِكُونَ أَنفُسَهُمۡ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ إِنَّهُمۡ لَكَٰذِبُونَ ﴿٤٢﴾

عَفَا ٱللَّهُ عَنكَ لِمَ أَذِنتَ لَهُمۡ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُواْ وَتَعۡلَمَ ٱلۡكَٰذِبِينَ ﴿٤٣﴾

لَا يَسۡتَـٔۡذِنُكَ ٱلَّذِينَ يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ أَن يُجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلۡمُتَّقِينَ ﴿٤٤﴾

إِنَّمَا يَسۡتَـٔۡذِنُكَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَٱرۡتَابَتۡ قُلُوبُهُمۡ فَهُمۡ فِي رَيۡبِهِمۡ يَتَرَدَّدُونَ ﴿٤٥﴾

۞ وَلَوۡ أَرَادُواْ ٱلۡخُرُوجَ لَأَعَدُّواْ لَهُۥ عُدَّةࣰ وَلَٰكِن كَرِهَ ٱللَّهُ ٱنۢبِعَاثَهُمۡ فَثَبَّطَهُمۡ وَقِيلَ ٱقۡعُدُواْ مَعَ ٱلۡقَٰعِدِينَ ﴿٤٦﴾

لَوۡ خَرَجُواْ فِيكُم مَّا زَادُوكُمۡ إِلَّا خَبَالࣰا وَلَأَوۡضَعُواْ خِلَٰلَكُمۡ يَبۡغُونَكُمُ ٱلۡفِتۡنَةَ وَفِيكُمۡ سَمَّٰعُونَ لَهُمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلظَّٰلِمِينَ ﴿٤٧﴾

لَقَدِ ٱبۡتَغَوُاْ ٱلۡفِتۡنَةَ مِن قَبۡلُ وَقَلَّبُواْ لَكَ ٱلۡأُمُورَ حَتَّىٰ جَآءَ ٱلۡحَقُّ وَظَهَرَ أَمۡرُ ٱللَّهِ وَهُمۡ كَٰرِهُونَ ﴿٤٨﴾

وَمِنۡهُم مَّن يَقُولُ ٱئۡذَن لِّي وَلَا تَفۡتِنِّيٓۚ أَلَا فِي ٱلۡفِتۡنَةِ سَقَطُواْۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةُۢ بِٱلۡكَٰفِرِينَ ﴿٤٩﴾

إِن تُصِبۡكَ حَسَنَةࣱ تَسُؤۡهُمۡۖ وَإِن تُصِبۡكَ مُصِيبَةࣱ يَقُولُواْ قَدۡ أَخَذۡنَآ أَمۡرَنَا مِن قَبۡلُ وَيَتَوَلَّواْ وَّهُمۡ فَرِحُونَ ﴿٥٠﴾

قُل لَّن يُصِيبَنَآ إِلَّا مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَنَا هُوَ مَوۡلَىٰنَاۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ﴿٥١﴾

قُلۡ هَلۡ تَرَبَّصُونَ بِنَآ إِلَّآ إِحۡدَى ٱلۡحُسۡنَيَيۡنِۖ وَنَحۡنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمۡ أَن يُصِيبَكُمُ ٱللَّهُ بِعَذَابࣲ مِّنۡ عِندِهِۦٓ أَوۡ بِأَيۡدِينَاۖ فَتَرَبَّصُوٓاْ إِنَّا مَعَكُم مُّتَرَبِّصُونَ ﴿٥٢﴾

قُلۡ أَنفِقُواْ طَوۡعًا أَوۡ كَرۡهࣰا لَّن يُتَقَبَّلَ مِنكُمۡ إِنَّكُمۡ كُنتُمۡ قَوۡمࣰا فَٰسِقِينَ ﴿٥٣﴾

وَمَا مَنَعَهُمۡ أَن تُقۡبَلَ مِنۡهُمۡ نَفَقَٰتُهُمۡ إِلَّآ أَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَبِرَسُولِهِۦ وَلَا يَأۡتُونَ ٱلصَّلَوٰةَ إِلَّا وَهُمۡ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمۡ كَٰرِهُونَ ﴿٥٤﴾

فَلَا تُعۡجِبۡكَ أَمۡوَٰلُهُمۡ وَلَآ أَوۡلَٰدُهُمۡۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُعَذِّبَهُم بِهَا فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَتَزۡهَقَ أَنفُسُهُمۡ وَهُمۡ كَٰفِرُونَ ﴿٥٥﴾

وَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ إِنَّهُمۡ لَمِنكُمۡ وَمَا هُم مِّنكُمۡ وَلَٰكِنَّهُمۡ قَوۡمࣱ يَفۡرَقُونَ ﴿٥٦﴾

لَوۡ يَجِدُونَ مَلۡجَـًٔا أَوۡ مَغَٰرَٰتٍ أَوۡ مُدَّخَلࣰا لَّوَلَّوۡاْ إِلَيۡهِ وَهُمۡ يَجۡمَحُونَ ﴿٥٧﴾

وَمِنۡهُم مَّن يَلۡمِزُكَ فِي ٱلصَّدَقَٰتِ فَإِنۡ أُعۡطُواْ مِنۡهَا رَضُواْ وَإِن لَّمۡ يُعۡطَوۡاْ مِنۡهَآ إِذَا هُمۡ يَسۡخَطُونَ ﴿٥٨﴾

وَلَوۡ أَنَّهُمۡ رَضُواْ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَقَالُواْ حَسۡبُنَا ٱللَّهُ سَيُؤۡتِينَا ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦ وَرَسُولُهُۥٓ إِنَّآ إِلَى ٱللَّهِ رَٰغِبُونَ ﴿٥٩﴾

۞ إِنَّمَا ٱلصَّدَقَٰتُ لِلۡفُقَرَآءِ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَٱلۡعَٰمِلِينَ عَلَيۡهَا وَٱلۡمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمۡ وَفِي ٱلرِّقَابِ وَٱلۡغَٰرِمِينَ وَفِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِۖ فَرِيضَةࣰ مِّنَ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمࣱ ﴿٦٠﴾

وَمِنۡهُمُ ٱلَّذِينَ يُؤۡذُونَ ٱلنَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنࣱۚ قُلۡ أُذُنُ خَيۡرࣲ لَّكُمۡ يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَيُؤۡمِنُ لِلۡمُؤۡمِنِينَ وَرَحۡمَةࣱ لِّلَّذِينَ ءَامَنُواْ مِنكُمۡۚ وَٱلَّذِينَ يُؤۡذُونَ رَسُولَ ٱللَّهِ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمࣱ ﴿٦١﴾

يَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمۡ لِيُرۡضُوكُمۡ وَٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَحَقُّ أَن يُرۡضُوهُ إِن كَانُواْ مُؤۡمِنِينَ ﴿٦٢﴾

أَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّهُۥ مَن يُحَادِدِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَأَنَّ لَهُۥ نَارَ جَهَنَّمَ خَٰلِدࣰا فِيهَاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡخِزۡيُ ٱلۡعَظِيمُ ﴿٦٣﴾

يَحۡذَرُ ٱلۡمُنَٰفِقُونَ أَن تُنَزَّلَ عَلَيۡهِمۡ سُورَةࣱ تُنَبِّئُهُم بِمَا فِي قُلُوبِهِمۡۚ قُلِ ٱسۡتَهۡزِءُوٓاْ إِنَّ ٱللَّهَ مُخۡرِجࣱ مَّا تَحۡذَرُونَ ﴿٦٤﴾

وَلَئِن سَأَلۡتَهُمۡ لَيَقُولُنَّ إِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلۡعَبُۚ قُلۡ أَبِٱللَّهِ وَءَايَٰتِهِۦ وَرَسُولِهِۦ كُنتُمۡ تَسۡتَهۡزِءُونَ ﴿٦٥﴾

لَا تَعۡتَذِرُواْ قَدۡ كَفَرۡتُم بَعۡدَ إِيمَٰنِكُمۡۚ إِن نَّعۡفُ عَن طَآئِفَةࣲ مِّنكُمۡ نُعَذِّبۡ طَآئِفَةَۢ بِأَنَّهُمۡ كَانُواْ مُجۡرِمِينَ ﴿٦٦﴾

ٱلۡمُنَٰفِقُونَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتُ بَعۡضُهُم مِّنۢ بَعۡضࣲۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمُنكَرِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَقۡبِضُونَ أَيۡدِيَهُمۡۚ نَسُواْ ٱللَّهَ فَنَسِيَهُمۡۚ إِنَّ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ هُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ ﴿٦٧﴾

وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتِ وَٱلۡكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ هِيَ حَسۡبُهُمۡۚ وَلَعَنَهُمُ ٱللَّهُۖ وَلَهُمۡ عَذَابࣱ مُّقِيمࣱ ﴿٦٨﴾

كَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ كَانُوٓاْ أَشَدَّ مِنكُمۡ قُوَّةࣰ وَأَكۡثَرَ أَمۡوَٰلࣰا وَأَوۡلَٰدࣰا فَٱسۡتَمۡتَعُواْ بِخَلَٰقِهِمۡ فَٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِخَلَٰقِكُمۡ كَمَا ٱسۡتَمۡتَعَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُم بِخَلَٰقِهِمۡ وَخُضۡتُمۡ كَٱلَّذِي خَاضُوٓاْۚ أُوْلَٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ﴿٦٩﴾

أَلَمۡ يَأۡتِهِمۡ نَبَأُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ قَوۡمِ نُوحࣲ وَعَادࣲ وَثَمُودَ وَقَوۡمِ إِبۡرَٰهِيمَ وَأَصۡحَٰبِ مَدۡيَنَ وَٱلۡمُؤۡتَفِكَٰتِۚ أَتَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِۖ فَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظۡلِمَهُمۡ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ﴿٧٠﴾

وَٱلۡمُؤۡمِنُونَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتُ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِيَآءُ بَعۡضࣲۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَيُطِيعُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓۚ أُوْلَٰٓئِكَ سَيَرۡحَمُهُمُ ٱللَّهُۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمࣱ ﴿٧١﴾

وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتِ جَنَّٰتࣲ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَا وَمَسَٰكِنَ طَيِّبَةࣰ فِي جَنَّٰتِ عَدۡنࣲۚ وَرِضۡوَٰنࣱ مِّنَ ٱللَّهِ أَكۡبَرُۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ﴿٧٢﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ جَٰهِدِ ٱلۡكُفَّارَ وَٱلۡمُنَٰفِقِينَ وَٱغۡلُظۡ عَلَيۡهِمۡۚ وَمَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ ﴿٧٣﴾

يَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ مَا قَالُواْ وَلَقَدۡ قَالُواْ كَلِمَةَ ٱلۡكُفۡرِ وَكَفَرُواْ بَعۡدَ إِسۡلَٰمِهِمۡ وَهَمُّواْ بِمَا لَمۡ يَنَالُواْۚ وَمَا نَقَمُوٓاْ إِلَّآ أَنۡ أَغۡنَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ مِن فَضۡلِهِۦۚ فَإِن يَتُوبُواْ يَكُ خَيۡرࣰا لَّهُمۡۖ وَإِن يَتَوَلَّوۡاْ يُعَذِّبۡهُمُ ٱللَّهُ عَذَابًا أَلِيمࣰا فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۚ وَمَا لَهُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ مِن وَلِيࣲّ وَلَا نَصِيرࣲ ﴿٧٤﴾

۞ وَمِنۡهُم مَّنۡ عَٰهَدَ ٱللَّهَ لَئِنۡ ءَاتَىٰنَا مِن فَضۡلِهِۦ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ ﴿٧٥﴾

فَلَمَّآ ءَاتَىٰهُم مِّن فَضۡلِهِۦ بَخِلُواْ بِهِۦ وَتَوَلَّواْ وَّهُم مُّعۡرِضُونَ ﴿٧٦﴾

فَأَعۡقَبَهُمۡ نِفَاقࣰا فِي قُلُوبِهِمۡ إِلَىٰ يَوۡمِ يَلۡقَوۡنَهُۥ بِمَآ أَخۡلَفُواْ ٱللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُواْ يَكۡذِبُونَ ﴿٧٧﴾

أَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ سِرَّهُمۡ وَنَجۡوَىٰهُمۡ وَأَنَّ ٱللَّهَ عَلَّٰمُ ٱلۡغُيُوبِ ﴿٧٨﴾

ٱلَّذِينَ يَلۡمِزُونَ ٱلۡمُطَّوِّعِينَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ فِي ٱلصَّدَقَٰتِ وَٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهۡدَهُمۡ فَيَسۡخَرُونَ مِنۡهُمۡ سَخِرَ ٱللَّهُ مِنۡهُمۡ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿٧٩﴾

ٱسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ أَوۡ لَا تَسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ إِن تَسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ سَبۡعِينَ مَرَّةࣰ فَلَن يَغۡفِرَ ٱللَّهُ لَهُمۡۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡفَٰسِقِينَ ﴿٨٠﴾

فَرِحَ ٱلۡمُخَلَّفُونَ بِمَقۡعَدِهِمۡ خِلَٰفَ رَسُولِ ٱللَّهِ وَكَرِهُوٓاْ أَن يُجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَالُواْ لَا تَنفِرُواْ فِي ٱلۡحَرِّۗ قُلۡ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرࣰّاۚ لَّوۡ كَانُواْ يَفۡقَهُونَ ﴿٨١﴾

فَلۡيَضۡحَكُواْ قَلِيلࣰا وَلۡيَبۡكُواْ كَثِيرࣰا جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ ﴿٨٢﴾

فَإِن رَّجَعَكَ ٱللَّهُ إِلَىٰ طَآئِفَةࣲ مِّنۡهُمۡ فَٱسۡتَـٔۡذَنُوكَ لِلۡخُرُوجِ فَقُل لَّن تَخۡرُجُواْ مَعِيَ أَبَدࣰا وَلَن تُقَٰتِلُواْ مَعِيَ عَدُوًّاۖ إِنَّكُمۡ رَضِيتُم بِٱلۡقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةࣲ فَٱقۡعُدُواْ مَعَ ٱلۡخَٰلِفِينَ ﴿٨٣﴾

وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰٓ أَحَدࣲ مِّنۡهُم مَّاتَ أَبَدࣰا وَلَا تَقُمۡ عَلَىٰ قَبۡرِهِۦٓۖ إِنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَمَاتُواْ وَهُمۡ فَٰسِقُونَ ﴿٨٤﴾

وَلَا تُعۡجِبۡكَ أَمۡوَٰلُهُمۡ وَأَوۡلَٰدُهُمۡۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي ٱلدُّنۡيَا وَتَزۡهَقَ أَنفُسُهُمۡ وَهُمۡ كَٰفِرُونَ ﴿٨٥﴾

وَإِذَآ أُنزِلَتۡ سُورَةٌ أَنۡ ءَامِنُواْ بِٱللَّهِ وَجَٰهِدُواْ مَعَ رَسُولِهِ ٱسۡتَـٔۡذَنَكَ أُوْلُواْ ٱلطَّوۡلِ مِنۡهُمۡ وَقَالُواْ ذَرۡنَا نَكُن مَّعَ ٱلۡقَٰعِدِينَ ﴿٨٦﴾

رَضُواْ بِأَن يَكُونُواْ مَعَ ٱلۡخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَهُمۡ لَا يَفۡقَهُونَ ﴿٨٧﴾

لَٰكِنِ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَعَهُۥ جَٰهَدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلۡخَيۡرَٰتُۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ﴿٨٨﴾

أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمۡ جَنَّٰتࣲ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ﴿٨٩﴾

وَجَآءَ ٱلۡمُعَذِّرُونَ مِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ لِيُؤۡذَنَ لَهُمۡ وَقَعَدَ ٱلَّذِينَ كَذَبُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥۚ سَيُصِيبُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِنۡهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمࣱ ﴿٩٠﴾

لَّيۡسَ عَلَى ٱلضُّعَفَآءِ وَلَا عَلَى ٱلۡمَرۡضَىٰ وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ مَا يُنفِقُونَ حَرَجٌ إِذَا نَصَحُواْ لِلَّهِ وَرَسُولِهِۦۚ مَا عَلَى ٱلۡمُحۡسِنِينَ مِن سَبِيلࣲۚ وَٱللَّهُ غَفُورࣱ رَّحِيمࣱ ﴿٩١﴾

وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ إِذَا مَآ أَتَوۡكَ لِتَحۡمِلَهُمۡ قُلۡتَ لَآ أَجِدُ مَآ أَحۡمِلُكُمۡ عَلَيۡهِ تَوَلَّواْ وَّأَعۡيُنُهُمۡ تَفِيضُ مِنَ ٱلدَّمۡعِ حَزَنًا أَلَّا يَجِدُواْ مَا يُنفِقُونَ ﴿٩٢﴾

۞ إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَسۡتَـٔۡذِنُونَكَ وَهُمۡ أَغۡنِيَآءُۚ رَضُواْ بِأَن يَكُونُواْ مَعَ ٱلۡخَوَالِفِ وَطَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ ﴿٩٣﴾

يَعۡتَذِرُونَ إِلَيۡكُمۡ إِذَا رَجَعۡتُمۡ إِلَيۡهِمۡۚ قُل لَّا تَعۡتَذِرُواْ لَن نُّؤۡمِنَ لَكُمۡ قَدۡ نَبَّأَنَا ٱللَّهُ مِنۡ أَخۡبَارِكُمۡۚ وَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمۡ وَرَسُولُهُۥ ثُمَّ تُرَدُّونَ إِلَىٰ عَٰلِمِ ٱلۡغَيۡبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ﴿٩٤﴾

سَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمۡ إِذَا ٱنقَلَبۡتُمۡ إِلَيۡهِمۡ لِتُعۡرِضُواْ عَنۡهُمۡۖ فَأَعۡرِضُواْ عَنۡهُمۡۖ إِنَّهُمۡ رِجۡسࣱۖ وَمَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُ جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ ﴿٩٥﴾

يَحۡلِفُونَ لَكُمۡ لِتَرۡضَوۡاْ عَنۡهُمۡۖ فَإِن تَرۡضَوۡاْ عَنۡهُمۡ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يَرۡضَىٰ عَنِ ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡفَٰسِقِينَ ﴿٩٦﴾

ٱلۡأَعۡرَابُ أَشَدُّ كُفۡرࣰا وَنِفَاقࣰا وَأَجۡدَرُ أَلَّا يَعۡلَمُواْ حُدُودَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمࣱ ﴿٩٧﴾

وَمِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مَن يَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ مَغۡرَمࣰا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ ٱلدَّوَآئِرَۚ عَلَيۡهِمۡ دَآئِرَةُ ٱلسَّوۡءِۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمࣱ ﴿٩٨﴾

وَمِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مَن يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ قُرُبَٰتٍ عِندَ ٱللَّهِ وَصَلَوَٰتِ ٱلرَّسُولِۚ أَلَآ إِنَّهَا قُرۡبَةࣱ لَّهُمۡۚ سَيُدۡخِلُهُمُ ٱللَّهُ فِي رَحۡمَتِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورࣱ رَّحِيمࣱ ﴿٩٩﴾

وَٱلسَّٰبِقُونَ ٱلۡأَوَّلُونَ مِنَ ٱلۡمُهَٰجِرِينَ وَٱلۡأَنصَارِ وَٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُم بِإِحۡسَٰنࣲ رَّضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُ وَأَعَدَّ لَهُمۡ جَنَّٰتࣲ تَجۡرِي تَحۡتَهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدࣰاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ﴿١٠٠﴾

وَمِمَّنۡ حَوۡلَكُم مِّنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مُنَٰفِقُونَۖ وَمِنۡ أَهۡلِ ٱلۡمَدِينَةِ مَرَدُواْ عَلَى ٱلنِّفَاقِ لَا تَعۡلَمُهُمۡۖ نَحۡنُ نَعۡلَمُهُمۡۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيۡنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمࣲ ﴿١٠١﴾

وَءَاخَرُونَ ٱعۡتَرَفُواْ بِذُنُوبِهِمۡ خَلَطُواْ عَمَلࣰا صَٰلِحࣰا وَءَاخَرَ سَيِّئًا عَسَى ٱللَّهُ أَن يَتُوبَ عَلَيۡهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورࣱ رَّحِيمٌ ﴿١٠٢﴾

خُذۡ مِنۡ أَمۡوَٰلِهِمۡ صَدَقَةࣰ تُطَهِّرُهُمۡ وَتُزَكِّيهِم بِهَا وَصَلِّ عَلَيۡهِمۡۖ إِنَّ صَلَوٰتَكَ سَكَنࣱ لَّهُمۡۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿١٠٣﴾

أَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ يَقۡبَلُ ٱلتَّوۡبَةَ عَنۡ عِبَادِهِۦ وَيَأۡخُذُ ٱلصَّدَقَٰتِ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿١٠٤﴾

وَقُلِ ٱعۡمَلُواْ فَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمۡ وَرَسُولُهُۥ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۖ وَسَتُرَدُّونَ إِلَىٰ عَٰلِمِ ٱلۡغَيۡبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ﴿١٠٥﴾

وَءَاخَرُونَ مُرۡجَوۡنَ لِأَمۡرِ ٱللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمۡ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيۡهِمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمࣱ ﴿١٠٦﴾

وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مَسۡجِدࣰا ضِرَارࣰا وَكُفۡرࣰا وَتَفۡرِيقَۢا بَيۡنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَإِرۡصَادࣰا لِّمَنۡ حَارَبَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ مِن قَبۡلُۚ وَلَيَحۡلِفُنَّ إِنۡ أَرَدۡنَآ إِلَّا ٱلۡحُسۡنَىٰۖ وَٱللَّهُ يَشۡهَدُ إِنَّهُمۡ لَكَٰذِبُونَ ﴿١٠٧﴾

لَا تَقُمۡ فِيهِ أَبَدࣰاۚ لَّمَسۡجِدٌ أُسِّسَ عَلَى ٱلتَّقۡوَىٰ مِنۡ أَوَّلِ يَوۡمٍ أَحَقُّ أَن تَقُومَ فِيهِۚ فِيهِ رِجَالࣱ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُواْۚ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلۡمُطَّهِّرِينَ ﴿١٠٨﴾

أَفَمَنۡ أَسَّسَ بُنۡيَٰنَهُۥ عَلَىٰ تَقۡوَىٰ مِنَ ٱللَّهِ وَرِضۡوَٰنٍ خَيۡرٌ أَم مَّنۡ أَسَّسَ بُنۡيَٰنَهُۥ عَلَىٰ شَفَا جُرُفٍ هَارࣲ فَٱنۡهَارَ بِهِۦ فِي نَارِ جَهَنَّمَۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ ﴿١٠٩﴾

لَا يَزَالُ بُنۡيَٰنُهُمُ ٱلَّذِي بَنَوۡاْ رِيبَةࣰ فِي قُلُوبِهِمۡ إِلَّآ أَن تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿١١٠﴾

۞ إِنَّ ٱللَّهَ ٱشۡتَرَىٰ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ أَنفُسَهُمۡ وَأَمۡوَٰلَهُم بِأَنَّ لَهُمُ ٱلۡجَنَّةَۚ يُقَٰتِلُونَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَيَقۡتُلُونَ وَيُقۡتَلُونَۖ وَعۡدًا عَلَيۡهِ حَقࣰّا فِي ٱلتَّوۡرَىٰةِ وَٱلۡإِنجِيلِ وَٱلۡقُرۡءَانِۚ وَمَنۡ أَوۡفَىٰ بِعَهۡدِهِۦ مِنَ ٱللَّهِۚ فَٱسۡتَبۡشِرُواْ بِبَيۡعِكُمُ ٱلَّذِي بَايَعۡتُم بِهِۦۚ وَذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ﴿١١١﴾

ٱلتَّٰٓئِبُونَ ٱلۡعَٰبِدُونَ ٱلۡحَٰمِدُونَ ٱلسَّٰٓئِحُونَ ٱلرَّٰكِعُونَ ٱلسَّٰجِدُونَ ٱلۡأٓمِرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَٱلنَّاهُونَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَٱلۡحَٰفِظُونَ لِحُدُودِ ٱللَّهِۗ وَبَشِّرِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ﴿١١٢﴾

مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَن يَسۡتَغۡفِرُواْ لِلۡمُشۡرِكِينَ وَلَوۡ كَانُوٓاْ أُوْلِي قُرۡبَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمۡ أَنَّهُمۡ أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَحِيمِ ﴿١١٣﴾

وَمَا كَانَ ٱسۡتِغۡفَارُ إِبۡرَٰهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَن مَّوۡعِدَةࣲ وَعَدَهَآ إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥٓ أَنَّهُۥ عَدُوࣱّ لِّلَّهِ تَبَرَّأَ مِنۡهُۚ إِنَّ إِبۡرَٰهِيمَ لَأَوَّٰهٌ حَلِيمࣱ ﴿١١٤﴾

وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِلَّ قَوۡمَۢا بَعۡدَ إِذۡ هَدَىٰهُمۡ حَتَّىٰ يُبَيِّنَ لَهُم مَّا يَتَّقُونَۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٌ ﴿١١٥﴾

إِنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۚ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِيࣲّ وَلَا نَصِيرࣲ ﴿١١٦﴾

لَّقَد تَّابَ ٱللَّهُ عَلَى ٱلنَّبِيِّ وَٱلۡمُهَٰجِرِينَ وَٱلۡأَنصَارِ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ ٱلۡعُسۡرَةِ مِنۢ بَعۡدِ مَا كَادَ يَزِيغُ قُلُوبُ فَرِيقࣲ مِّنۡهُمۡ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡۚ إِنَّهُۥ بِهِمۡ رَءُوفࣱ رَّحِيمࣱ ﴿١١٧﴾

وَعَلَى ٱلثَّلَٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُواْ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ وَضَاقَتۡ عَلَيۡهِمۡ أَنفُسُهُمۡ وَظَنُّوٓاْ أَن لَّا مَلۡجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيۡهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡ لِيَتُوبُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿١١٨﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَكُونُواْ مَعَ ٱلصَّٰدِقِينَ ﴿١١٩﴾

مَا كَانَ لِأَهۡلِ ٱلۡمَدِينَةِ وَمَنۡ حَوۡلَهُم مِّنَ ٱلۡأَعۡرَابِ أَن يَتَخَلَّفُواْ عَن رَّسُولِ ٱللَّهِ وَلَا يَرۡغَبُواْ بِأَنفُسِهِمۡ عَن نَّفۡسِهِۦۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ لَا يُصِيبُهُمۡ ظَمَأࣱ وَلَا نَصَبࣱ وَلَا مَخۡمَصَةࣱ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا يَطَـُٔونَ مَوۡطِئࣰا يَغِيظُ ٱلۡكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنۡ عَدُوࣲّ نَّيۡلًا إِلَّا كُتِبَ لَهُم بِهِۦ عَمَلࣱ صَٰلِحٌۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجۡرَ ٱلۡمُحۡسِنِينَ ﴿١٢٠﴾

وَلَا يُنفِقُونَ نَفَقَةࣰ صَغِيرَةࣰ وَلَا كَبِيرَةࣰ وَلَا يَقۡطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمۡ لِيَجۡزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحۡسَنَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ﴿١٢١﴾

۞ وَمَا كَانَ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ لِيَنفِرُواْ كَآفَّةࣰۚ فَلَوۡلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرۡقَةࣲ مِّنۡهُمۡ طَآئِفَةࣱ لِّيَتَفَقَّهُواْ فِي ٱلدِّينِ وَلِيُنذِرُواْ قَوۡمَهُمۡ إِذَا رَجَعُوٓاْ إِلَيۡهِمۡ لَعَلَّهُمۡ يَحۡذَرُونَ ﴿١٢٢﴾

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قَٰتِلُواْ ٱلَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ ٱلۡكُفَّارِ وَلۡيَجِدُواْ فِيكُمۡ غِلۡظَةࣰۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ ﴿١٢٣﴾

وَإِذَا مَآ أُنزِلَتۡ سُورَةࣱ فَمِنۡهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمۡ زَادَتۡهُ هَٰذِهِۦٓ إِيمَٰنࣰاۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ فَزَادَتۡهُمۡ إِيمَٰنࣰا وَهُمۡ يَسۡتَبۡشِرُونَ ﴿١٢٤﴾

وَأَمَّا ٱلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضࣱ فَزَادَتۡهُمۡ رِجۡسًا إِلَىٰ رِجۡسِهِمۡ وَمَاتُواْ وَهُمۡ كَٰفِرُونَ ﴿١٢٥﴾

أَوَلَا يَرَوۡنَ أَنَّهُمۡ يُفۡتَنُونَ فِي كُلِّ عَامࣲ مَّرَّةً أَوۡ مَرَّتَيۡنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمۡ يَذَّكَّرُونَ ﴿١٢٦﴾

وَإِذَا مَآ أُنزِلَتۡ سُورَةࣱ نَّظَرَ بَعۡضُهُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٍ هَلۡ يَرَىٰكُم مِّنۡ أَحَدࣲ ثُمَّ ٱنصَرَفُواْۚ صَرَفَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمۡ قَوۡمࣱ لَّا يَفۡقَهُونَ ﴿١٢٧﴾

لَقَدۡ جَآءَكُمۡ رَسُولࣱ مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ عَزِيزٌ عَلَيۡهِ مَا عَنِتُّمۡ حَرِيصٌ عَلَيۡكُم بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ رَءُوفࣱ رَّحِيمࣱ ﴿١٢٨﴾

فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَقُلۡ حَسۡبِيَ ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ عَلَيۡهِ تَوَكَّلۡتُۖ وَهُوَ رَبُّ ٱلۡعَرۡشِ ٱلۡعَظِيمِ ﴿١٢٩﴾